5/27/2015 01:54:00 pm
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सब प्राणियों के लिए जल अनिवार्य अंग है । पूरे जैविक जीवन के अस्तित्व में हमेशा यह निर्धारित किया गया है कि सभ्य संस्कृतियों कैसे कार्य करती थी। जल की आवश्यकता के कारण ही प्राचीन काल में समाज पर्याप्त पानी की आपूर्ति के आसपास ही खुद को बसाने के लिए मजबूर था और यह कहा जा सकता है कि सभी महान सभ्यताएं नदियों के साथ साथ ही विकसित हुई है । भारत दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक सिंधु घाटी सभ्यता (3000-1500 ईसा पूर्व) का जन्मस्थान था और प्राचीन काल से ही भारत में जल संरक्षण करने एवं उसका बुद्धिमतापूर्ण दोहन करने के प्रयास किये गए हैं। यह माना जाता है कि संभवतः कुओं  का आविष्कार हड़प्पा सभ्यता के लोगों ने किया था। इसका प्रमाण यह है कि पुरातात्विक सर्वेक्षणों में हड़प्पा के हर तीसरे घर से एक में कुआं मिला है। भारत में प्राचीन जलीय सभ्यताओं के विकसित होने के पीछे एक दृष्टि यह भी थी कि ये नागरिक सभ्यताएं 'एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन' के वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित थी। जल के प्राचीन और मध्ययुगीन प्रबंधन को तत्कालीन शासन द्वारा व्यवस्थित व वैज्ञानिक अन्वेषण तथा वैधानिक नियमों के द्वारा विनियमित किया जाता था, जिसका सविस्तार वर्णन अथर्ववेद, कौटिल्य के अर्थशास्त्र एवं मनुस्मृति में किया गया है। पौराणिक साहित्य के विभिन्न ग्रंथों में वापी, कूप और तड़ाग (बावड़ी, कुओं और तालाब) के विभिन्न प्रकारों, उनके निर्माण तथा रखरखाव के तरीकों के साथ ही इनके निर्माण एवं नवीनीकरण के कारण व्यक्ति को प्राप्त होने वाले यश एवं पुण्यों का वर्णन किया गया है। इन ग्रंथों में बावड़ी को वापिका, वापी, कर्कन्धु, शकन्धु आदि नामों से उद्बोधित किया जाता था। 

राजस्थान भारत के सबसे शुष्क क्षेत्रों में से एक रहा है जहाँ के पश्चिमी रेगिस्तान में अत्यंत कम वर्षा होती है। इसी कारण एक आम राजस्थानी के दैनिक जीवन में पानी वह बिंदु है, जिसके इर्द-गिर्द उनका जीवन घूमता है। पानी की इसी कमी के कारण राजस्थानियों ने सदैव ही उसके संरक्षण एवं भंडारण के लिए वैज्ञानिक नवाचार व प्रयोग किए हैं। राजस्थान के सभी समुदायों में बावड़ी बनवाने का कार्य हमेशा ही केंद्रीय स्थान पर रहा है। दूसरी ओर, राजस्थान में निजी तौर पर बनाई जाने वाली बावड़ियाँ समुदायिक उपयोग के लिए खुली थी। सहयोग भाईचारे की भावना प्राचीन और मध्यकालीन जीवन का एक प्रमुख विशेषता थी एवं सार्वजनिक उपयोग के लिए कुओं, जलाशयों तथा बावड़ियों खुदवाना एक परोपकारी गतिविधि थीइसी कारण राजस्थान में बावड़ी निर्माण की परम्परा भी प्राचीन है। यहाँ पर प्राचीन काल, पूर्व-मध्यकाल एवं मध्यकाल सभी में बावड़ियों के निर्माण की जानकारी मिलती है। ईसा की प्रथम शताब्दी के लगभग पश्चिमी राजस्थान में इस तरह के बावड़ी खोदने की परम्परा शक जाति अपने साथ लेकर आई थी। राजस्थान की कई बावड़ियाँ वास्तुशास्त्र से बनाई जान पड़ती है। भोज द्वारा रचित वास्तुशास्त्र के प्रसिद्ध ग्रन्थ 'अपराजितपृच्छा ग्रन्थ' में बावड़ियों के चार प्रकार बताए गए है।  

अधिकांश बावड़ियाँ मन्दिरों, किलो या मठों के नजदीक बनाई जाती थी। मंदिरों, महलों, किलों, छतरियों के अलावा राजस्थान की बावड़ियाँ भी अपने विशिष्ठ स्थापत्य शिल्प के लिए जानी जाती है। राजस्थान की बावड़ियाँ विभिन्न प्रकार से अलंकृत व सज्जित की गई है तथा ये उस समय के लोगों की कला के प्रति परिष्कृत सुरुचि की प्रतीक हैं। ये बावड़ियां गहरी, चौकोर तथा कई मंजिला होती हैं। ये सामूहिक रूप से धार्मिक उत्सवों पर स्नान के लिए भी प्रयोग में आती थी। शिलालेख सिद्ध करते हैं कि राहगीरों, राज परिवारों, धार्मिक स्थलों, श्मशान, यज्ञ और शिकार करने, दान करने, अकाल राहत कार्यों इत्यादि के प्रयोजन से सराय, विश्रामगृह, बावड़ी, कुंड, कुओं आदि का निर्माण करवाया जाता था। मध्ययुगीन काल में राजमाता (सत्तारूढ़ महाराजा की माँ) द्वारा उसकी जागीर के राजस्व से बावड़ियों या तालाबों का निर्माण कराने की परंपरा थी। महाराणा जयसिंह के शासन काल के दौरान चित्तौड़गढ़ किले से उदयपुर तक के मार्ग में हर पांच कोस (लगभग 15 किलोमीटर) पर बावड़ियों की एक श्रृंखला का निर्माण किया गया था। मुगलों के यात्रा की सुविधा के लिए जयपुर से दिल्ली, आगरा और अजमेर के मार्ग में बावड़ियों की कई श्रृंखलाएं निर्मित की गई थी। सामंती सरदारों, स्थानीय जमींदारों, अमीर व्यक्तियों, बंजारों और साधुओं आदि ने भी सड़कों के किनारे, धार्मिक स्थलों पर और यहां तक कि दूरदराज के क्षेत्रों में भी जन उपयोग के लिए स्थानीय स्तर पर बावड़ियों और तालाबों का निर्माण कराया था।

राजस्थान के 33 जिलों में 3029 से अधिक बावड़ियां और कुंड हैं। बावड़ियों के निर्माण की प्रकृति एवं डिजाइन उस जगह की प्राकृतिक स्थितियों, वर्षा की मात्रा, भूमिगत जल स्तर, मिट्टी के प्रकार, निर्माण करने वाले की आर्थिक स्थिति आदि पर निर्भर करती थी। शुरूआती युग में ये साधारण संरचनाएं थी, किन्तु जैसे-जैसे समय गुजरता गया ये महीन कलात्मक उत्कीर्ण से युक्त मूर्तियों व कलाकृतियों की साजसज्जा के साथ विकसित होकर मनभावन एवं जटिल होती गई। उनका डिजाइन और संरचनात्मक अलंकरण उन क्षेत्रों की विशिष्ट शैली को दर्शाते हैं जिनमें इनका निर्माण हुआ है। पश्चिम में बीकानेर से कच्छ के रण के तट तक के कुएं एवं बावड़ियां आकार में भिन्न होती हैं और घाटों से घिरी हुई हैं तथा पानी के लिए जलग्रहण क्षेत्र में नीचे की ओर जाती हुई हैं। अरावली के पहाड़ी पथ में बावड़ियां अत्यधिक कौशल युक्त कलात्मक वास्तुकला की अनुपम कृतियाँ हैं।  बूंदी, अलवर, टोंक, भीलवाड़ा और जयपुर क्षेत्रों में पाए जाने वाले इन कुंड के आसपास कलात्मक सीढ़ियाँ और स्तंभ के मनोहारी अलंकरण अत्यंत आकर्षक  हैं। यहाँ की बावड़ियों के डिज़ाइन इनको बनवाने वाले व्यक्ति की स्थिति के अनुसार है जैसे राज परिवार के सदस्यों द्वारा दिल खोलकर खर्च के साथ बनाये गए जलस्रोतों में उत्कृष्ट नक्काशियों, मेहराब, बरामदों और प्रस्तर उत्कीर्णन का कार्य किया गया है।

 बावड़ियाँ एक संस्था के रूप  में-

बावड़ियाँ आम तौर पर मंदिरों और धार्मिक स्थलों से जुडी थी, जहां भक्त स्वयं स्नान करके खुद को शुद्ध कर सकता था। कई बावडियों में देवी-देवताओं यथा गणेश, हनुमान, दुर्गा, शिव और पार्वती, विष्णु, ब्रह्मा, कार्तिकेय, भैरव, सरस्वती, करणी माता या वरुण आदि की मूर्तियां दीवारों, प्रवेश द्वार के दोनों किनारों, विभिन्न आलों, विश्रामालयों, गलियारों आदि जगह पर स्थापित की गई हैं। ताकि जब भी कोई इनमें पानी भरने के लिए जाता था तो वह पहले देवताओं को नमन व पूजन करता था एवं उसके बाद ही कुँए या बावड़ी में जाता था। इन मूर्तियों की स्थापना समुदाय द्वारा इन जलस्रोतों के संरक्षण और रखरखाव के महत्व को दर्शाता है। धार्मिक अनुष्ठान के साथ जुड़े होने के अलावा बावड़ियां मुक्ति, आत्माओं से सुरक्षा और उर्वरता को बढ़ावा देने का स्थान मानी जाती थी। बावड़ियाँ आम तौर पर एक परिसर के भीतर बनाई जाती थी जिसमें यात्रियों, भक्तों आदि के रहने के लिए भी सुविधा होती थी। लंबे सफर पर रहने वाले लोग इन बावड़ियों पर रूककर नहाना, भोजन पकाना, देवी-देवताओं की पूजा-स्तुति करना, विश्राम करना आदि कार्य करते थे और फिर अपनी आगे की यात्रा करते थे। थके हुए यात्रियों के लिए विश्रामस्थल के रूप में उपयोग में आने के अतिरिक्त ये समुदाय के विभिन्न वर्गों के लिए गर्मियों में राहत पाने के मंडप और गोठ, मनोरंजन आदि के स्थानों के रूप में भी जानी जाती थी।

आगे कुछ विशिष्ठ बावड़ियों का विवरण दिया गया है-

1. चाँद बावड़ी - आभानेरी दौसा-

दौसा जिले की बाँदीकुई तहसील के आभानेरी गाँव में लगभग 8 वीं शताब्दी में बनी भव्य डिजाइन और विशाल आकार की चाँद बावड़ी गहराई में लगभग 19.5 मीटर की है। 13 मंजिल की इस बावड़ी में तकरीबन 3500 सीढ़ियां हैं। किंवदंती है कि इसका निर्माण आभानेरी के संस्थापक राजा चंद्र या चाँद ने कराया था। अद्भुत कलात्मकता की प्रतीक वर्गाकार चाँद बावड़ी के तीन ओर आकर्षक सीढ़ियाँ एवं विश्राम घाट बने हुए हैं। उत्तरी ओर की चौथी साइड में स्तंभ युक्त बहुमंजिले गलियारे बने हुए है। इस बावड़ी में राजा के लिए नृत्य कक्ष तथा गुप्त सुरंग बनी हुई है। यह बावड़ी एक ऊंची दीवार से घिरी है जिसमें उत्तर दिशा में एक प्रवेश द्वार है। इसकी परिधि में चारों तरफ स्तंभ युक्त बरामदे बने हुए हैं। यहाँ एक बहुत छोटा सा कमरा भी है जिसे ''अंधेरी उजाला'' के नाम से जाना जाता है। बावड़ी की सबसे नीचे दो ताखों में गणेश एवं महिसासुरमर्दिनी की भव्य प्रतिमाएं हैं जो कि इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाती हैं। इस बावड़ी के नीचे एक लंबी सुरंग है तथा माना जाता है कि भंडारेज स्थित बड़ी बावड़ी से होती हुई आलूंदा गाँव के कुंड तक जाती है। 

2. रानी जी बावड़ी, बूंदी-

बूंदी में तकरीबन 71 छोटी-बड़ी बावड़ियां हैं। बूंदी की सुन्दरतम 'रानी जी की बावड़ी'  की गणना एशिया की सर्वश्रेष्ठ बावड़ियों  में की जाती है। इसमें लगे सर्पाकार तोरणों की कलात्मक पच्चीकारी अत्यंत आकर्षक है। बावड़ी की दीवारों में विष्णु के अवतार मत्स्य, कच्छप वाराह नृसिंह वामन इन्द्र, सूर्य, शिव, पार्वती और गजलक्ष्मी आदि देवी-देवताओं की मूर्तियाँ लगी हैं। इस कलात्मक बावडी में प्रवेश के लिए तीन दरवाज़े  हैं बावड़ी की गहराई लगभग 46 मीटर है। इस अनुपम बावड़ी  का निर्माण राव राजा अनिरूद्व सिंह की रानी राजमाता नाथावती ने 1699 . में अपने पुत्र बुध सिंह के शासनकाल में करवाया था। बावड़ी  के अन्दर जाने के लिए सौ से अधिक सीढ़ियां बनी है। इसकी स्थापत्य कला बहुत ही दर्शनीय आकर्षक है। यह मुग़ल एवं राजपूत स्थापत्य कला मिश्रण है। यह कलात्मक बावड़ी उत्तर मध्य युग की अनुपम देन है।  इस बावड़ी को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संरक्षित इमारत का दर्जा प्रदान किया गया है। पुरातत्व विभाग द्वारा बावड़ी के जीर्णोद्वार कराया है एवं इसके पास में एक उद्यान भी विकसित किया है।

3. नीमराणा की बावडी़ (अलवर)-

इसका निर्माण राजा टोडरमल ने 18 वीं सदी में नीमराना, अलवर में करवाया था। यह नौ मंजिला है। इसकी लम्बाई 250 फुट चौड़ाई 80 फुट है। इसमें समय पर एक छोटी सैनिक टुकड़ी को छुपाया जा सकता था। मध्यकालीन इंजीनियरिंग का अद्भुत नमूना इस नौ मंजिला बावड़ी के निचले भाग में तापमान 19 डिग्री कम हो जाता है और इसमें दिन में प्रकाश की तीव्रता का स्तर मध्य गर्मियों के मध्य दिन में 300 लक्स बना रहता है।

4. पन्ना मीना की बावड़ी, आमेर जयपुर-

17 वीं सदी की अत्यंत आकर्षक इस बावड़ी के एक ओर जयगढ़ दुर्ग दूसरी ओर पहाड़ों की नैसर्गिक सुंदरता है। यह अपनी अद्भुत आकार की सीढ़ियों, अष्टभुजा किनारों और बरामदों के लिए विख्यात है। चाँद बावड़ी तथा हाड़ी रानी की बावड़ी के समान इसमें भी तीन तरफ सीढ़ियाँ है। इसके चारों किनारों पर छोटी-छोटी छतरियां और लघु देवालय इसे मनोहारी रूप प्रदान करते हैं।

  5. हाड़ी रानी की बावड़ी, टोडाराय सिंह, टौंक

बेजोड़ स्थापत्य कला के इस नमूने का निर्माण बूँदी की राजकुमारी हाड़ी रानी ने लगभग 16 वीं शताब्दी में करवाया था जिनका विवाह सोलंकी शासक से हुआ था। इसके एक ओर बने अनूठे विश्राम कक्ष अपने आकार ऊँचाई ठंडक के कारण जाने जाते हैं।

6. रंगमहल, (सूरतगढ़) की बावड़ी-

रंगमहल, (सूरतगढ़) किसी समय यौद्येय गणराज्य की राजधानी था। पहले सिकन्दर के आक्रमण से हानि उठानी पड़ी, उसके बाद हूणों के आक्रमण से रंगमहल पूरी तरह नष्ट हो गया। उत्खनन में यहाँ से एक प्राचीन बावड़ी प्राप्त हुई हैं जिसमें 2 फुट लम्बी तथा 2 फुट चौड़ी ईटें लगी है। यह बावड़ी इस बात का प्रतीक है कि शकों के भारत आगमन के बाद भी रंगमहल सुरक्षित था, क्योंकि बावड़ी बनाने की कला शक अपने साथ भारत लाये थे।

7. भीकाजी की बावड़ी, अजमेर-

अजमेर से 18 किमी पूवोत्तर दिशा में अजमेर जयपुर रोड पर स्थित यह बावड़ी भीकाजी की बावड़ी के नाम से जानी जाती है इसमें संगमरमर पर उत्कीर्ण हिजरी 1024 (1615 ई.) का फ़ारसी लेख उत्कीर्ण है अभिलेख फलक पर उकडू बैठा हुआ हाथी, अंकुश एवं त्रिशूल बना है पुरातात्विक महत्त्व की इस बावड़ी में पानी तक पहुँचने के लिए सीढियां बनी है

8. बाटाड़ू का कुंआ-

बाड़मेर जिले की बायतु पंचायत समिति के ग्राम बाटाड़ू में आधुनिक पाषाण संगमरमर से निर्मित कुंआ जिन पर की गई धार्मिक युग की शिल्पकला दर्शनीय है।


उक्त बावड़ियों के अलावा निम्नांकित बावड़ियां भी उल्लेखनीय है-

  1. गंगरार (चित्तौड़) में 600 वर्ष पुरानी दो बावड़ी,  
  2. बारां के कोतवाली परिसर में एक बावड़ी,  
  3. बूंदी में गुल्ला की बावड़ी, श्याम बावड़ी, व्यास जी की बावड़ी मूर्ति एवं शिल्प कला की दृष्टि से अनुपम है।
  4. जोधपुर भीनमाल में आज भी 700-800 . में निर्मित बावडियां मौजूद है।  
  5. रेवासा (सीकर) में भी दो बावड़ियाँ दर्शनीय हैं। इनको परम्परागत जल सरंक्षण के रूप में काम लिया जा सकता है।
  6. राजगढ़, अलवर में 18 वीं सदी में बनी महंतजी की बावड़ी
  7. 18 वीं शताब्दी ईस्वी, धौलपुर में निर्मित गोल बावड़ी की सीढ़ियाँ, मेहराब, एकल प्रस्तर स्तम्भ जल संरक्षण के एक विशाल प्रयास के अद्भुत उदाहरण को मुखर करती है। 
  8. बावड़ी, 17 वीं सदी, ब्रह्मबाद (भरतपुर)
  9. बावड़ी, 16 वीं सदी, राजलानी, जोधपुर
  10. कच्छ्वाई कुंड, 17 वीं सदी, शाहपुरा, भीलवाड़ा
  11. रानी का कुआँ (बावड़ी गलियारों के साथ), 15 वीं सदी, मचैड़ी, अलवर
  12. मंदाकिनी कुंड, 12 वीं 13 वीं सदी, बिजोलिया, भीलवाड़ा
  13. उदयपुर का प्राचीन गंगोद्भव कुंड या गंगू कुंड
  14. नाथद्वारा के कृष्ण कुंड, अहिल्या कुंड, सुन्दर विलास व लाल बाग़ कुंड
  15. फूल बावड़ी, 8वीं सदी ई., छोटी खाटू (नागौर)
  16. विशिष्ट और उल्लेखनीय बावड़ी, रानी वाव, 10 वीं, 12 वीं सदी, नाडोल, पाली
  17. रानी जी की बावड़ी, 19 वीं सदी, शाहपुरा, भीलवाड़ा
  18.  कालाजी की बावडी एवं नारू जी की बावडी- बून्दी
  19. कोरटा बावडी एवं नोडवी बावडी- पाली
  20. बावडी एवं कुण्ड- घाणेराव (पाली)
  21. झालरा बाव, रतन बाव, सरजा बाव, धरावती बावडी एवं कनक बावडी- सिरोही
  22. किशन कुण्ड- अलवर

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