6/20/2014 10:44:00 am
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As historian and jurist of a high order, Hrbilas Sarda's name will always be taken by reverence.  Sri Sarada was born on June 3, 1867. Being a son of librarian of Government College of Ajmer, from the start he has a keen attachment to study the books and contemplation.  As a result, he was inspired in Social Services and writing and he composed of numerous books including Ajmer Historical and Descriptive, Hindu superiority, Maharana Sanga, Hamamir of the Ranthambhor, Shankar aur Swami Dayanand, Birjanand sarswati, Shyamji Krishna Verma etc. Hrbilas Sarda was elected three times to the Central Legislative Assembly of Ajmer in 1924, 1927 and 1930. Writer and freedom fighter Mrs Sarojini Naidu said about him -''All the Indian and especially Indian women will be always grateful to Hrbilas Sarda, because he have made a mark with courage and diligence in the field of progressive social reforms.''

In the words of former Governor of Rajasthan Late Sardar Gurumukh Nihal Singh '' Sarda performed several significant tasks in field of the public service, but his most important contribution is the Child Marriage Restraint Act.''
The Child Marriage Restraint Act was passed in 1929 is the same credited to Mr. Hrbilas Sarda (1867-1955 AD). Despite many protests, due to untiring efforts of Shri Sarada, the Child Marriage Restraint Act was passed by the then British government in 1929. Since there was a strong public opposition, it was very important and brave act to introduce and advocate Child Marriage Restraint Act's legislation and to make it to be passed at that time. Hrbilas Sarda presented the Child Marriage Restraint Act in the Central Assembly on September 15, 1927. Presenting the law, he told that his main purpose is that to consider the tough life of women who get widow in childhood because of child marriage, how they spend their life, their distrress can not be imagine. Lawmaker Manu wrote that a girl should be married three years after acquiring the adult age. According to the father of Ayurveda 'Dhanvantari', a girl becomes adult in almost 16 years of age in India. In any case, this is not appropriate to marry a girl in the age of childhood. According to the 1921 census, there was 612 'Hindu child widow' in the country whose age was less than 12 months. 498 widows were aged to 12 months to two years, 1280 were 2 to 3 years of age and 12016 widows were run under the age of five. The number of widows under the age of 10 were 17,596 and 3,31,793 widows were run under the age of 15.
While presenting the bill, Hrbilas Sarda said that the natural development of the girl gets hindered due to child marriage, and he can not give birth to a healthy child.  If we have to progress with the western and other countries and to strengthen the nation & to get the freedom, then we have to abandon the practice of child marriage. Quoting the speech of the Mahatma Gandhi of September 7, 1927, Hrbilas Sarda said -''occasionally I (Gandhi) pray to God that if he want to keep them alive then do not show them this type of unfortunate events (child marriage)".
Despite of not getting enough support from the British government and the Indian theologians, Hrbilas Sarda engaged in his virtuous practice and built an environment in favour of the Child Marriage Restraint Act.

In September 23, 1929 in the Central Assembly at Simla, Shri Sarada appealed to the members- "In this scientific age when the distance between countries have fallen away, we must abandon the old-era's practice of child marriage to walk abreast with the progressive nations". Finally he succeeded in his endeavor, and the Child Marriage Restraint Act was passed by the Central Legislative Assembly in September, 1929  which was popularly known as the''Sarda-Act''. This law came into force in April, 1930. Mr. Hrbilas Sarda died on January 20, 1955 at Ajmer.


एक उच्च कोटि के इतिहासकार और विधिवेत्ता के रूप में हरबिलास सारदा का नाम सदा श्रद्धा से लिया जाता रहेगा। श्री सारदा का जन्म 3 जून, 1867 को हुआ था। अजमेर में राजकीय कॉलेज के पुस्तकालयाध्यक्ष के सुपुत्र होने के कारण प्रारंभ से ही उन्हें पुस्तकों के अध्ययन व मनन से लगाव हो गया। इसके परिणामस्वरूप उन्हें समाज सेवा व लेखन की प्रेरणा मिली और उन्होंने अनेक ग्रन्थों की रचना की थी जिनमें अजमेर हिस्टोरिकल एण्ड डेस्क्रिप्टिव, हिन्दू सुपीरियरिटी,  महाराणा सांगा,  हम्मीर ऑफ़ रणथम्भोर, शंकर और दयानन्द स्वामी,  बिरजानन्द सरस्वती,  श्यामजी कृष्ण वर्मा आदि ग्रन्थ प्रमुख है। हरबिलास सारदा सन् 1924, 1927 और 1930 में तीन बार अजमेर से केन्द्रीय विधानसभा के लिए चुने गये।

साहित्यकार एवं स्वतंत्रता सेनानी श्रीमती सरोजनी नायडू ने उनके बारे में कहा था कि- ’’सभी भारतीय और विशेषकर भारतीय नारियां हरबिलास सारदा के प्रति सदैव कृतज्ञ रहेंगी क्योंकि उन्होंने बड़े साहस और परिश्रम से प्रगतिशील समाज सुधार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किये हैं।’’

राजस्थान के भूतपूर्व राज्यपाल स्वर्गीय सरदार गुरुमुख निहालसिंह के शब्दों में ’’सारदा ने जनसेवा के अनेक महत्वपूर्ण कार्य किये,  किन्तु बाल विवाह निरोधक कानून उनकी अत्यन्त महत्वपूर्ण देन है।’’

1929 में बाल विवाह निरोधक कानून को पास कराने का श्रेय श्री हरबिलास सारदा (1867-1955 ई.) को ही जाता है बहुत सारे विरोध के बावजूद श्री सारदा के अथक प्रयासों के फलस्वरूप ही सन् 1929 में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार द्वारा बाल विवाह निरोधक कानून पास किया गया। आम जनता के प्रबल विरोध के चलते यह कानून पेश करना और पूरी पैरवी कर पास करवाना उस समय एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण व साहसी कार्य था। हरबिलास सारदा ने 15 सितम्बर, 1927 को केन्द्रीय विधानसभा में बाल विवाह निरोधक कानून प्रस्तुत किया यह कानून प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा कि उनका मुख्य उद्देश्य यह है कि बाल विवाह के कारण बचपन में ही जो विधवा हो जाये, वे किस प्रकार अपना जीवन व्यतीत करती हैं,  उनकी व्यथा की कल्पना भी नहीं की जा सकती। कानून निर्माता मनु ने लिखा है कि वयस्क होने के तीन वर्ष पश्चात लड़की का विवाह किया जाये। आयुर्वेद के जन्मदाता धनवन्तरी के अनुसार भारत में प्रायः 16 वर्ष की आयु में लड़की वयस्क होती है। इस प्रकार से किसी भी स्थिति में लड़की का विवाह कम आयु में उचित नहीं है। सन् 1921 की जनगणना के अनुसार देश में 612 ऐसी हिन्दू विधवा बच्चियां थी जिनकी आयु 12 माह से भी कम थी। 498 विधवाओं की आयु 12 माह से दो वर्ष, 1280 की आयु 2 से 3 वर्ष की थी तथा पांच वर्ष से कम आयु की कुल विधवाएं 12,016 थी। 10 वर्ष से कम आयु की विधवाओं की संख्या 17,596 और 15 वर्ष से कम आयु की कुल विधवाएं 3,31,793 थी।

बिल प्रस्तुत करते हुए हरबिलास सारदा ने कहा कि बाल विवाह से लड़की के स्वाभाविक विकास में बाधा उत्पन्न होती है और वह स्वस्थ सन्तान भी पैदा नहीं कर सकती। यदि हमें पश्चिम के व अन्य देशों के साथ तरक्की करनी है और मजबूत राष्ट्र बनाना है तथा स्वतंत्रता प्राप्त करनी है तो बाल विवाह जैसी कुरीति का परित्याग करना होगा। हरबिलास सारदा ने महात्मा गांधी के 7 सितम्बर, 1927 के भाषण का अंश प्रस्तुत करते हुए कहा -’’कभी-कभी (गांधी) ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि यदि वे उन्हें जीवित रखना चाहते हैं तो इस प्रकार की (बाल विवाह) दुःखद घटनाएं न दिखाएं।

ब्रिटिश सरकार व भारतीय धर्मशास्त्रियों का पर्याप्त प्रोत्साहन न मिलने के बावजूद हरबिलास सारदा इस पुण्य कार्य में लगे रहे। बाल विवाह निरोधक कानून के पक्ष में वातावरण तैयार किया। 23 सितम्बर, 1929 को शिमला में केन्द्रीय विधानसभा में श्री सारदा ने सदस्यों से अपील की कि इस वैज्ञानिक युग में जब देशों की दूरी कम हो गई हैं,  प्रगतिशील राष्ट्रों के साथ कदम मिलाकर चलने के लिए हमें सदियों पुरानी इस बाल विवाह प्रथा को त्यागना होगा। अंततः वह अपने इस प्रयास में सफल हुए और सितम्बर, 1929 में केन्द्रीय विधानसभा द्वारा बाल विवाह निरोधक कानून पास कर दिया गया जो ’’शारदा एक्ट’’ के नाम से प्रसिद्ध है। यह कानून एक अप्रेल, 1930 को लागू हुआ। श्री हरबिलास सारदा का दिनांक 20 जनवरी, 1955 का अजमेर में स्वर्गवास हुआ।

सौजन्य- श्री देवी सिंह नरूका

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