12/11/2011 01:22:00 pm
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राजस्थान में भक्ति मार्ग परंपरा में संत धन्ना का महत्वपूर्ण स्थान है। तत्कालीन समाज के धार्मिक जीवन को नया मोड़ देने में जाट भक्त धन्ना ने अभूतपूर्व योगदान किया था। कहा जाता है कि राजस्थान में धार्मिक आंदोलन की शुरुआत करने वाले संत धन्ना ही थे।
नाभादास के 'भक्तमाल' और 'धन्ना री परची' से पता लगता है कि वे रामानंद के शिष्य थे। संत धन्ना का जन्म राजस्थान के टौंक जिले के धुवन गाँव में वि. सं. 1472 अर्थात सन् 1415 ई. में एक जाट परिवार में हुआ था। धन्ना की बचपन ईश्वर में प्रवृत्ति थी तथा मन भक्ति भाव से ओतप्रोत था। शनैः शनैः उनकी धार्मिक प्रवृत्ति बढ़ती गई और बनारस जाकर वे रामानंद के शिष्य बन गए। रामानंद इनको घर पर ही ईश्वर भक्ति करने, साधु-संतों की सेवा करने तथा ईश्वर, गुरु और साधु को एक मान कर पूजने तथा दूसरा कोई विचार मन में नहीं लाने का आदेश दिया।
धन्ना जाट जाति के किसान परिवार के थे। उनके एक पद 'धन्ना री आरती' के अनुसार वे एक ग्रहस्थ थे। वे पैतृक व्यवसाय कृषि करते हुए तथा ग्रहस्थ-जीवन में रह कर ही अलौकिक शक्ति प्राप्त करने में लीन रहे।
नाभादास, प्रियादास और अनंतदास ने इनके जीवन की अनेक अलौकिक घटनाओं का उल्लेख किया है जैसे खेत में बिना बोए ही बीज उगना व फसल अच्छी होना, माता की अनुपस्थिति में सारा दूध संतों को पिला देना और फिर दूध के सभी बरतन दूध से मिलना, घर की सारी रोटियां संतों को खिला देना लेकिन रोटियां ज्यों की त्योँ मिलना आदि। इनमें कितना सच है, ये कहना कठिन है, लेकिन इनके अध्ययन से यह निष्कर्ष निकलता है कि धन्ना का ईश्वर में पूरा विश्वास है तथा संग्रह-वृत्ति से परे रह कर संतों का सत्कार करने की भावना इनमें एक सच्चे संत की तरह थी। धन्ना के बारेँ में जो साहित्य कई हस्तलिखित ग्रंथों में उपलब्ध है, उनमें 'धन्ना री परची', आरती और अन्य कई पद शामिल है जिनसे धन्ना की विचारधारा ज्ञात होती है।

धन्ना का भक्ति मार्ग-

>वे गुरु-भक्ति में निष्ठा रखते हुए कहते हैं कि जगत में ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग दिखाने वाले गुरु ही है। वे स्वयं से कहते हैं कि- हे जीव, मुझे स्वयं की चिंता नहीं करनी चाहिए बल्कि ईश्वर में दृढ़ विश्वास करना चाहिए। वे कहते थे कि जो भगवान करते हैं वही होता है, होनी पर किसी का वश नहीं है। वे कहते हैं कि ईश्वर अविगत, अगम, सर्वकर्ता, सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापक है जिसके बारे में कुछ भी कहा नहीं जा सकता है। इस ईश्वर का ध्यान ब्रह्मा, शिव, हनुमान लगातार करते रहते हैं तथा शंकर, नारद, अप्सराएं इत्यादि उनके ध्यान में सुध-बुध खोकर नाचते एवं गाते रहते हैं। धन्ना कहते हैं कि अगणित महिमा वाले राम के गुणों का गान करना मैं कैसे जान सकता हूँ? उस परमात्मा को तो वो ही जान पाया है जिसका स्वभाव सहज व सरल है।
धन्ना की धारणा थी कि अंतर ज्योति के प्रकट हुए बिना प्रभु की पहचान संभव नहीं है। उनका पूर्ण विश्वास था कि ईश्वर की अनुभूति आंतरिक खोज एवं ध्यान के द्वारा ही की जा सकती है।
धन्ना लोभ एवं काम को ईश्वर प्राप्ति में बाधक मानते है तथा नाम स्मरण को ईश्वर प्राप्ति का प्रमुख साधन बताते हैं। उनका कहना था कि प्रभु के स्मरण के बिना कोई भी व्यक्ति आवागमन के बंधनों से मुक्त नहीं हो सकता है तथा नाम स्मरण के बिना जीव को यमराज की नगरी में व्यर्थ ही ठोकर खानी पड़ती है। नाम स्मरण पर जोर देते हुए वे कहते हैं कि राम के नाम का जो जप-यज्ञ करता है, वो ही मोक्ष-पद को प्राप्त करता है।

ढकोसलो के घोर विरोधी-

धन्ना औपचारिकताओं, आडंबर तथा बाह्य दिखावे के विरोधी थे तथा कहते थे कि गंगाजल से स्नान कराना, चंदन-लेप करना, धूपदीप करना, नैवेध रखना, पत्र पुष्प चढ़ाना आदि थोथे आडंबर है। इन सब को छोड़ कर एकमात्र प्रभु के गुण-गान पर बल देना चाहिए।

जातीय भेदभाव का विरोध-

धन्ना का जातीय भेदभाव में विश्वास नहीं था। वे कहते थे कि जब सब प्राणियों में एक ही ईश्वर का निवास है तो फिर ऊंच नीच का भेद कैसे हो सकता है।

4 टिप्पणियाँ:

  1. good job....keep it up........wish you all the best

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  2. एस के मीणा जी प्रयास की सराहना के आपका अत्यधिक आभार। स्नेह बनाए रखें, जय श्रीकृष्ण।

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  3. अत्यंत आभार बी. आर. साहब

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