11/06/2016 02:03:00 pm
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राजस्थान की मालव गणजाति का ऐतिहासिक विवरण -

नान्दसा यूप



मालव जाति ने प्राचीन भारतीय इतिहास में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। इस जाति का मूल निवास स्थान पंजाब था, वहाँ से इसका प्रसार उत्तरी भारत, राजस्थान, मध्य भारत, लाट देश, वर्तमान में भड़ौच, कच्छ, बड़नगर तथा अहमदाबाद में हुआ और अंत में मालवा में इस जाति ने अपने राज्य की स्थापना की। मालवों का सर्वप्रथम उल्लेख पाणिनि की अष्टाध्यायी में मिलता है। मालवों ने अपने गणस्वरुप को 600 ई.पू. से 400 ई. तक बनाए रखा। समुद्रगुप्त द्वारा पराजित मालवों ने अब गणशासन पद्दति को त्याग कर एकतंत्र को स्वीकार कर लिया। उन्होंने दशपुर- मध्यमिका (चितौड़) क्षेत्र में औलिकर वंश के नाम से शासन किया। पाणिनि के अनुसार मालव और क्षुद्रक वाहिक देश के दो प्रसिद्ध गणराज्य थे। दोनों की राजनीतिक सत्ता और पृथक भौगोलिक स्थिति थी। युद्ध के समय ये दोनों गण मिलकर साथ लड़ते थे। इस संयुक्त सेना की संज्ञा 'क्षौद्रक-मालवी' थी । सिकंदर के आक्रमण के समय मालव-क्षुद्रक गणों की सेना को साथ-साथ लडना था परन्तु सेनापति के चुनाव को लेकर उनमें मतभेद उत्पन्न हो गया। डायोडोरेस के अनुसार उन्होंने शत्रु का अलग-अलग मुकाबला किया। पाणिनि ने दोनों जातियों को "आयधुजीवी संघ" कहकर पुकारा है। उन दिनों वे समृद्ध दशा में थे भण्डारकर के अनुसार यूनानी लेखकों के द्वारा वर्णित "ओक्सिद्रकाई" क्षुद्रक ही थे। पतंजलि के महाभाष्य तथा जैन ग्रन्थ भगवतीसूत्र में मालवों का उल्लेख मिलता है। सिकंदर के आक्रमण के पूर्वी पंजाब में स्थित थे। स्मिथ के अनुसार मालव झेलम और चिनाब के संगम के निचले भाग में निवास करते थे। मैक्रिन्डल का मत है कि चिनाब और रावी के मध्य का मैदानी भू-भाग जो सिन्धु और चिनाब के संगम तक फैला हुआ था, मालवों के अधीन था। हेमचन्द्र रायचौधरी मालवों को निचली रावी घाटी में नदी के दोनों किनारों पर अवस्थित मानते हैं। एरियन के अनुसार मालव क्षुद्रकों के साथ सिकंदर के विरुद्ध संघ निर्मित करने को सहमत हो गए थे परन्तु शत्रु का आक्रमण अकस्मात हो जाने के कारण दोनों गणों को शत्रु के विरुद्ध कार्यवाही करने का अवसर नहीं मिला । इस विस्मयकारी आक्रमण से मालव पराजित हुए। मालवों ने अपने किलानुमा नगरी से अनवरत संघर्ष किया, परन्तु सदैव पराजित हुए। मालवों ने समर्पण करने की अपेक्षा नगरों को त्याग कर वनों और रेतीले क्षेत्र में निवास करना उचित समझा। मैक्रिन्डल का मत है कि मालवों के आक्रमण में स्वयं सिकंदर भी घायल हो गया था। तब उसने उनकी स्त्रियों और बालक-बालिकाओं का संहार करने का आदेश तक दे दिया था। लेकिन मालव निराश नही हुए। एरियन की मान्यता है कि सिकंदर ने मालवों को बुलाकर उनसे संधिवार्ता की थी जिसमें वे सफल हुए। मालवों तथा क्षुद्रकों की संयुक्त सेना में 90,000 या 80,000 पदाति, 10,000 घुड़सवार, 900 या 700 रथ थे। कर्टियस के अनुसार मालवों ने सिकंदर को कुछ बहुमूल्य वस्तुएँ तथा घोडे और रथ भेंट किए थे। संस्कृत साहित्य में मालवों के शारीरिक गठन का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि वे असाधारण कद काठी के थे। इनकी लंबाई 104 अंगुल अथवा 6 फीट 4 इंच के लगभग होती थी।


कौटिल्य ने गणों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाएं रखने की सलाह अर्थशास्त्र में दी है। इससे प्रतीत होता है कि मौर्यकाल मे भी गणजातियों ने अपनी स्वतंत्रता बनाए रखी थी। यद्यपि कौटिल्य की सूची में मुद्रक, कुकुर, कुरु, पांचाल आदि पंजाब या मध्यप्रदेश की गणजातियों का उल्लेख मिलता है, मालवों का नहीं। इसलिए इस बात की संभावना है कि मौर्यकाल या शुंगकाल में मालवों ने अपना मूल निवास स्थान छोड दिया और राजपूताना की ओर पलायन कर गए। इस बात की पूरी संभावना है कि पलायन काल में मालव और क्षुद्रकों में समागम हो गया इसलिए बाद में क्षुद्रकों का उल्लेख नहीं मिलता है। जायसवाल का मत है कि मालवों ने भटिंडा के मार्ग से राजपूताना में प्रवेश किया। इसकी पुष्टि करते हुए उन्होंने लिखा है कि वर्तमान में भी मालवी बोली फिरोजपुर से भटिंडा तक बोली जाती है । प्रारंभ में मालवों के पंजाब तथा राजपूताना में निवास करने की जानकारी महाभारत में भी उपलब्ध है । एरियन ने लिखा है कि अर्कीसनेज (चेनाब) मल्लोई अर्थात मालवों के अधीन क्षेत्र में सिन्धु में जाकर मिलती है। इस प्रकार मल्ल (मालव) जाति चन्द्रगुप्त मौर्य और अशोक के राज्यकाल तक तो पंजाब में रही। मौर्य साम्राज्य के निर्बल होने तथा उस पर इंडो-ग्रीक आक्रमण होने पर वह पंजाब छोड़कर राजस्थान में आ गई। उपलब्ध प्रमाण के अनुसार मालव सर्वप्रथम पूर्वी-राजस्थान मे आकर बसे थे। विभिन्न साक्ष्यों से संकेत मिलता है कि यह स्थान टौंक जिले का नगर या कर्कोट नगर नामक स्थान था जो आधुनिक राजस्थान के निर्माण से पूर्व उनियारा ठिकाने के अंतर्गत आता था।
 इस स्थल की खोज 1871-72 ई. में सर्वप्रथम कार्लाइल ने की थी। उन्हें यहाँ से 6000 ताम्र मुद्राएँ प्राप्त हुई थी। उनमें से 110 मुद्राएँ इन्डियन म्यूजियम कलकत्ता में संगृहीत की गई थीं। उन मुद्राओं का अध्ययन बिन्सेंट स्मिथ ने किया था। डॉ. स्मिथ का विचार था कि इन सिक्कों में से 35 सिक्के ऐसे थे जो बाहर से लाएं गए और शेष 75 सिक्के नगर में ही ढाले गए थे।

 

कार्लाइल ने इन सिक्कों का अध्ययन करके 40 मुख्य नामों की पहचान की थी उनमें से 20 तो मालवगण प्रमुखों के नाम हैं। इन मुद्राओं पर ब्राह्मी लिपि का प्रयोग किया गया था और उनका निर्माण काल मुद्राशास्त्रियों ने द्वितीय शताब्दी ई.पू. से चतुर्थ ई. के मध्य माना है। इन मुद्राओं की लिखावट में कम अक्षरों का प्रयोग किया गया है। इनका भार तथा आकार भी न्यूनतम है। गण प्रमुखों का नाम लिखने में भी लिपिक्रम एक समान नहीं रखा गया है। कुछ सिक्कों पर ब्राह्मी वर्ण इस प्रकार लिखे गए है कि उनको बाँये से दाएँ पढ़ना पड़ता है।


मालव आर्थिक दृष्टि से समृद्धृ थे। कर्कट नगर से मुद्राओं के अलावा मंदिर, बाँध, तालाब तथा माला की मणियाँ उत्खनन में प्राप्त हुई हैं। जयपुर नगर से 56 मील की दूरी पर स्थित रेढ़ से भी मालवों के संबंध में जानकारी मिलती है। रेढ़ तीसरी शताब्दी ई.पू. से द्वितीय शताब्दी ई. तक आबाद रहा था। उस समय यहाँ मालव निवास कर रहे थे। यहाँ से मालवों की मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं। रैढ़ से 2 खाई से एक लेड सील प्राप्त हुई थी जो मालवगण से संबंधित है। उस पर ब्राह्मी में लिखा हुआ है। लेड सील पर (मा.) ल-व-ज-न-प-द उत्कीर्ण है, जिसे द्वितीय शताब्दी ई.पू. का माना जाता है। यह सील राज्य के अधिकारी काम में लेते थे। रेढ़ से मालवगण के 300 सिक्के प्राप्त हो चुके हैं।


मालव सिक्कों की विशेषताएँ निम्न हैं -

  • मालव सिक्के गोलाकार थे।

  • इन पर मालव नाम अथवा मालवानाम् जय लिखा हुआ था।

  • कुछ मुद्राओं पर लेख मुद्राओं के पार्श्व भाग पर लिखा है।



  • सिक्कों पर उज्जैन चिहन, सांप, लहरदार नदी, नंदीपाद, त्रिकोण, परशुमाला, वृक्ष, कूबड वाला बैल भी उत्कीर्ण है।

  • स्मिथ ने मालव सिक्कों का न्यूनतम भार 7 ग्रेन तथा व्यास 2 इंच बताया है जबकि रेढ़ के सिक्कों का न्यूनतम भार 2.41 ग्रेन तथा अधिकतम भार 43.84 ग्रेन है। उनका आकार 0.3 इंच से 0.6 इंच के मध्य है।


मलावों का क्षहरात शकों से संघर्ष का उल्लेख नासिक गुहालेख में मिलता है, जो द्वितीय शती ई. के प्रारंभ का माना जाता है । इस अभिलेख में ऋषमदत्त द्वारा उत्तम भद्रों की सहायता हेतु आना तथा मालवों को पराजित करने का विवरण मिलता है। दशरथ शर्मा का मत है कि उत्तम भद्र पंजाब के क्षत्रियों की एक शाखा थी जिसने अजमेर पुष्कर के उर्वरक क्षेत्र पर अधिकार कर लिया था। इस तरह मालवों की शक्ति कुछ समय के लिए क्षीण हो गई। उधर रूद्रदामा के जूनागढ़ अभिलेख से भी ज्ञात होता है कि 150 ई. के बाद पश्चिमी राजस्थान के अधिकांश भाग पर शकों का अधिकार हो गया था। ऐसी स्थिति में मालवों का स्वाधीनतापूर्वक रहना कठिन था। नांदसा यूप लेख से संकेत मिलता है कि बाद में शकों के गहृ युद्ध में लिप्त हो जाने का लाभ उठाकर मालव पुनः स्वतंत्र हो गए थे। नांदसा यूप लेख 226 ई. का है उससे ज्ञात होता है कि मालव नेता श्रीसोम अथवा नंदीसोम ने एक षष्ठीरात्री यज्ञ करके अपने गण की स्वतंत्रता की घोषणा की थी। नांदसा के एक अन्य लेख में उनके सेनापति भीट्टसोम का नाम मिलता है। इससे स्पष्ट है कि दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान पर मालवों का शासन था। अब मालवगण धीरे-धीरे कुलीन तंत्र में परिवर्तित हो गया था। नांदसा यूप लेख मालवों की आनुवांशिक शासन प्रणाली का संकेत देकर तथा उन्हें इक्षवाकु वंश से जोड़कर गौरव अनभुव करने की सूचना देता है। काशीप्रसाद जायसवाल का मत है कि द्वितीय शताब्दी ईस्वी में नाग वंश शक्तिशाली होकर मालवा, गुजरात और राजस्थान तथा पूर्वी पंजाब के अधिपति हो गए थे, तब मालव उनके प्रतिनिधि के रूप में जयपुर, अजमेर, मेवाड़ क्षेत्र में राज्य कर रहे थे। लेकिन तीसरी शताब्दी के पूर्वार्द्ध के पश्चात् मालवों में फूट पड़ गई। डॉ. डी.सी. शुक्ल का मत है कि तीसरी शताब्दी ईस्वी के पश्चात् मालव तीन शाखाओं में विभाजित हो गए जो विजयगढ़, बड़वा, दशपुर और मंदसौर में निवास करती थीं। औलिकर (दशपुर-मंदसौर) तो स्वयं को मालावों से संबंधित मानते थे। उनके अभिलेखों में कृत मालव संवत् का प्रयोग मिलता है। ऐसा माना जाता है कि बड़वा और विजयगढ़ के शासक मालवों की ही शाखा थे। वैसे राजस्थान के अधिकांश यूप लेख मालवगण के भू-भाग के आसपास पाए गए हैं।


मालवों के संबंध में समुद्रगुप्त की प्रयाग-प्रशस्ति से भी जानकारी मिलती है। प्रयाग-प्रशस्ति के अनुसार मालव, यौधेयों, अर्जुनायन, मद्रक, आभीर, प्रार्जुन, सनकानिक काक, खरपरिक आदि गणराज्यों ने समुद्रगुप्त को कर देकर उसकी सभा में उपस्थित होने का वचन दिया, लेकिन 371 ई. के विजयगढ़ अभिलेख का अध्ययन करने पर प्रतीत होता है कि यौधेय गण अभी तक स्वतंत्रता का उपभोग कर रहे थे। मालवों का उल्लेख पुराणों (भागवत) में भी मिलता है। भागवत पुराण में मालवों का स्वतंत्र शासक के रूप में और विष्णु पुराण में आबू के शासक के रूप में उल्लेख मिलता है। समुद्रगुप्त के बाद मालव मंदसौर की ओर पलायन कर गए। स्कन्दगुप्त के समय वे प्रयाग तक चले गए। उदयपुर जिले के वल्लभनगर तहसील के बालाथल ग्राम जहाँ डॉ ललित पांडेय ने उत्खनन करवाया था, वहाँ से प्राप्त मृदभांडो पर ब्राह्मी का ‘म’ उत्कीर्ण है। इसीलिए इसे मालव प्रभावित क्षेत्र माना जा सकता है। इनकी दो मुद्राएँ मेवाड़ के नगरी मध्यमिका से प्राप्त हुई है, जिससे स्पष्ट है कि मालव राजस्थान के पूर्वी एवं दक्षिणी भाग के शासक थे।


ई.वी. सन् की प्रारंभिक शताब्दियों में मालवों का शकों के साथ संघर्ष होने का विवरण नासिक गुहालेख में मिलता है। यह संघर्ष क्षहरात वंश के साथ हुआ था। जूनागढ़ अभिलेख में रूद्रदामा प्रथम (130-150 ई.) का मालदा, गुजरात, काठियावाड़, सिन्धु, सौबीर पश्चिमी विन्ध्य तथा अरावली क्षेत्र (निषाद) और मरूक्षेत्र पर विजय करने का उल्लेख आता है। इसलिए यह निश्चित है कि उसका राजस्थान के मालवों के साथ फिर से संघर्ष हुआ होगा। ऐसी संभावना है कि मालव रूद्रदामा प्रथम के पश्चात् कार्दमक शकों में जो पारिवारिक संघर्ष हुआ, उसका लाभ उठाकर पुनः स्वतंत्र हो गए जिसकी पुष्टि नान्दसा यूप लेख, जो 226 ई. का है, उससे होती है।
स्रोत- राजस्थान का इतिहास (प्रारंभ से 1206 . तक) वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय, कोटा

नांदसा यूप : प्राचीन स्तंभों की परंपरा का प्रमाण 

- डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू की कलम से ....



मेवाड़ से प्राचीन यूप मिले हैं। ये यूप स्तकम्भ की तरह ऊंचाई वाले और लिंग के आकार के बने हैं। इनमें भीलवाड़ा जिले के नांदसा गांव का यूप भारतीय विक्रम संवत के इतिहास ही नहीं, यज्ञ, दान, पुराण, स्मृति आदि कई परंपराओं के अध्यीयन और साक्ष्ये की दृष्टि से महत्वै रखता है। राजस्थान के यूपाभिलेखों में इस यूप का प्राचीनतम होने से खासा महत्व रहा है। इस पर भी खास बात ये कि नांदसा में दो यूप है और दोनों ही लेखांकित है। वहां मौजूद यूप पर जो लेख है, वह ब्राह्मी लिपि में हैं। दाएं से बाएं और ऊपर से नीचे समानत: लिखा गया है ताकि एक पाठ नष्ट, भी हो जाए तो दूसरा बच जाए। है न दूरदर्शिता। इसमें 61 दिन तक चलने वाले यज्ञसत्र का उल्लेख है, बृहद वैदिक यज्ञ का महत्वूपूर्ण अभिलेखीय साक्ष्य है।


हालांकि नांदसा गांव के निवासी इसका यही महत्व समझते हैं कि कभी-कभार कोई लोग इसको देखने आते हैं और इस पर कुछ लिखा हुआ है। वे यह मान्यता भी लिए हुए है कि पांडव कभी इधर आए थे और भरख गांव के मगरे से भीम ने जो तीर चढाकर फेंका था, वह यही है…। मुझे 1990 में नांदसावासियों से यह जनश्रुति सुनकर अजीब भी लगा, फिर याद आया कि ऐसी ही कहानियां अशोक के स्तंभों के साथ भी जुड़ी रही है। दरअसल, उनको जब मेरे एक अखबार के लेख से सूचना मिली कि यह मालवों की दिग्विजय का सूचक यूप है और इसमें संभवत: उसी सोम राजा का जिक्र है जिसका जिक्र विष्णुपुराण में हुआ है तो कुछ ग्रामीणों ने पत्र आदि के माध्यम से मेरा इस बात के लिए आभार माना कि यह तो गजब हो गया।


इस यूप पर कृतसंवत 282 का अभिलेख है, विक्रम संवत के नामकरण से पूर्व यही संवत मान्य था। ईस्वी सन् 226 में चैत्र मास की पूर्णिमा को यह रोपा गया था। तब गणित में इकाई, दहाई सैकडा कैसे होते थी, देखिए इसकी पहली पंक्ति –


सिद्धम्।


कृतयोर्द्वयोव्वनर्ष शतयोद्वयशीतयो : 200 80 2


चेत्रपूर्ण्णदमासीं मस्या म्पू र्वायां…।




इसमें दो सौ बयासी संख्या लिखने के लिए आज की तरह 282 नहीं लिखा बल्कि वर्णों के साथ ही 200, 80 और 2 लिखा गया है। इनका जोड़ 282 होता है, क्यों तब तक इकाई, दहाई, सैकड़ा आदि को एकीकृत करके नहीं लिखा जाता था? यह विचारणीय है मगर यह बड़ा सच है कि जिस विक्रम संवत पर देश को अभिमान है, उसका प्राचीनतम प्रमाण मेवाड़ का नांदसा अपनी कोख में लिए हुए है। यही नहीं, इस यूप की बदौलत ही इस गांव में देश के कई ख्यातिलब्ध इतिहासकारों के पांव इस गांव में पड़े, शायद आज उनकी स्मृतियों के चिह्न भी मौजूद नहीं है, ये हैं – मि. कार्लायल, आर. आर. हल्दमर, गौरीशंकर हीराचंद ओझा, प्रो. भाण्डारकर, डी. सी. सरकार आदि।


सौजन्य- राजस्थान के प्राचीन अभिलेख – संपादक-अनुवादक डॉ. श्रीकृष्ण ‘जुगनू’, प्रकाशक राजस्थानी ग्रंथागार, सोजती गेट, जोधपुर, 2013 ई. पृष्ठ 22-24




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