11/14/2016 12:39:00 pm
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कुंभा की सांस्कृतिक उपलब्धियाँ -


मेवाड़ के राणाओं की विरासत में महाराणा कुम्भा एक महान योद्धा, कुशल प्रशासक, कवि, संगीतकार जैसी बहुमुखी प्रतिभाओं के धनी होने साथ-साथ विभिन्न कलाओं के कलाकारों तथा साहित्यसर्जकों के प्रश्रयदाता भी थे। इतिहासकार कुम्भा की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि महाराणा कुंभा के व्यक्तित्व में कटार, कलम और कला की त्रिवेणी का अद्भुत समन्वय था। लगातार युद्धों में लगे रहने के बावजूद 35 वर्ष लम्बा कुम्भा का काल सांस्कृतिक दृष्टि से मेवाड़ के इतिहास का स्वर्णयुग माना जाता है। निःसंदेह हम कह सकते हैं कि इतिहास में कुंभा का जो स्थान एक महान विजेता के रूप में है, उससे भी बड़ा व महत्त्वपूर्ण स्थान उसका स्थापत्य और विविध विद्याओं की उन्नति के पुरोधा के रूप में है।

कुम्भा काल की वास्तुकला -


कुंभा वास्तु व स्थापत्य कला का मर्मज्ञ था। कुम्भाकालीन सांस्कृतिक क्षेत्र में वास्तु-कला का महत्त्व सर्वाधिक है। इस काल में मेवाड़ ने वास्तुकला के क्षेत्र में सर्वाधिक प्रगति की थी। उसकी स्थापत्य कला को हम निम्नांकित तीन भागों में बांट सकते हैं -

1. मंदिर                           2. दुर्ग                        3. भवन

मेवाड़ में मंदिर निर्माण की परंपरा बहुत प्राचीन व गौरवपूर्ण रही है जिसको महाराणा कुंभा ने एक नवीन दिशा प्रदान की। बी.के. श्रीवास्तव के अनुसार उसके निर्माण कार्य के तीन प्रमुख केन्द्र थे - कुम्भलगढ़, चित्तौड़गढ़ और अचलगढ़। कुंभाकालीन मंदिर नागर शैली के शिखर से अलंकृत तथा ऊँची प्रासाद पीठ पर निर्मित हैं। इसमें प्राय: भूरे रंग के बलुआ पत्थर का प्रयोग हुआ है। उनमें सादे गर्भ-गृह, अर्द्ध-मंडप, सभा-मंडप, प्रदक्षिणा-पथ एवं आमलक युक्त शिखर पाए जाते हैं। गर्भ-गृह के द्वार खण्डों, मंडप की छतों तथा स्तंभों पर सुन्दर मूर्तियों एवं कला के अन्य शुभ प्रतीकों का प्रयोग हुआ है। बाह्य भाग में भी प्रासादपीठ व मंडोवर पर सुन्दर कलाकृतियां प्राप्त होती है। बाहर की मुख्य ताकों में विष्णु के विविध रूपों के वाली भव्य मूर्तियाँ तत्कालीन कला समृद्धता का परिचायक है। उसके राजकीय सूत्रधार मंडन ने कहा है कि पाषण के मंदिर बनाने से अनंतफल की प्राप्ति होती है।

कुम्भा के मंदिरों में श्रृंगार चंवरी और कुम्भस्वामी मंदिर प्रमुख है। चित्तौड़गढ़ दुर्ग स्थित मध्यकालीन स्थापत्य का उत्कृष्ट उदाहरण कुम्भस्वामी मंदिर कालक्रम की दृष्टि से इनमें सबसे पुराना (1445-46 ई. के लगभग) है। यह कीर्ति स्तम्भ के पास स्थित है। ऐसा माना जाता है कि कीर्ति स्तम्भ इसी मंदिर का ही एक भाग है। इसे मध्यकालीन मंदिर स्थापत्य का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। जैसा कि इतिहासकारों ने माना है, वास्तव में यह चितौडगढ़ दुर्ग का तिलक है। इसी प्रकार कुंभा ने अचलगढ़ समीप भी कुम्भस्वामी मंदिर बनवाया, जिसमें भगवान विष्णु के 24 अवतारों की प्रतिमाएं लगी हैं। आबू में भी कई मंदिर कुम्भाकालीन हैं। उदयपुर के निकट एकलिंगजी के मंदिर में कुंभ मंडप का निर्माण करवाया जो आजकल मीराबाई के मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर भी तत्कालीन स्थापत्य व मूर्तिकला का अद्भुत नमूना है। इसकी बाह्य रथिकाओं में नृसिंह-वराह-विष्णु की तीन महत्वपूर्ण प्रतिमाएं उत्कीर्ण हैं।

कुंभा धार्मिक दृष्टि से बहुत ही सहिष्णु था। उनके काल में विभिन्न धर्मावलंबियों ने अनेक मंदिरों का निर्माण करवाया, जिसमें रणकपुर का जैन मंदिर सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है, जिसका उत्तरी भारत के जैन मंदिरों में विशिष्ट स्थान है। इसका निर्माता धारणक शाह पोरवाल था। इसका निर्माण वि.सं. 1496 में प्रारंभ हुआ तथा वि. सं. 1516 तक इसका कार्य जारी रहा। उत्तरी भारत मे ऐसे स्तंभों वाला विशाल सुन्दर मंदिर अन्य कहीं नहीं है। रणकपुर-मंदिर की कला वास्तव में कुंभा के समय के स्थापत्य की महानता को प्रदर्शित करती है। इस काल के बने जैन मंदिरों में अजारी पिंडवाड़ा, नागदा आदि के मंदिर प्रसिद्ध है। कुम्भा के काल में नये मंदिरों के निर्माण के साथ-साथ पुराने मंदिरों का जीर्णोद्धार भी किया गया था।

कुम्भा का दुर्ग स्थापत्य-


कुम्भा ने अनेक दुर्गों का निर्माण कराया तथा ऐसे माना जाता है कि मेवाड़ के 84 दुर्गों में से 32 दुर्ग तो अकेले कुंभा ने ही बनवाए थे। इस निर्माण में सामरिक महत्त्व का सर्वाधिक ध्यान रखा गया था। अपने राज्य की पश्चिमी सीमा और सिरोही के बीच तंग रास्तों को सुरक्षित रखने के लिए नाकाबंदी की और सिरोही के निकट बसंती का दुर्ग बनवाया। उसने मेरो के प्रभाव को रोकने के लिए मचान के दुर्ग का निर्माण कराया तो भीलों की शक्ति पर नियंत्रण हेतु भोमट का दुर्ग बनवाया। केन्द्रीय शक्ति को पश्चिम में अधिक सशक्त बनाने और सीमान्त क्षेत्रों में सैनिक सहायता पहुँचाने के लिए वि.सं. 1509 में आबू में अचलगका दुर्ग निर्मित किया। यह दुर्ग परमारों के प्राचीन दुर्ग के अवशेषों पर इस तरह पुनर्निर्मित किया गया कि उस काल की सामरिक स्थितियों में उपयोगी सिद्ध हो सके। इसी प्रकार अरावली की पश्चिमी शाखा के एक घेरे में सादड़ी, मेवाड़ और मारवाड़ की सीमा पर कुम्भलगढ़ नामक दुर्ग बनवाया। मुआसिरे मुहम्मदशाही में इस किले का प्रारंभिक नाम 'मच्छिन्द्रपुर' है, जिसका पुनर्निर्माण महाराणा कुम्भा ने 1443 ई. में प्रारंभ किया जो 1458 ई. में पूरा हुआ, जिसे कुम्भलगढ़ नाम दिया गया। यह दुर्ग सैनिक आवश्यकता और निवास उपयोगिता की पूर्ति करता है।

कुम्भलगढ़ के अलावा महाराणा ने चित्तौड़गढ दुर्ग को भी पुनः-निर्मित कराया। इस दुर्ग को सात द्वारों एवं कई बुर्जों के घेरों का निर्माण कर सुरक्षित करवाया। ऊपर जाने वाले संकरे मार्ग को रथ जाने योग्य चौड़ा बनवाया। वहीँ उसने सुप्रसिद्ध कीर्तिस्तंभ भी बनवाया। कर्नल टॉड के अनुसार कुम्भा ने निश्चित ही सुदृढ़ दुर्गों से सुसंपन्न करके अपना नाम चिर-स्थाई कर दिया। अचरज है कि विभिन्न दुर्ग, मंदिर, जलाशय, भवन आदि का निर्माण कराने वाले कुंभा के स्वयं के निवास स्थान में उतनी भव्यता नहीं थी बल्कि उसका निवास स्थल अत्यंत साधारण व सात्विक था। कुंभा द्वारा कराए गए अन्य निर्माणो में तालाब, जलाशय आदि भी थे। उसने बसंतपुर को पुन: बसाया और वहीँ सात सुन्दर जलाशय बनवाए।

कुम्भा युग की मूर्तिकला -


स्थापत्य कला का मूर्ति कला से गहन संबंध होने के फलस्वरूप कुम्भा के काल में मूर्ति कला का भी उत्कृष्ट विकास हुआ। कुंभा के समय मूर्तिकला उन्नत अवस्था में थी। चित्तौड़गढ़-दुर्ग स्थित कीर्तिस्तंभ की संज्ञा तो मूर्तिकला के शब्दकोष के रूप दी जाती है। इसे हिन्दू देवी-देवताओं का अजायबघर भी कहते हैं। पूरे कीर्ति स्तम्भ में विभिन्न देवी देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित की गई है। प्रवेश-द्वार में जनार्दन की प्रतिमा है। पहली मंजिल की ताकों में अनंत, ब्रह्मा, रूद्र की मूर्तियाँ हैं। प्रमुख पार्श्वों में हरिहर, अर्धनारीश्वर एवं इसके दोनों ओर दो स्त्री मूर्तियाँ हैं। इसी प्रकार प्रत्येक मंजिल पर विभिन्न देवी देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित है। कला की दृष्टि से कर्नल टॉड ने इसे कुतुबमीनार से भी श्रेष्ठ माना है। फर्ग्युसन ने भी कीर्तिस्तंभ को रोम के टार्जन के समान स्वीकार किया है। किन्तु वह इसकी कला को टार्जन से भी अधिक उन्नत बताता है। कुम्भस्वामी के मंदिर की मूर्तियों का तक्षण भी उच्च कोटि का है। एकलिंगजी के मंदिर में निर्मित कुम्भ-मंडप की बाह्य भित्ति की तीन रथिकाओं में नृसिंह, वराह, विष्णु भाव की प्रतीक तीन मूर्तियाँ हैं। आर.सी. अग्रवाल का कहना है कि इन प्रतिमाओं का निर्माण महाराणा कुम्भा के राजकीय सूत्रधार मंडन के निर्देशन में हुआ होगा क्योंकि इन मूर्तियों में क्रमश: 8,12 व 16 हाथ है तथा उनका स्वरुप मंडन के वास्तुशास्त्र ग्रन्थ 'रूपमंडन' में वर्णित विष्णु, अनंत एवं त्रैलोक्य मोहन रूपों के अनुरूप है। उदयपुर संग्रहालय में सुरक्षित बीस हाथों वाली प्रतिमा भी कुंभा काल की ही ज्ञात होती है।

कुम्भा का साहित्य प्रेम-


कुंभा स्वयं विद्वान् था और कई विद्वानों एवं साहित्यकारों का आश्रयदाता था। ज्ञान की विभिन्न शाखाओं में पारंगत कुम्भा को वेद, स्मृति, मीमांसा का अच्छा ज्ञान था। उसने कई ग्रंथों की रचना की जिसमें 'संगीतराज, 'संगीत मीमांसा, सूड प्रबंध' प्रमुख है। संगीतराज की रचना वि.सं. 1509 में चित्तौड़ में की गई थी, जिसकी पुष्टि कीर्ति-स्तम्भ प्रशस्ति से होती है। यह ग्रन्थ पाँच उल्लास में बंटा है- पथ रत्नकोष, गीत रत्नकोष, वाद्य रत्नकोष, नृत्य रत्नकोष एवं 80 परीक्षण। इसमें लगभग 40 पूर्व आचार्यों का वर्णन मिलता है। कुंभा ने जयदेव कृत गीत गोविन्द की टीका 'रसिकप्रिया' के नाम से और 'संगीत रत्नाकार' की टीका लिखी तथा चंडीशतक की व्याख्या भी की। गीत गोविन्द की टीका की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें पदों को गाये जाने वाले रागों को प्रथम बार निश्चित किया गया है। सूड प्रबंध और चंडीशतक की रचना शैली एवं रसिकप्रिया की रचना शैली में अंतर है। कुम्भा ने 'कामराज रतिसार' एवं रसिकप्रिया के पूरक ग्रन्थ 'सुधा प्रबंध' की भी रचना की। इसके अलावा वह चार नाटकों का रचयिता भी था, जिसमें उसने मेवाड़ी, कर्नाटकी और मराठी भाषाओं का प्रयोग किया। उसे वाद्य यंत्रों की भी अच्छी जानकारी थी और उन्हें बजने में भी वह निपुण था। कुंभा वेद, शास्त्रों, उपनिषद, मीमांसा, स्मृति, राजनीति, गणित, व्याकरण व तर्क शास्त्र का अच्छा ज्ञाता व विद्वान था। इस विद्वान शासक ने कई विद्वानों को अपने यहाँ आकर्षित किया, जिसके परिणाम स्वरुप मेवाड़ में कला और साहित्य अद्भुत संगम विकसित हुआ एवं मेवाड़ का महत्त्व इन क्षेत्रों में बढ़ गया। कुंभा के दरबार के विद्वानो में सबसे प्रमुख अत्रि था। वह एक विद्वान परिवार से आया हुआ था। वह न केवल अच्छा लेखक था, अपितु उसे वेद, मीमांसा, न्याय तथा वेदान्त काअच्छा ज्ञान था। कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति लेखन का कार्य उसी को सौंपा गया, किन्तु उसकी आयु अधिक होने के कारण उसी के पुत्र महेश ने उसे पूर्ण किया। उसके दरबार का दूसरा महत्वपूर्ण विद्वान सूत्रधार मंडन था। प्रमुख कवि कवि कान्हा व्यास भी उसके दरबार में था, जिसने एकलिंग-महात्म्य की रचना की थी। सकलकीर्ति संस्कृत का उत्कृष्ट विद्वान था, जिसने 28 ग्रन्थ संस्कृत भाषा में तथा 6 ग्रन्थ स्थानीय भाषा में लिखे। मंडन ने भी वास्तुशास्त्र से संबंधित प्रसाद मंडन, राजवल्लभ मंडन, रूप मंडन, देवता मूर्ति प्रकरणं, वास्तु मंडन आदि कई ग्रन्थ लिखे, जिनमें से प्रसाद मंडन अभी भी उपलब्ध है। राजवल्लभ मंडन में निवास स्थान सम्बन्धी भवनों, कुओं, तालाबों आदि के निर्माण करने के सिद्धांतों का विवरण है। रूप मंडन एवं देवता मूर्ति प्रकरणं में मूर्ति बनाने के नियमों का वर्णन है। वास्तु मंडन ग्रन्थ में निर्माण के विधानों एवं नियमों का विवरण है। मंडन के भाई नाथा ने वास्तु-मंजरी एवं मंडन के पुत्र गोविन्द ने उद्धार धोरणी, कलानिधि तथा द्वार दीपिका ग्रंथों की रचना की। अनेक जैन संतों ने भी इस काल में मेवाड़ के संस्कृत एवं मेवाड़ी साहित्य के विकास में अपना महत्त्वपूर्ण प्रशंसनीय योगदान दिया। जैन-साहित्य के विद्वानों में सोमसुन्दर, मुनिसुन्दर, जयचंदसूरि, सुन्दर सूरि, सोमदेव आदि के नाम गिनाए जा सकते है। जैन श्रेष्ठियों ने विद्वानों को पर्याप्त आर्थिक सहायता दी। श्रेष्ठियों ने अपने पुस्तक भंडार भी बनवाए। इन गतिविधियों से स्थानीय भाषा का पर्याप्त विकास हुआ। वास्तव में कुंभा एक विद्वान, प्रतिभासंपन्न साहित्यकार होने के साथ-साथ कलाकारों व विद्वानों का आश्रयदाता भी था।

कुम्भाकालीन संगीत एवं चित्रकला -


कुम्भा के काल में संगीत एवं चित्रकला के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई। कुंभा स्वयं अपने समय का एक महान संगीतज्ञ था। उसे संगीत के नियमों और संगीत कला का अच्छा ज्ञान था। उसने संगीत पर तीन ग्रन्थ भी लिखे, जिनका वर्णन पूर्व में किया जा चुका है। उसके शासन में संगीतज्ञों को अत्यधिक प्रश्रय मिला हुआ था। वह स्वयं भी कई वाद्ययंत्रों को बजाना जानता था। सोम-सौभाग्यकाव्य से ज्ञात होता है कि संगीत का प्रचलन जनमानस में भी था। रणकपुर की मूर्तियों के अंकन से संगीत मंडलियों की जानकारी मिलती है। चित्तौड़, देलवाड़ा, एकलिंग जी आदि स्थानों पर अंकित प्रतिमाओं से वादक मंडलियों एवं विविध वाद्ययंत्रों का बोध होता है। रणकपुर, चित्तौड़ के मंदिरों एवं कीर्ति स्तम्भ की नृत्य मुद्राओं की मूर्तियों से स्पष्ट है कि तब समाज में नृत्यकला का प्रचुर मात्रा में प्रचलन भी था।


चित्रकला की दृष्टि से भी यह युग बड़ा ही महत्त्वपूर्ण था। 'सुपासनाह-चरित्रम’ चित्रित ग्रन्थ महाराणा कुंभा के काल की देन है। इसमें स्वर्ण स्याही का प्रचुर प्रयोग किया गया है। श्रेष्ठियों के रहने के घर भित्ति-चित्रों से अलंकृत थे। कुंभा के राजप्रासादों में भी झीनी रेखायें दृष्टिगत होती है। नाट्यशालाओं को भित्ति-चित्रों से अलंकृत किया जाता था।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि सांस्कृतिक क्षेत्र में मेवाड़ को कुंभा की अद्वितीय देन है। निःसंदेह कुंभा के शासनकाल में मेवाड़ ने चहुँमुखी उन्नति की। इतिहासकारों का यह कथन सर्वथा उचित प्रतीत होता है कि महाराणा कुंभा के व्यक्तित्व में कटार, कलम और कला की त्रिवेणी का अद्भुत समन्वय था।

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1 टिप्पणियाँ:

  1. राजस्थान के प्राचीन नगरों की विस्तृत व सरल जानकारी देने की कृपा करें।😊

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