11/10/2016 11:20:00 pm
0

राजस्थान में शिबि जनपद -


मौर्य के बढ़ते हुए प्रभाव, सिकंदर के आक्रमण और इंडो-यूनानियों के आक्रमण से बाध्य होकर कई गण जातियाँ पंजाब छोड़कर राजस्थान आई थीं। उनमें से शिवि गण के लोग मेवाड़ के नगरी नामक स्थान पर राजस्थान में स्थानान्तरित हुए। काशीप्रसाद जायसवाल का मत है कि गण जातियों का पलायन उनका स्वतंत्रता के प्रति प्रेम को दर्शाता है। यूनानी क्लासिकल लेखकों, कर्टिअस, स्ट्रेबो तथा एरियन के अनुसार चौथी शताब्दी ई.पू. में सिकंदर के विदेश लौटते समय सिब्रोई (शिबि) जनजाति द्वारा उसके मार्ग में अवरोध उत्पन्न किया गया था। एरियन के अनुसार शिबिजन के निवासी वीर और साहसी थे। उनके पास 40 हजार पदाति तथा 3000 घुड़सवार सैनिक थे। वे जंगली जानवरों की खाल पहनते थे और उनके युद्ध पद्धति विचित्र थी। युद्ध में वे गदा और लाठियों का प्रयोग करते थे। क्लासिकल लेखकों के विवरण से तो ऐसा लगता है कि शिबि जाति के लोग असभ्य तथा बर्बर थे। संभवत: यह विवरण उनके पंजाब निवास का है, जबकि राजस्थान के शिबि सुसंस्कृत और संस्कार संपन्न थे। शिबि जाति का उल्लेख ऋग्वेद में अलिनो, पक्यो, भलानसो, और विषनियो के साथ आया है जिन्हें सुदास ने पराजित किया था। ऐतरेय ब्राह्मण में शिबि राजा अमित्रतनय का उल्लेख आया है । महात्मा बुद्ध (महाजनपद युग) के समय के सोलह महाजन पदों की सूची जो अंगुत्तरनिकाय में मिलती है उसमें शिबि जनपद का उल्लेख नहीं है परन्तु महावस्तु में बुद्ध ज्ञान को जिन देशों और जनपदों में वितरित किए जाने के बात कही गई है, उनमें शिवि देश सम्मिलित है। महावस्तु की सूची में गांधार और कंबोज जनपदो का नाम न देकर उसके जगह शिबि और दर्शाण का नाम मिलता है। विनयपिटक के अनुसार शिबि देश बहुमूल्य और सुन्दर दशालो के लिये प्रसिद्ध था। अवंती नरेश चंडप्रद्योत ने शिबि देश का एक दशाले का जोड़ा वैद्य जीवक को भेंट किया था और उसने उसे भगवान् बुद्ध को अर्पित कर दिया। उम्मदंती जातक से ज्ञात होता है कि शिबियों के राज्य में 'शिबि धर्म' नामक नैतिक विधान प्रचलित था जिसका पालन करना राज्य के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य था। शिबि जातक, उम्मदंती जातक और वेसंतर जातक में शिबि देश तथा उसके राजाओं का वर्णन मिलता है।



पाणिनि ने उशीनर का बाहीक जनपद नाम से उल्लेख किया है । उसने शिबि का कहीं उल्लेख नहीं किया है। संभवत: बाद में उशीनर शिबि कहे जाने लगे महाभारत के वन पर्व में शिबि राष्ट्र और उसके राजा उशीनर का उल्लेख मिलता है। नन्दलाल डे ने महाभारत के इस शिबि राज्य को स्वात घाटी में स्थित बतलाया है। महाभारत में शिबि औशीनर की बाज हेतु बलिदान के कथा बड़ी लोकप्रिय है। फाहियान के अनुसार यह घटना उद्यान के दक्षिण या आधुनिक स्वात घाटी में घटी थी। महाभारत में बली शिबि राजा की कथा शिबि जातक में मिलती है। इस प्रकार पालि साहित्य के शिबि देश के राजधानी स्वात घाटी मानकर उसे वर्तमान सीवी (विलोचिस्तान) के आसपास माना जा सकता है या पश्चिमी पंजाब के शेरकोट के आसपास का प्रदेश और उसके राजधानी अरिथपुर मान सकते हैं। लेकिन वेसंतर जातक में जेतुतर को शिबि राज्य के राजधानी बतलाया गया है। यह बुद्धकालीन 20 बड़े नगरों में एक नगर था। वेसंतर जातक में जेतुतर को चेतरठ के मातुल नगर से 30 योजन के दूरी पर बताया गया है। नन्दलाल डे ने जेतुतर को आधुनिक चित्तौड़ से 11 मील उत्तर में स्थित नगरी नामक स्थान से अभिन्न माना है। अलबरुनी ने जिस जत्तरूर या जत्तरौर का उल्लेख किया है वह कुछ विद्वानो के अनुसार जेत्ततुर ही है। यह संभावना है कि बुद्धकालीन जेत्रातर से बिगडकर वर्तमान चित्तौड़ बना हो। नगरी में बहुत-सी ताम्र मुद्राएँ मिली है जिन पर 'मज्जिमिका य सिवि जनपदस' लिखा हुआ है। इससे स्पष्ट है कि चितौड़ के समीप मध्यमिका में भी शिबि लोगों का जनपद था। अत: जिस शिबि राज्य के राजधानी वेसंतर जातक में जेतुतर नामक नगरी बतलाई गई है, उसे भरतसिंह उपाध्याय (बुद्धकालीन भारतीय भूगोल) ने चित्तौड़ (राजस्थान) के आसपास का क्षेत्र माना है। इस प्रकार पालि साहित्य के आधार पर हमें शिबि लोगों के दो निवास स्थान मानने पड़ेंगे, एक स्वात घाटी में और दूसरा चितौड़ के आसपास। दशकुमारचरित से ज्ञात होता है शिबि जाति का एक जनपद दक्षिण में कावेरी नदी के तट पर भी स्थित था।



महाभारत में शिबियों के पंजाब से राजस्थान स्थानानान्तरित होने का प्रमाण उपलब्ध है। सभापर्व में शिबि, मालव और त्रिगर्त का एक स्थान पर मरू (राजस्थान) क्षेत्र में उल्लेख आया है। ऐसा प्रतीत होता है कि शिबि गण मध्यमिका में महात्मा बुद्ध के समय विद्यमान था। 200 ई.पू. से 200 ई. के मध्य वहाँ लोग पंजाब से आए होंगे। शिबि जाति का राजस्थान में पदार्पण सिकंदर के आक्रमण के बाद न होकर इंडो-यूनानी आक्रमण के पश्चात् होना अधिक तर्कपूर्ण है। पुष्यमित्र शुंग द्वारा इंडो-यूनानी आक्रमण के बाद शिवि जाति लगभग 187 ई.पू. मध्यमिका में आकर पूर्णतया बस गई होगी। इसकी पुष्टि उनकी मुद्राओं से होती है। प्रसिद्ध विद्वान एच.डी. सांकलिया ने नगरी से शिबिगण के 16 सिक्के एकत्रित किए थे, जिससे संकेत प्राप्त होता है कि यह क्षेत्र शिबिगण के अंतर्गत था। शिबियों की मुद्राओं का श्रीमती शोभना गोखले तथा एस.जे. मंगलम् ने अध्ययन किया था। शिबि-मुद्राओं पर सामान्य रूप से स्वस्तिक का वृषभ के साथ संयुक्त रूप से अंकन उसके चारों कोनो पर हुआ है। इन मुद्राओं पर वृक्ष का अंकन भी मिलता है। वृक्ष पूर्ण चक्र में उत्पन्न होता हुआ प्रदर्शित किया गया है। सिक्के के अग्रभाग पर अर्द्ध वर्तुलाकार उपाख्यान उत्कीर्ण है और छ: मेहराब युक्त पहाड़ के चिह्न का भी अंकन है। कुछ सिक्कों पर पहाड़ी संरचना के ऊपर अलंकरण युक्त नंदीपद है तथा पहाडी के नीचे नदी का अंकन सिक्कों के पृष्ठ भाग पर किया गया है। वृक्ष अंकन की परंपरा शिबिगण के सिक्कों में अन्य गणों के सिक्कों से भिन्न है। अन्य गणों के सिक्कों में 'ट्री इन रेलिंग' के विपरीत शिबि गण के सिक्के में वृक्ष वृत्ताकार या चक्राकार रचना के ऊपर अथवा उसमें से उत्पन्न होते हुए दिखलाया गया है।



सांकलिया को प्राप्त सिक्कों में से एक सिक्के पर वृक्ष का चित्र नहीं है तथा उसके पृष्ठ भाग पर कोई अंकन नहीं है। इस पर केवल उपाख्यान ही अंकित किया गया है। इसी प्रकार यहाँ से प्राप्त एक अन्य सिक्के के अग्रभाग पर सामान्य रूप से अंकित आठ या दस शाखाओं के वृक्ष और वृषभयुक्त स्वस्तिक के स्थान पर केवल वृक्ष की छोटी-सी शाखा ही उत्कीर्ण है। इसमें कोई वर्तुलाकार संरचना भी नहीं है। वृषभ युक्त स्वस्तिक या वृषभ युक्त क्रॉस की संख्या शिबिगण के मुद्राओं के विशेषता थी। कनिंघम छ: मेहराब युक्त पहाड को जो एक विस्तृत नंदीपद से ढका हुआ है, उसे धर्मचक्र मानते है। रोशनलाल सागर शिबिगण के प्राप्त सिक्के पर नंदीपद के आधार पर विद्वान शिबियों को शैव धर्मावलंबी मानते है। पश्चिमी क्षत्रपों के सिक्कों को देखने से ऐसा लगता है कि मेहराब, पहाड, नदी का अंकन मानो उन्होंने शिबियों के नकल करके किया था।


शिबियो की मुद्राओं के अध्ययन से ज्ञात होता है कि-


(1) सभी मुद्राएँ 1.5 सेमी. से 200 से.मी. व्यास की है।

(2) इनकी मोटाई 0.1 सेमी. से 0.3 से.मी. के मध्य है।

(3) इनका भार 1.865 ग्राम से 6.442 ग्राम के मध्य है।

(4) इनके अग्रभाग पर (10 सिक्कों पर) स्वस्तिक चिह्न, 15 पर वृषभ अंकन, 16 पर वृक्ष का अंकन है। 

इन सिक्कों पर उपाख्यान शिबि, शिबिजनपदस्य, झामिकया, शिबिजा मझमिकय शिबिज उत्कीर्ण किया गया है। 13 सिक्कों पर मेहराब, पहाडी, नदी का अंकन है। एक सिक्के के पृष्ठ भाग पर रुभयुक्त स्वस्तिक चिह्न है। पाँच सिक्के दूषित या बिगड़े हुए हैं।



शिबियों के सिक्कों के भार में अंतर बतलाता है कि मुद्रा निर्माण पर कोई केन्द्रीय नियंत्रण नहीं था। कुछ सिक्के घिस गए तो भी चलन में थे जो मुद्रास्फीति फैलने का प्रमाण है। नगरी (चितौड़) से एक अभिलेख मिला था जिसे 200 ई.पू. से 150 ई.पू. का माना जाता है। इस अभिलेख के अनुसार एक पाराशर गौत्रीय महिला के पुत्र गज ने पूजा शिला-प्राकार का नारायण वाटिका में संकर्षण और वासुदेव की पूजा के लिए निर्माण करवाया था। नगरी के ही हाथी बाडा के ब्राह्मी अभिलेख से ज्ञात होता है कि प्रस्तर के चारों ओर दीवार का निर्माण नारायण वाटिका में संकर्षण और वासुदेव की पूजा के लिए सर्वतात जो गाजायन पाराशर गौत्रीय महिला का पुत्र था, ने बनवाया तथा उसने अश्वमेघ यज्ञ भी किया। डी.आर. भंडारकर के अनुसार उपयुक्त अभिलेख से सिद्ध होता है कि दक्षिणी राजस्थान में उन दिनों भागवत धर्म प्रचलित था।

वासुदेव कृष्ण का अब नारायण से तादात्मय स्थापित हो चुका था। इस प्रकार लगभग 200 ई.पू. से 100 ई.पू. के मध्य मध्यमिका क्षेत्र, जो शिबिगण के अधीन था, वहाँ संकर्षण और वासुदेव की पूजा प्रचलित थी। इसके पश्चात् शिबियों का विवरण वृहद् संहिता तथा दशकुमारचरित तथा दक्षिण भारत के अभिलेखों में मिलता है। इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि 200 ई.पू. शिबियो का नगरी पर अधिकार था। बाद में वहाँ पश्चिमी क्षत्रपों के उत्थान के बाद वे लगभग 200 ई. के आसपास नगरी से भी पलायन करके दक्षिणी भारत में चले गए होंगे।

0 टिप्पणियाँ:

Post a Comment

Your comments are precious. Please give your suggestion for betterment of this blog. Thank you so much for visiting here and express feelings
आपकी टिप्पणियाँ बहुमूल्य हैं, कृपया अपने सुझाव अवश्य दें.. यहां पधारने तथा भाव प्रकट करने का बहुत बहुत आभार

स्वागतं आपका.... Welcome here.

राजस्थान के प्रामाणिक ज्ञान की एकमात्र वेब पत्रिका पर आपका स्वागत है।
"राजस्थान की कला, संस्कृति, इतिहास, भूगोल और समसामयिक दृश्यों के विविध रंगों से युक्त प्रामाणिक एवं मूलभूत जानकारियों की एकमात्र वेब पत्रिका"

"विद्यार्थियों के उपयोग हेतु राजस्थान से संबंधित प्रामाणिक तथ्यों को हिंदी माध्यम से देने के लिए किया गया यह प्रथम विनम्र प्रयास है।"

राजस्थान सम्बन्धी प्रामाणिक ज्ञान को साझा करने के इस प्रयास को आप सब पाठकों का पूरा समर्थन प्राप्त हो रहा है। कृपया आगे भी सहयोग देते रहे। आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत है। कृपया प्रतिक्रिया अवश्य दें। धन्यवाद।

विषय सूची

राजस्थान सामान्य ज्ञान (331) Rajasthan GK (295) GK (189) सामान्य ज्ञान (139) क्विज (130) Quiz (111) राजस्थान समसामयिक घटनाचक्र (94) Rajasthan History (79) समसामयिक घटनाचक्र (75) राजस्थान की योजनाएँ (52) समसामयिकी (44) General Knowledge (43) राजस्थान का इतिहास (42) Science GK (38) विज्ञान क्विज (36) योजनाएँ (35) Science Quiz (34) सामान्य विज्ञान (30) Geography of Rajasthan (25) Question and Answer (20) राजस्थान का भूगोल (19) राजस्थान के मेले (19) राजस्थान के किले (18) Forts of Rajasthan (17) Welfare plans of Rajasthan (16) राजस्थान के दर्शनीय स्थल (15) राजस्थानी साहित्य (15) प्रतिदिन क्विज (14) राजस्थान के लोक नाट्य (14) राजस्थान की कला (13) राजस्थान के प्राचीन मंदिर (13) राजस्थान के मंदिर (12) राजस्थानी भाषा (11) राजस्थान के तीर्थ स्थल (10) राजस्थान के लोक वाद्य (9) लोक देवता (9) Folk Musical Instruments of Rajasthan (8) Minerals of Rajasthan (8) राजस्थान के अनुसन्धान केंद्र (8) राजस्थान के प्रमुख पर्व एवं उत्सव (8) राजस्थान के हस्तशिल्प (8) GK राजस्थान समसामयिक घटनाचक्र (7) राजस्थान की चित्रकला (7) विज्ञान सामान्य ज्ञान (7) Tourism (6) अनुसंधान केन्द्र (6) राजस्थान के कलाकार (6) राजस्थान के खिलाड़ी (6) राजस्थान के लोक नृत्य (6) होली है (6) Fairs of Rajasthan (5) Geography of India (5) राजस्थान की जनजातियां (5) राजस्थान की नदियाँ (5) राजस्थान की स्थापत्य कला (5) राजस्थान के ऐतिहासिक स्थल (5) राजस्थान सरकार मंत्रिमंडल (5) राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार (5) Rivers of Rajasthan (4) राजस्थान में प्रजामण्डल आन्दोलन (4) राजस्थान रत्न पुरस्कार (4) राजस्थानी साहित्य की प्रमुख रचनाएं (4) forest of Rajasthan (3) अनुप्रति योजना (3) राजस्थान की जनसंख्या (3) राजस्थान के राज्यपाल (3) राजस्थान के संग्रहालय (3) राजस्थान सरकार के उपक्रम (3) राजस्थान साहित्य अकादमी (3) Handicrafts of Rajasthan (2) Metalic Minerals of Rajasthan (2) Ministers of Govt of India (2) Tourist Circuits (2) जिलानुसार झील व बाँध (2) जिलावार तहसीलों की सूची (2) भूकंप (2) राजस्थान की प्रसिद्ध दरगाहें (2) राजस्थान की मीनाकारी (2) राजस्थान की हवेलियां (2) राजस्थान के आभूषण (2) राजस्थान के जिले (2) राजस्थान के जैन तीर्थ (2) राजस्थान के महल (2) राजस्थान के महोत्सव (2) राजस्थान के रीति-रिवाज (2) राजस्थान के लोक सभा सदस्य (2) राजस्थान मदरसा बोर्ड (2) राजस्थान में कृषि (2) राजस्थान में पशुधन (2) राजस्थान में प्राचीन सभ्यताएँ (2) राजस्‍व मण्‍डल राजस्‍थान (2) राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार (2) Livestock in Rajasthan (1) Major Dialects of Rajasthani (1) folk art (1) अपराजिता (1) क्षेत्रीय सांस्कृतिक केन्द्र (1) तलवारों से गैर (1) बिजौलिया किसान आंदोलन (1) बूंदी का किसान आंदोलन (1) बैराठ की सभ्यता (1) भारत की मृदा (1) भारत की स्थिति (1) भारत के उपग्रह (1) भारत के कमांडर-इन-चीफ (1) भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रम (1) भारतीय मूर्तिकला (1) मीणा आन्दोलन (1) मीणाओं के आराध्य भूरिया बाबा (1) मौर्य तथा प्राचीन राजस्थान (1) रणकपुर (1) राजकीय संग्रहालय अजमेर (1) राजकीय संग्रहालय आहाड़-उदयपुर (1) राजपूताना में 1857 की क्रांति (1) राजपूतों की उत्पत्ति के मत (1) राजसमन्द का राजप्रशस्ति शिलालेख (1) राजस्थान का एकीकरण (1) राजस्थान का खजुराहो जगत का अंबिका मंदिर (1) राजस्थान का चौहान वंश (1) राजस्थान का जलियावाला बाग हत्याकांड (1) राजस्थान का नामकरण (1) राजस्थान का प्रथम मसाला पार्क (1) राजस्थान का राज्य पक्षी गोडावण (1) राजस्थान का राठौड़ वंश- (1) राजस्थान का वैभवशाली मूर्तिशिल्प (1) राजस्थान की खारे पानी की झीले (1) राजस्थान की प्रसिद्ध बावड़ियां (1) राजस्थान की मृदा (1) राजस्थान की वन सम्पदा (1) राजस्थान की वेशभूषा (1) राजस्थान की सीमा (1) राजस्थान की स्थिति एवं विस्तार (1) राजस्थान के अधात्विक खनिज (1) राजस्थान के उद्योग (1) राजस्थान के कला एवं संगीत संस्थान (1) राजस्थान के चित्र संग्रहालय (1) राजस्थान के तारागढ़ किले (1) राजस्थान के धरातलीय प्रदेश (1) राजस्थान के धात्विक खनिज (1) राजस्थान के प्रमुख व्यक्तियों के उपनाम (1) राजस्थान के प्रमुख शिलालेख (1) राजस्थान के प्रसिद्ध साके एवं जौहर (1) राजस्थान के लोक संत (1) राजस्थान के लोकगीत (1) राजस्थान के विधानसभाध्यक्ष (1) राजस्थान के विविध रंग का रिकार्ड (1) राजस्थान के संभाग (1) राजस्थान के संस्थान (1) राजस्थान निवेश संवर्धन ब्यूरो (1) राजस्थान बजट 2011-12 (1) राजस्थान बार काउंसिल (1) राजस्थान में गौ-वंश (1) राजस्थान में पंचायतीराज (1) राजस्थान में परम्परागत जल प्रबन्धन (1) राजस्थान में प्रथम (1) राजस्थान में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संरक्षित स्मारक (1) राजस्थान में वर्षा (1) राजस्थान में सडक (1) राजस्थान सुनवाई का अधिकार (1) राजस्थानी की प्रमुख बोलियां (1) राजस्थानी भाषा का वार्ता साहित्य (1) राजस्थानी साहित्य का काल विभाजन- (1) राजा अजीतसिंह (1) राज्य की जलवायु (1) राज्य ग्रामीण विकास संस्थान (1) राज्य महिला आयोग (1) राज्य वित्त आयोग (1) राज्य सभा सदस्य (1) रावण का श्राद्ध (1) राष्ट्रीय ऊष्ट्र अनुसंधान केन्द्र (1) राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (1) राष्ट्रीय पर्यटन पुरस्कार (1) राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस (1) राष्ट्रीय हस्त शिल्प पुरस्कार (1) लैला मजनूं की मज़ार का मेला (1) विजय सिंह पथिक (1) संसदीय सचिव (1) हेरिटेज वॉक एट फोर्ट कुम्भलगढ़ (1)
All rights reserve to Shriji Info Service.. Powered by Blogger.

Disclaimer:

This Blog is purely informatory in nature and does not take responsibility for errors or content posted in this blog. If you found anything inappropriate or illegal, Please tell administrator. That Post would be deleted.

Sponsors

If you want to sponsor us for better Educational work. You are always welcome. Your donation will be used for better education of poor school children.



Please Contact us at- rajasthanstudy65@gmail.com

Advertise

Advertise here for the sake of better Education in my School situated in Rajasthan. This website has a very good numbers of audience. This website is viewed by thousands of people specially youngsters everyday. So you can get a nice audience for your product or service. You can contact us for advertisement of your business or any other kind of work which you want to explore to our audience. If you want to come along with us, then contact us. You are always welcome..



Contact us at rajasthanstudy65@gmail.com