10/27/2016 01:33:00 pm
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पूर्व के काल में लिखे अथवा लिखवा राजकीय, अर्द्ध राजकीय अथवा लोक लिखित साधन पुरालेख सामग्री के अन्तर्गत आते हैं। फारसी/उर्दू भाषा लिखित पुरालेखा सामग्री जिसमें फरमान, अहकाम, सनद, रुक्का, निशान, अर्जदाश्त, मूसूर, हस्बुलहुक्म, रम्ज, इन्शा, रुकाइयत, वकील रिपोर्ट एवं अखबारात प्राप्त हुए हैं, जबकि राजस्थानी या हिन्दी भाषा में लिखे गए पट्टे-परवानें, रोजनामचे, बहियां, खरीते, खतूत, अर्जियां, अर्जदाश्त, हकीकत, याददाश्त, गांवों के नक्शे, हाले-हवाले, चिट्ठियां, पानडी अखबारात, बाकीयात डायरी आदि इतिहास जानने के उपयोगी मुख्य स्रोत हैं साथ ही अंग्रेजी भाषा में लिखित अथवा प्रकाशित पुरालेखा में राजपूताना एजेन्सी रिकॉर्ड, रिकार्ड्स ऑफ़ फॉरेन एण्ड पोलीटिकल डिपार्टमेन्ट, ट्यूर रिपोर्ट मेमाईस तथा पत्रों आदि के साथ-साथ मेवाड़ और मारवाड़ में संकलित सामग्री उपलब्ध है। ये रिकार्ड्स जयपुर के अतिरिक्त मेवाड़, जोधपुर व कोटा में भी प्राप्त हुए हैं, जिन्हें जोधपुर रिकॉर्ड, बीकानेर रिकॉर्ड अथवा मारवाड़ रिकार्ड्स, जयपुर रिकॉर्ड, कोटा रिकॉर्ड अथवा हाड़ौती रिकार्ड्स, उदयपुर रिकॉर्ड अथवा मेवाड़ रिकार्ड्स कहा जाता है। राजस्थान में मुगल शासकों के प्रभाव तथा उनसे प्रशासनिक संबंधों के कारण 16वीं शताब्दी के पश्चात् विभिन्न राज्यों में राजकीय पत्रों एवं कार्यवाहियों को सुरक्षित रखने का कार्य प्रारम्भ हुआ। मालदेव सम्भवत: मारवाड़ राज्य का वह प्रथम शासक था, जिसने मुगल बादशाह हुमायूं के पुस्तकालयाध्यक्ष मुल्ला सुर्ख को रिकॉर्ड एवं पुस्तक संग्रह हेतु अपने राज्य में नियुक्त किया था। 1562 ई. से आमेर तथा 1510 ई. तक राजस्थान के अधिकांश शासक मुगल बादशाह अकबर के अधीन हो गए थे तथा उन्हें मुगल प्रशासन में मनसबदार, जागीरदार आदि का ओहदा प्राप्त हुआ। इस कारण राजस्थान के राजघरानों में उनके तथा मुगल शासन के मध्य प्रशासनिक कार्यवाहियों का नियमित रिकॉर्ड रखे जाने का क्रम शुरू हो गया। ऐसे ही राज्यों और उनके जागीरदारों के मध्य भी रिकॉर्ड दर्ज किया जाना भी प्रारंभ हुआ। 18-19वीं शताब्दी में मराठा अतिक्रमणों, तथा पिंडारियों की लूट-खसोट के कारण बहुत सारा रिकॉर्ड नष्ट भी हो गया, किन्तु 19वीं शताब्दी के उतरार्द्ध से रियासतों के वर्तमान राजस्थान राज्य में विलय होने तक का रिकॉर्ड पर्याप्त मात्रा में सुरक्षित रूप से मिलता है। जयपुर रिकॉर्ड में 1585 ई. से 1799 ई. के मध्य दिल्ली बादशाहों द्वारा  लिखे गए 140 फरमान, 18 मन्सूर तथा 132 निशान सुरक्षित थे।

सनद, रुक्के, फरमान और मन्सूर -

इतिहास जानने के लिए ताम्र पत्रों, ख्यातों एवं शिलालेखों से भी अधिक महत्वपूर्ण साधन सनद, रुक्के, फरमान आदि हैं, क्योंकि ये ना केवल उन तत्कालीन घटनाओं के समकालीन होते थे बल्कि उनमें उन व्यक्तियों द्वारा लिखाए गए तथ्य होते हैं जो उस समय कार्यरत थे तथा उनमें तथ्यातथ्य वर्णन होता हैबादशाह द्वारा अपने सामन्तों, शहजादों, शासकों या प्रजा को स्वयं अथवा अन्य से फरमान और मन्सूर लिखवाकर भेजा जाता था। इन पत्रों पर तुगरा या राजा का पंजा (हथेली का चिन्ह) लगा रहता था। बादशाह के अतिरिक्त अन्य शहजादी या बेगमों द्वारा से लिखे गए पत्र निशान कहलाते थे। जहाँगीर के शासनकाल में नूरजहां द्वारा भेजे गए निशानों पर जहाँगीर का नाम होता था, किन्तु उस पर नूरजहां की मुद्रा अंकित होती थी। इसको बेगम की मोहर कहा जाता था। किसी को नियुक्ति अथवा अधिकार देने हेतु सनद  पत्र प्रदान किया जाता था। एक प्रकार के निजी पत्र को रुक्का कहा जाता था, किन्तु बाद में राजा की ओर से प्राप्त पत्र को खास रुक्का कहा जाने लगा था। दस्तक नामक पत्र के आधार पर लोग सामान एक स्थान से दूसरे स्थान पर ला और लेजा सकते थे, दरबार अथवा शिविर प्रवेश के लिए भी दस्तक एक प्रकार से आधुनिक परमिट या पास की तरह था।

परवाना-

शासक जो पत्र अपने अधीन अधिकारियों व कर्मचारियों को भेजते थे उन्हें परवाना कहते हैं। इन पत्रों से शासकों की नीति व राजनीतिक दशा आदि के बारे में जानकारी उपलब्ध होती है।

बहियाँ-

विभिन्न राजपूत राज्यों में राजस्थानी भाषा में लिखी गई बहियाँ इतिहास जानने का प्रमुख स्रोत हैं। सबसे प्राचीन बही राणा राजसिंह के समय की प्राप्त हुई है जिसमें मेवाड़ राज्य के परगनों की स्थिति, उनकी वार्षिक आय तथा अन्य प्रकार के हिसाब-किताब लिखा हैइसके पश्चात् दूसरी प्राचीन बही जोधपुर हुकुमत री बही है। इसमें मुगल बादशाह शाहजहां की बीमारी से ओरंगजेब की मृत्यु तक महाराजा जसवंतसिह के संदर्भ में कई राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक स्थितियों का वर्णन है कोटा राज्य की मेहमानी बही,  मिजलिस खर्च बही, मामलिक खर्च बही आदि बहियां वस्त्रों की किस्मों, उनके मूल्य, कोटा के दरवाजों के  निर्माण तथा मरम्मत और महलों  व बागों के रख-रखाव हिसाब-किताब बताने के अलावा कोटा के शासकों का मुगल और मराठाओं से राजनीतिक व आर्थिक सम्बन्धों का विस्तृत वर्णन भी उपलब्ध कराती है। बीकानेर राज्य की पटाका बहियां, पट्टा बही, रोकड़ बही, ॠण बही, हॉसल बही, ब्याज बही, कमठाणा बही, कागदो की बही, जैतपुर बही, ब्याव बही आदि से राज्य की आर्थिक स्थिति के साथ-साथ मुद्रा-मूल्याकंन, कृषि की दशा, प्रजा की दशा, मजदूरी, बाजार मूल्य, जातियों का सामाजिक और आर्थिक स्तर, ग्राम व्यवस्था, किसानों की स्थिति, आवागमन के साधन और किराया, विवाह आदि सामाजिक संस्कारों आदि कई विषयों का ज्ञान प्राप्त होता है।

सीहा हजूर-

जयपुर रिकॉर्ड में सीहा हजूर नामक स्रोत एक प्रकार से दैनिक हिसाब के आमद-खर्च को बतलाने वाली डायरियां हैं। यह खुले पत्रों में लिखी वार्षिक बण्डलों के रुप में बंधी हुई है। इनमें वि.सं. 1735 से वि.सं. 2006 तक के राजसी वस्र, आभूषणों व त्यौहार-पर्व आदि का वर्णन है।

ताजी रिकॉर्ड बहियां-

दैनिक कार्यों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करने वाली बहियों में ताजी रिकॉर्ड बहियां मुख्य हैं। यह  ढूंढाड़ी लिपि में  लिखी हुई है। 18वीं व 19वीं शताब्दी के इतिहास को प्रस्तुत करने में सहायक है। पोतदार रोजनामचा, पीढा रोजनामचा जयपुर शहर के नियोजन तथा लोग-बाग आदि पर प्रकाश डालते हैं।

दस्तूर उल-अमल -

दस्तूर उल-अमल से जयपुर की सामाजिक स्थितियों के साथ-साथ भू-राजस्व के लाग-बाग की जाति के आधार पर वसूली पर प्रकाश पड़ता है। इनसे कृषि और पंचायत व्यवस्थाओं की जानकारी भी मिलती है।

दस्तूर कौमवार-

जयपुर रियासत में वर्णानुक्रम से वर्षों के अनुसार जिल्दों में 32 खण्डों में उपलब्ध राजकार्य का विस्तृत आर्थिक रिकॉर्ड दस्तूर कोमवार के नाम से जाना जाता है। इससे जातियों, व्यवसायों, विशिष्ट सुविधाओं आदि का ज्ञान भी प्राप्त होता है। दस्तूर कौमवार में जयपुर राज्य से संबंधित आय-व्यय भेंट, उपहार, युद्धादि में काम आए  व्यक्तियों को दी गई इज्जत आदि का वर्णन भी मिलता है। इनमें तत्कालीन आभूषणों, वस्त्रों, उत्सव-पर्वों आदि के बारे में काफी जानकारी प्राप्त होती है।

ओहदा बही -

जोधपुर की ओहदा बही में अधिकारियों के अधिकार बढ़ाने अथवा कम करने, शिकायतों, ईनाम आदि राजाज्ञा का उल्लेख है।

पट्टा बही-

इसमें राजस्थान के सभी राजपूत राज्यों के अनुरुप भूमि पट्टों की मूल प्रतियां विद्यमान हैं। इन बहियों से राजपूत शासकों की धार्मिक वृत्ति, सहिष्णु नीति और उदार व्यवहार का पता चलता है।

हथ बही-

हथ बही में राजाओं के निजी संस्मरणों, गुप्त मंत्रणाओं एवं धार्मिक कार्यों आदि का उल्लेख है। इनसे सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक इतिहास की जानकारी मिलती है।

खरीता बही -

एक शासक द्वारा दूसरे शासक को लिखे गये पत्रों को खरीता कहते हैं। पुरानी राजस्थानी लिखावट की शैली के इन पत्रों से शासकों की नीति, उनका मुगलों, मराठों से संबंध, राजाओं के गुप्त समझौते आदि के बारे में जानकारी उपलब्ध होती है। इन खरीतों से राजस्थान के राज्यों के आपसी संबंधों पर भी काफी प्रकाश पड़ता है। साथ ही इन खरीतों से राजस्थान के राज्यों के बीच आपसी संबंधों पर भी प्रकाश पड़ता है। इन पत्रों की बीकानेर के पुराअभिलेखागार ने माइक्रो रील्स बना ली है। जोधपुर रिकॉर्ड खरीता बहियों की संख्या 17 हैं। इनमें जोधपुर के महाराजा द्वारा राजस्थान के विभिन्न शासकों एवं मराठों के नाम भेजे गये पत्र एवं कई जगहों से उनके नाम आये हुए पत्रों की नकले हैं।

ड्राफ्ट खरीता व परवाना-

जयपुर के राजाओं द्वारा भेजे गए खरीतों व परवानों की प्रतियों को ड्राफ्ट खरीता व परवाना के नाम से जाना जाता है। ये पत्र विभिन्न राज्यों के परस्पर संबंधों, तत्कालीन राजनैतिक स्थिति, सैनिक कार्यवाहियों, संधियों आदि बोध करते हैं।

ओहदा बही

अभिलेखागार में इनकी संख्या सात है। इनमें जोधपुर के शासकों के आदेश लिखे हुए हैं। साथ ही राज्य के भ्रष्ट कर्मचारियों के बारे में भी वर्णन मिलता है।

अर्जदाश्त-

राजनीतिक दृष्टि से अवगत कराने तथा अन्य कारण से विभिन्न राज्यों के अधिकारियों व सामंतों द्वारा अथवा जनता के किसी व्यक्ति द्वारा जयपुर के शासक अथवा बादशाह को लिखे गए पत्र व अर्जियां 'अर्जदाश्त' कहलाती है। राजनीतिक दृष्टि से एक दूसरे को अवगत रखने तथा सहायता आदि प्राप्त करने की दृष्टि से इनके बीच पत्रों का आदान-प्रदान बराबर होता रहता था। यदि ऐसी अर्जदाश्तों में बादशाह को विजय के संदेश प्रेषित करता था तो इन्हें फतेहनामा कहा जाता था।

अर्जी बही-

इनमें जोधपुर से विभिन्न मराठा सरदारों को लिखे गये पत्र तथा अधीन कर्मचारियों द्वारा अपने उच्च पदाधिकारी व शासकों को भेजे गये पत्रों का समावेश है।

खास रुक्का बही -

एक प्रकार के निजी पत्र को रुक्का कहा जाता था, किन्तु बाद में राजा की ओर से प्राप्त पत्र को खास रुक्का कहा जाने लगा था। खास रुक्का बही में मारवाड़ के राजाओं द्वारा का अपने अधीन अधिकारियों को लिखे गए पत्रों, आदेशों व निर्देशों का संग्रह है

हकीकत बही-

इसमें शासकों के दैनिक क्रिया कलापों व उनसे मिलने वाले राजनैतिक व्यक्तियों का वर्णन है। इनमें राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक आदि घटनाओं का विस्तृत वर्णन मिलता है। ये बहियां विशेषतया जोधुपर की मिलती है। 15वीं शताब्दी से यहां के अंतिम शासक हनुमंतसिंह तक की हकीकत बहियां मिलती हैं।  प्रत्येक बही में पांच से दस वर्ष तक के समय का वर्णन मिलता है।

अखबारात-

अखबारात मुग़ल दरबार द्वारा प्रकाशित दैनिक बुलेटिनों का संग्रह है जिनसे मुग़ल दरबार की महत्वपूर्ण नियुक्तियों व राजदरबार की कलाकृतियों की जानकारी मिलती है।

वकील रिपोर्ट्स -

जयपुर राज्य की ओर से अपने राज्य के हितों को सुरक्षित रखने के एक राजदूत (वकील) को मुग़ल दरबार में राजा की ओर रखा जाता था, जो दरबार में होने वाली घटनाओं का ब्यौरा शासक को देता था, इनके द्वारा भेजे गए इन पत्रों को वकील रिपोर्ट्स कहते हैं। ये रिपोर्ट्स फारसी और राजस्थानी दोनों भाषाओँ में लिखी हुई मिलती है।

दोवर्की-

दोवर्की से अभिप्रायः दो परतों वाला दस्तावेज है। कोटा राज्य के ये अभिलेख ये तिथिवार और विषयवार जमे हुए हैं। इनमें मुख्यतः दैनिक प्रशासन, युद्ध की तैयारियों का खर्च, कच्चे माल का एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजना, युद्ध के घायलों के उपचार आदि का वर्णन है।

जमाबंदी-

राजस्व सम्बन्धी इन पत्रों में मासिक-वार्षिक चुंगी व जंगलात का हिसाब है। इनमें नए व पुराने करों का वर्णन होने के कारण राज्य की आर्थिक दशा जानने में यह महत्त्वपूर्ण है।

मुल्की बही-

कोटा राज्य की इन बहियों में 3 से 10 वर्षों का हिसाब मिलता है। राज्य की आमदनी, परगनों, युद्ध अभियान, वेतन आदि का ज्ञान प्राप्त होता है।

तलकी -

कोटा राज्य में राजाओं की आज्ञा, अन्य राज्यों के शासकों, सामंतों तथा कर्मचारियों को भेजे गए पत्रों की नक़ल है।

इनके अलावा हकीकत खतूणियां, खजाना बही, खजाना चौपन्या, पट्टा खतूणी, और जालौर रिकॉर्ड की छेरा की बही मारवाड़ के इतिहास हेतु अच्छे अभिलेख साधन है।

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