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राजस्थान में पंचायतीराज एवं ग्रामीण विकास
भारत प्राचीन काल से गांवों का देश रहा है। यहाँ की अधिकांश आबादी गांवों में ही निवास करती थी। भारत की प्राचीन अर्थव्यवस्था मुख्यतः ग्राम प्रधान अर्थव्यवस्थाथी। प्राचीन भारत के हस्त-शिल्प तथा कृषि-उत्पाद विश्वभर में विख्यात थे। ग्रामीण जनता की आवश्यकतायें सीमित थी जिनकी पूर्ति ग्रामीण उत्पादन द्वारा ही पूरी हो जाती थी। गांव आर्थिक दृष्टि से प्रायः आत्मनिर्भर थे। ग्रामीण जनसंख्या व्यावसायिक आधार पर किसानों, दस्तकारों और सेवकों में विभाजित थी। भारत के प्राचीनतम उपलब्ध ग्रन्थ ऋग्वेद में 'सभा' एवं 'समिति' के रूप में लोकतांत्रिक स्वायत्तशासी पंचायती संस्थाओं का उल्लेख मिलता है। गांव के समस्त विवाद उसकी पंचायत द्वारा ही निपटाए जाते थे। देश के विभिन्न राज्यों के नगरों की राजनैतिक उथल पुथलों के बावजूद सत्ता परिवर्तनों से निष्प्रभावित रहकर भी ग्रामीण स्तर पर यह स्वायत्तशासी इकाइयां पंचायतें आदिकाल से निरन्तर किसी न किसी रूप में कार्यरत रही हैं।  ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मध्यस्थों का अभाव था। यद्यपि कृषि ही मुख्य व्यवसाय था, लेकिन अन्य उद्योग भी बड़े प्रसिद्ध थे। अतः हम कह सकते हैं कि भारत में ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है।
ग्रामीण विकास की अवधारणा का सूत्रपात एवं विकास -
‘‘ग्रामीण विकास का तात्पर्य एक ऐसी व्यूह-रचना से है जिसके द्वारा ग्रामीण लोगों के जीवन-स्तर में सुधार तथा उनकी आय व रोजगार के स्तर में वृद्धि का प्रयास किया जाता है।’’
ग्रामीण विकास के संबंध में महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘‘भारत की आत्मा गांवों में बसती है। जब तक गांवों का विकास नहीं होगा तथा गांव पुनः आत्मनिर्भर नहीं होगें, तब तक देश का विकास नहीं हो सकता।’’ उनके इसी कथन से देश में ग्रामीण विकास की अवधारणा का सूत्रपात हुआ। गांधीजी की उपर्युक्त अवधारणा को स्वीकार करते हुए प्रथम पंचवर्षीय योजना में कृषि विकास को उच्च प्राथमिकता दी गई। लेकिन इसके बाद पं. नेहरु ने महालानोबिस के मॉडल के आधार पर औद्योगिक विकास पर अधिक बल दिया। लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान-जय किसान का नारा देकर कृषि के महत्व को पुनः प्रतिष्ठित किया तथा श्रीमती इंदिरा गांधी एवं परवर्ती राष्ट्रीय नेताओं ने भी ग्रामीण विकास का मार्ग प्रशस्त किया ।
सामुदायिक विकास का अर्थ-
ग्रामीण विकास प्रक्रिया का ही एक अंग है सामुदायिक विकास, जिसके तहत गाँव के सभी समुदायों के विकास पर जोर देकर इसके द्वारा सामाजिक असमानता को कम करने का प्रयास किया जाता है। सामुदायिक विकास की अवधारणा को साकार करने के लिए सरकार द्वारा देश में पंचायती राज संस्थाओं की स्थापना की है।
संविधान में पंचायतीराज व्यवस्था -
भारत के संविधान के अनुच्छेद 40 में कहा गया है कि राज्य 'ग्राम पंचायत' का संगठन करने के लिए प्रभावी कदम उठाएगा तथा उसको ऐसी शक्तियां और अधिकार प्रदान करेगा जो उन्हें स्वायत शासन की इकाईयों के रूप में कार्य करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक है। भारतीय संविधान के वर्तमान प्रावधानों के अनुसार भारत के प्रत्येक राज्य को त्रिस्तरीय पंचायती राज की व्यवस्था अपनाए जाने का सामान्य निर्देश दिया गया है। ग्रामीण विकास के उद्देश्य के तहत भारत के अधिकांश राज्यों में पंचायत राज संस्थाओं के गठन के लिए अधिनियम पारित किए गए। इन्ही प्रावधानों में 20 लाख से कम की जनसंख्या वाले राज्यों को पंचायती राज की मध्यवर्ती इकाई के गठन से छूट प्रदान की गई है।
बलवन्तराय मेहता समिति (1957) -
पंचायती राज व्यवस्था को मजबूत करने के लिए बलवंत राय मेहता की अध्यक्षता में 'बलवन्तराय मेहता समिति' का गठन 1956 में किया गया। बलवन्त राय मेहता समिति ने 24 नवम्बर, 1957 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। पंचायत राज व्यवस्था को मेहता समिति ने 'लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण' का नाम देते हुए ग्रामीण स्थानीय शासन के लिए त्रिस्तरीय व्यवस्था का सुझाव दिया, जो इस प्रकार था-
1. ग्राम स्तर पर - ग्राम पंचायत
2. खंड स्तर पर - पंचायत समिति
3. जिला स्तर पर - जिला परिषद
इस समिति की सिफारिशों के अनुसार स्थानीय शासन की इस त्रि-स्तरीय योजना में पंचायत समिति सबसे महत्वपूर्ण संस्था है। मुख्य विकास कार्य पंचायत समिति को ही सौपें गए हैं और जिला परिषद का कार्य तो पंचायत समितियों के कार्य संचालन एवं उनमें तालमेल स्थापित करना है।
बलवंत राय मेहता समिति की अनुशंसाओं के अनुरूप दिनांक 2 अक्टूबर, 1959 को भारत में पंचायत राज व्यवस्था का शुभारम्भ तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने राजस्थान के नागौर जिले से किया।
अशोक मेहता समिति (1977) -
बलवंत राय मेहता समिति की सिफ़ारिशों के आधार पर स्थापित पंचायती राज व्यवस्था में व्याप्त कमियों को दूर करने की सिफ़ारिश करने हेतु 1977 में अशोक मेहता समिति का गठन किया गया। इस समिति में 13 सदस्य थे। समिति ने 1978 में अपनी रिपोर्ट केन्द्र सरकार को सौंप दी, जिसमें 132 सिफ़ारिशें की गयी थीं, किन्तु इन्हें सही नहीं मानते हुए इसे अस्वीकार कर दिया गया।
भारत में पंचायती राज संस्थाओं का संगठन एवं कार्यों को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है।
ग्राम सभा -
पंचायतीराज व्यवस्था में ग्राम सभाओं का विशेष महत्व माना गया है। यद्यपि बलवन्त राय मेहता समिति ने पंचायतीराज के ढांचे में ग्राम सभा को कोई स्थान नहीं दिया था, फिर भी पंचायतीराज को अपनाने वाले राज्यों ने ग्राम सभा की रचना का महत्व स्वीकार किया और इसे पंचायतीराज व्यवस्था के आधार के रुप में विकसित किया है। यह माना गया है कि ग्राम स्तर पर पंचायत, ग्राम सभा से ही अपने अधिकार ग्रहण करें और ग्राम सभा के प्रति निरन्तर उत्तरदायी रहे, क्योंकि ग्राम सभा में गांव के सभी वयस्क नागरिक सम्मिलित होते हैं।
''वस्तुतः किसी भी पंचायत क्षेत्र के समस्त वयस्क नागरिकों के सम्मिलित स्वरुप या समूह को ग्राम सभाकहते हैं।''
ग्राम सभा का गठन-
राजस्थान पंचायतीराज अधिनियम 1994 के अनुसार प्रत्येक पंचायत सर्किल के लिए एक ग्राम सभा के गठन का प्रावधान किया गया है, जिसमें पंचायत क्षेत्र के भीतर समाविष्ट गांव या गांवों के समूह से सम्बन्धित निर्वाचक नामावलियों में पंजीकृत व्यक्ति होंगे।
18 वर्ष की आयु प्राप्त करने वाला प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह किसी भी जाति या लिंग का हो, ग्राम सभा का सदस्य हो सकता है।
1. ग्राम पंचायत -
ग्राम पंचायत ग्राम स्तर पर एक ऐसी निर्वाचित इकाई है जो ग्राम सभा की कार्यकारी इकाई होती है। पंचायतीराज व्यवस्था में यह निम्नस्तरीय इकाई है। भारत में ग्राम पंचायत को भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है। राजस्थान में इसे 'ग्राम पंचायत' के नाम से जाना जाता है। हमारे देश में औसतन लगभग 2 हजार की जनसंख्या पर एक पंचायत गठित की जाती है। विभिन्न राज्यों में ग्राम पंचायतों के सदस्यों की संख्या सामान्यतया 5 से लेकर 31 के बीच होती है। वर्तमान में भारतीय संविधान में किए गए 73 वें संशोधन के पश्चात् देश में लगभग सभी राज्यों में पंचायतों का कार्यकाल 5 वर्ष कर दिया गया है। पंचायत के सदस्य 'पंच' कहलाते है और उनका चुनाव प्रत्यक्ष रुप से किया जाता है।
2. पंचायत समिति -
पंचायत समिति पंचायती राज व्यवस्था का मध्यवर्ती स्तर है। इस स्तर को राजस्थान, बिहार, आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र व उड़ीसा में 'पंचायत समिति' कहते है । 73 वें संविधान संशोधन अधिनियम के अनुसार वर्तमान में पंचायत समितियों का कार्यकाल 5 वर्ष का है। राजस्थान ही नहीं, वरन् अन्य प्रान्तों में भी पंचायती राज व्यवस्था में 'पंचायत समिति' को महत्वपूर्ण इकाई माना गया है। यह विकास के कार्यक्रम बनाती है और उन्हें कियान्वित करती है। इसे अधिनियम द्वारा मौलिक, प्रशासनिक और वित्तीय कार्य व शक्तियां सौपी गई है।
3. जिला परिषद्  -
पंचायती राज व्यवस्था में सबसे शीर्ष पर प्रत्येक जिले में एक जिला-परिषद होती है। राजस्थान, बिहार, उड़ीसा, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, मध्यप्रदेश तथा प. बंगाल में इसे जिला परिषदही कहते हैं। गुजरात सरकार द्वारा पंचायत अधिनियम का 1986 तक जो संशोधित प्रारुप प्रकाशित किया गया है उसके अनुसार जिला स्तरीय इकाई को जिला पंचायतका नाम दिया गया है। 73 वें संविधान संशोधन के पश्चात् प्रायः सभी राज्यों में इसे जिला परिषद या जिला पंचायत कहा गया है।
73 वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1993 -
पंचायती राज संस्थाओं को स्वशासित संस्थाओं के रुप में विकसित करने के लिए केन्द्र सरकार ने 24 अप्रैल, 1993 को संविधान के 73वें संविधान संशोधन विधेयक को लागू कर पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक अहमियत प्रदान की। 73 वें संविधान संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं को वैधानिक मान्यता प्रदान की गई है।
73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1993 की कुछ प्रावधान निम्नलिखित हैं -
1. पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक स्तर -
73 वां संविधान संशोधन अधिनियम पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक स्तर प्रदान करने के लिए लाया गया है। इस अधिनियम द्वारा पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता और चुनावों से संबंधित प्रत्याभूति प्रदान की गई है। फलतः अब इन संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता प्राप्त हो गई है।
2. ग्राम सभा का प्रावधान -
73वां संविधान संशोधन अधिनियम यह उपबन्ध करता है कि ग्राम स्तर पर ग्रामसभा होगी जो ऐसी शक्तियों का संव्यवहार और कर्तव्यों का निर्वाह कर सकेगी जो राज्य विधानमण्डल अधिनियम द्वारा विनिश्चित करें। राजस्थान में वर्ष में कम से कम चार बार ग्रामसभा के आयोजन का प्रावधान किया गया है।
3. पंचायती राज संस्थाओं का गठन -
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243 ख यह प्रावधान करता है कि प्रत्येक राज्य में ग्राम स्तर पर, मध्यवर्ती स्तर पर और जिला स्तर पर पंचायती राज संस्थाओं का गठन किया जाएगा, किन्तु उस राज्य में जिसकी जनसंख्या 20 लाख से अधिक नहीं है।
4. पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव -
पंचायती राज की मध्यवर्ती व जिला स्तरीय इकाइयों के सभापति/अध्यक्ष के चुनाव के लिए इस संशोधन से यह प्रावधान किया गया है कि संबंधित इकाइयों के निर्वाचित सदस्य अपने में ही से एक को सभापति/अध्यक्ष के रुप में निर्वाचित कर सकेंगे।
5. पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों में आरक्षण -
पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों में आरक्षण के संबंध में 73 वां संविधान संशोधन के माध्यम से निम्न प्रावधान किए गए है -
(i) अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए आरक्षण -
प्रत्येक पंचायत क्षेत्र में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लिए निर्वाचन हेतु स्थानों/सीटों का आरक्षण किया जाएगा। इन वर्गों के लिए उपर्युक्त रीति से आरक्षित की गई कुल सीटों में कम से कम एक-तिहाई स्थान अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए आरक्षित किए जाएंगे।
(ii) महिलाओं के लिए आरक्षण -
73वें संविधान संशोधन के माध्यम से प्रत्येक पंचायती राज संस्था के चुनावों में महिलाओं हेतु स्थानों का आरक्षण भी किया गया है। एक-तिहाई स्थानों को महिलाओं के लिए आरक्षित किया जाएगा और इस प्रकार आरक्षित किए गए स्थानों का आवर्तन बारी-बारी से किया जाता रहेगा।
(iii) सभापति/अध्यक्ष के लिए आरक्षण -
संविधान अधिनियम में यह भी प्रावधान किया गया है कि ग्राम पंचायत व पंचायती राज की अन्य इकाईयों के अध्यक्ष/सभापति के पद भी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व महिलाओं के लिए, राज्य विधानमण्डल अधिनियम बनाकर प्रक्रिया निर्धारित करते हुए आरक्षित किए जा सकेंगे।
(iv) पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण -
संविधान संशोधन अधिनियम में यह भी प्रावधान किया गया है कि राज्य विधान मण्डल, समस्त पंचायती राज संस्थाओं में पिछड़े वर्गों के लिए भी आरक्षण का प्रावधान, अधिनियम बनाकर कर सकेंगे।
6. कार्यकाल-
73 वें संविधान संशोधन अधिनियम के अनुसार प्रत्येक पंचायती राज इकाई का कार्यकाल, यदि यह राज्य में तत्समय प्रवर्तित किसी विधि के अधीन पहले भंग नहीं कर दी जाती है तो 5 वर्ष का होगा और इससे अधिक नहीं। अधिनियम में यह भी प्रावधान किया गया है कि इन संस्थाओं के चुनाव उनके निर्धारित कार्यकाल समाप्त होने के पूर्व कराए जाएंगे, और यदि ये संस्थाएं समय से पूर्व भंग कर दी जाती हैं तो भंग किए जाने की तिथि से 6 माह की अवधि में नये चुनाव कराए जाने होंगे।
7. अर्हताओं के सम्बन्ध में प्रावधान -
73वें संविधान संशोधन अधिनियम में कहा गया है कि सम्बन्धित राज्य में चुनाव की अनर्हताओं या अयोग्यताओं से सम्बन्धित प्रवर्तित किसी कानून द्वारा अयोग्य घोषित किए जाने पर व्यक्ति इन संस्थाओं के चुनावों में भाग नहीं ले सकेगा।
8. पंचायती राज संस्थाओं की शक्तियां और दायित्व -
संविधान संशोधन अधिनियम में कहा गया है कि संविधान के प्रावधानों के अधीन रहते हुए राज्य विधान मण्डल कानून बनाकर इन संस्थाओं को स्वायत्त शासन की इकाइयों के रुप में कार्य करने में सक्षम बनाने के लिए आवश्यक शक्तियां एवं सत्ता दे सकेंगे।
9. कर लगाने व कोष एकत्रित करने की शक्तियां -
73वें संविधान संशोधन मे यह प्रावधान है कि जो कर राज्य सरकार द्वारा लगाए जाएंगे उनका राज्य सरकार व पंचायती राज इकाइयों के मध्य वितरण किया जा सकेगा और जो कर पंचायती राज संस्थाएं आरोपित करेंगी उन्हें न केवल एकत्र कर सकेंगी अपितु उनका व्यय भी अपने स्तर पर कर सकेंगी।
10. वित आयोग के गठन का प्रावधान -
संविधान संशोधन अधिनियम में यह व्यवस्था की गई है कि राज्यों के राज्यपाल 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के लागू होने के एक वर्ष की अवधि में और उसके पश्चात् प्रति 5 वर्ष के अन्तराल पर राज्यों की पंचायती राज संस्थाओं की वित्तीय स्थिति की समीक्षा और संस्थाओं की वित्तीय स्थिति में सुधार के लिए किए जाने वाले उपायों तथा वित्तीय स्वरुप के संदर्भ में सौंपे गए किन्हीं भी अन्य कार्यों का निष्पादन करने के लिए राज्य वित्त आयोग का गठन करेंगे।
11. पंचायती राज संस्थाओं के लेखा व अंकेक्षण के सम्बन्ध में प्रावधान-
संविधान संशोधन अधिनियम में यह भी प्रावधान है कि विभिन्न स्तर की पंचायती राज संस्थाओं द्वारा रखे जाने वाले लेखे व उसके अंकेक्षण के सम्बन्ध में, राज्य विधान मण्डल विधि बनाकर आवश्यक प्रावधान कर सकेंगे।
12. चुनावों से सम्बन्धित प्रावधान -
73 वां संविधान संशोधन अधिनियम यह भी व्यवस्था करता है कि राज्य में निर्वाचक नामावलियों की तैयारी, चुनावों के आयोजन और पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों से सम्बन्धित समस्त पक्षों का अधीक्षण, निर्देशन और नियन्त्रण राज्यपाल द्वारा नियुक्त किए गए एक राज्य निर्वाचन आयोग में निहित होगा।
13. ग्रामसभा के अधिकार एवं शक्तियों में वृद्धि -
73 वें संविधान संशोधन अधिनियम के अन्तर्गत ग्रामसभा को गौण वनोत्पदों के स्वामित्व, विकास योजनाओं की मंजूरी, विभिन्न कार्यक्रमों के लाभार्थियों के चयन, भू-अधिग्रहण के बारे में परामर्श, गौण जलाशयों आदि के प्रबंध, खनिज पट्टों के नियन्त्रण, नशीले पदार्थों की बिक्री के नियमन/निषेध, अनुसूचित जनजातियों की भूमि के अवैध हस्तांतरण को रोकने तथा ऐसी हस्तान्तरित भूमि वापस दिलाने, गांव की मण्डियों के प्रबन्ध, अनुसूचित जनजातियों को दिये जाने वाले ऋण पर नियन्त्रण और सभी सामाजिक क्षेत्रों में संस्थाओं और कार्यकर्ताओं के नियन्त्रण सम्बन्धी शक्तियां प्रदान की गई हैं।
14. जिला समितियों का गठन -
73 वें संविधान संशोधन के अनुसार सम्पूर्ण जिले की विकास योजना का मसौदा तैयार करने के लिए जिला नियोजन समिति का गठन किया जाएगा।
15. पंचायतों के कार्य -
संविधान की 11वीं अनुसूची  (अनुच्छेद 243G) में 29 विषय सम्मिलित किए गए हैं, जिन पर पंचायतें विधि या कानून बनाकर जिन कार्यो को कर सकेंगी, वे इस प्रकार हैं-
1.    कृषि जिसके अन्तर्गत कृषि विस्तार भी शामिल है
2.    भूमि सुधार, भूमि सुधार कार्यान्वयन, चकबंदी और भूमि संरक्षण
3.    लघु सिंचाई, जल प्रबंध और जल आच्छादन तथा अन्य कार्य
4.    पशुपालन, डेयरी और पोल्ट्री
5.    मत्स्य पालन
6.    सामाजिक वानिकी
7.    लघु वनोपज
8.    लघु उद्योग
9.    खादी, ग्राम और कुटीर उद्योग
10.    ग्रामीण आवास.
11.    पेयजल
12.    ईंधन और चारा
13.    सड़क, पुलिया, पुल, घाट, जलमार्ग और संचार के अन्य साधन
14.    बिजली के वितरण सहित ग्रामीण विद्युतीकरण.
15.    गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोत
16.    गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम
17.    प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों सहित शिक्षा
18.    तकनीकी प्रशिक्षण और व्यावसायिक शिक्षा
19.    प्रौढ़ और अनौपचारिक शिक्षा
20.    पुस्तकालय
21.    सांस्कृतिक गतिविधियाँ
22.    बाजार और मेले
23.    अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों और डिस्पेंसरियों सहित स्वास्थ्य और स्वच्छता,
24.    परिवार कल्याण
25.    महिला एवं बाल विकास
26.    विकलांग और मंदबुद्धि के कल्याण सहित सामाजिक कल्याण
27.    कमजोर वर्गों का कल्याण तथा अनुसूचित जातियों और जनजातियों का विशेष रूप से
28.    सार्वजनिक वितरण प्रणाली
29.    समुदायिक परिसंपत्तियों का अनुरक्षण
विधेयक की विशेषताएं-
नई पंचायती राज व्यवस्था की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें समाज के कमजोर वर्गों एवं महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित किए जाने की योजना है। राजस्थान में तो अन्य पिछड़ा वर्ग को भी आरक्षण प्रदान दिया गया है।
दूसरी विशेषता यह है कि पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल सुनिश्चित किया गया है। बीच में एक समय ऐसा आया जब पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव उपेक्षित से हो गए। वर्षों तक इन संस्थाओं के चुनाव नहीं हुए जिससे जनसाधारण की इस व्यवस्था के प्रति आस्था डगमगाने लगी। इसी आस्था को पुनः 73वें संविधान संशोधन ने पुनःकायम किया है।
तीसरी विशेषता पंचायती राज संस्थाओं को व्यापक शक्तियां प्रदान किया जाना है। संविधान में 11वीं अनुसूची जोड़कर पंचायती राज संस्थाओं के अधिकार एवं शक्तियां सुनिश्चित कर दी गई।
राजस्थान पंचायती राज अधिनियम 1994 -
भारत में शहरी स्थानीय निकायों को सशक्त बनाने तथा इन्हें संवैधानिक आधार प्रदान करने के उद्देश्य से भारतीय संसद द्वारा 1992 में पारित और 1 जून 1993 से लागू नगरपालिकाएं' शीर्षक से नया भाग जोड़ा गया है।
राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 की प्रमुख विशेषताऐं-
1. 24 अप्रैल, 1994 से लागू -
राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 को राज्य सरकार द्वारा विधानसभा में पारित करवा कर 24 अप्रैल, 1994 से सम्पूर्ण राज्य में लागू कर दिया गया है।
2. ग्रामसभा -
राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 के अनुसार राज्य में प्रत्येक पंचायत सर्किल के लिए एक ग्रामसभा होगी जिसमें पंचायत क्षेत्र के भीतर समाविष्ट गांव या गांवों के समूह संबंधित निर्वाचक नामावलियों में पंजीकृत व्यक्ति सदस्य होगें। जनवरी 2000 में एक अध्यादेश द्वारा ग्रामसभा के स्थान वार्ड ग्राम सभा का प्रावधान किया गया है। वार्ड सभा की प्रतिवर्ष कम-से-कम दो बैठकें होंगी।
ग्रामसभा के कार्य -
(i) पंचायत क्षेत्र से संबंधित विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में सहायता करना,
(ii) ऐसे क्षेत्र से संबंधित विकास योजनाओं के क्रियान्वयन हेतु हिताधिकारियेां की पहचान
(iii) सामुदायिक कल्याण कार्यक्रमों के लिए स्वैच्छिक श्रम और वस्तु रुप में या नकद दोनों ही प्रकार के अभिदान जुटाना,
(iv) ऐसे क्षेत्र के भीतर प्रौढ़ शिक्षा और परिवार कल्याण को प्रोत्साहित करना,
(v) पंचायत क्षेत्र में समाज के सभी समुदायों में एकता और सौहार्द्र बढ़ाना,
(vi) किसी भी क्रियाकलाप, योजना, आय और व्यय-विशेष के बारे में पंचायत के सरपंच और सदस्यों से स्पष्टीकरण चाहना, तथा
(vii) अन्य कार्य, जो विहित किए जायें।
3. पंचायत की स्थापना -
राज्य सरकार, किसी नगरपालिका या किसी छावनी बोर्ड में शामिल नहीं किए गए किसी गांव या गाँवों के किसी समूह को समाविष्ट करने वाली किसी भी स्थानीय क्षेत्र की पंचायत सर्किल घोषित कर सकेगी तथा इस घोषित सर्किल के लिए एक पंचायत होगी।
4. पंचायत समिति की स्थापना -
राज्य सरकार एक ही जिले के भीतर के किसी भी स्थानीय क्षेत्र को एक खण्ड के रुप में घोषित कर सकेगी तथा इस घोषित प्रत्येक खण्ड के लिए एक पंचायत समिति होगी।
5. जिला परिषद् की स्थापना -
प्रत्येक जिले के लिए एक जिला परिषद् होगी जिसकी संरचना इस प्रकार होगी -
(i) इतने प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्षतः निर्वाचित सदस्य जो अनुच्छेद 14 (2) के अधीन अवधारित किए जायें,
(ii) ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों का प्रनिधित्व करने वाले लोकसभा के और राज्य विधानसभा के सभी सदस्य जिनमें जिला परिषद क्षेत्र सम्पूर्णतः या अंशतः समाविष्ट है।
(iii) जिला परिषद क्षेत्र के भीतर निर्वाचकों के रुप में पंजीकृत राज्यसभा के सभी सदस्य।
6. स्थानों का आरक्षण -
राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 में व्यवस्था है कि प्रत्येक पंचायती राज संस्था इसी क्रम में यह भी प्रावधान है कि प्रत्येक पंचायती राज संस्था में प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरे जाने वाले स्थानों की कुल संख्या के एक-तिहाई से अन्यून स्थान जिनमें अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़े वर्गों की महिलाओं के लिए आरक्षित स्थानों की संख्या में विभिन्न वार्डों या निर्वाचन क्षेत्रों के लिए चक्रानुक्रम द्वारा ऐसी रीति से आवंटित किए जायेगें जो विहित किए जायें।
7. अध्यक्षों के पदों का आरक्षण -
राजस्थान पंचायती राज अधिनियम के तहत सरपंचों, प्रधानों, जिला प्रमुखों के पद अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, पिछड़े वर्गों तथा महिलाओं के लिये आरक्षित किए गए है।
8. पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल और निर्वाचन -
प्रत्येक पंचायती राज संस्था यदि पहले विघटित नहीं कर दी जाये तो सम्बन्धित संस्थाओं की प्रथम बैठक के लिए राज्य सरकार द्वारा नियत तारीख से पांच वर्ष तक बनी रहेगी, इससे अधिक नहीं। किसी पंचायती राज संस्था का गठन करने हेतु निर्वाचन उसके कार्यकाल की समाप्ति के पूर्व और विघटन की स्थिति में, उसके विघटन की तारीख से छः मास की कालावधि की समाप्ति से पूर्व पूरा किया जाएगा। अधिनियम में यह भी प्रावधान है कि यदि भंग की हुई संस्था का कार्यकाल निर्धारित कार्यकाल 6 महीने से कम रह गया है तो ऐसे चुनाव करवाये जाने आवश्यक नहीं होंगे। भंग किए जाने के पश्चात् नई चुनी हुई पंचायती राज इकाई, उस शेष अवधि के लिए ही कार्य करेगी जितनी अवधि के लिए वह इकाई कार्य करती, यदि वह भंग नहीं होती।
9. पंचायत सलाहकार समिति-
राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 में प्रत्येक पंचायत स्तर पर प्रशासक को सलाह देने के लिए सलाहकार समिति गठित करने का प्रावधान किया हुआ है। अधिनियम की अनुपालना में राजस्थान सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर इस प्रकार की समितियों का गठन कर दिया है।
सचिव, ग्राम पंचायत या ग्रामसेवक को इस सलाहकार समिति का अध्यक्ष बनाया गया है।
10. राज्य वित्त आयोग -
राजस्थान पंचायती राज अधिनियम 1994 में यह व्यवस्था है कि राज्य सरकार अधिसूचना जारी कर पंचायतों के लिए राज्य वित्त आयोग का गठन कर सकेगी।
11. दोहरी सदस्यता पर निर्बन्धन -
कोई भी व्यक्ति, राजस्थान पंचायती राज अधिनियम द्वारा अभिव्यक्ततः प्राधिकृत के सिवाय दो या अधिक पंचायती राज संस्थाओं का सदस्य नहीं होगा।
राजस्थान पंचायती राज (संशोधन) अध्यादेश, 2000 -
राजस्थान सरकार द्वारा राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 में 7 जनवरी, 2000 को एक अध्यादेश जारी कर अनेक संशोधन किए गए हैं। इस अध्यादेश के माध्यम से पंचायत समितियों को और अधिकार एवं शक्तियां प्रदान की गई है।
राजस्थान पंचायती राज (संशोधन) अध्यादेश, 2000 के प्रमुख प्रावधान-
1. ग्रामसभा के साथ साथ वार्ड सभा की भी व्यवस्था की गई है। इस दृष्टि से राजस्थान देश का पहला ऐसा राज्य है। अब वार्ड सभा के माध्यम से ही उस वार्ड में गरीबी की रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों को लाभान्वित किया जाएगा।
2. वार्ड सभा ही वार्ड विकास की योजनाऐं बनाने एवं अन्य महत्वपूर्ण कार्य करवायेगी। इस सभा की वर्ष में कम-से-कम दो बैठकें अवश्य होंगी।
3. वार्डसभा की सभी बैठकों में ऐसा कोई भी विषय जिसे पंचायत, पंचायत समिति, जिला परिषद्, राज्य सरकार या इसके लिए अधिकृत कोई भी अधिकारी रखे जाने की अपेक्षा करे, रखा जा सकता है।
4. वार्ड सभा सरकार की विभिन्न प्रकार की कल्याणकारी सहायता प्राप्त करने वाले व्यक्तियों की पात्रता को सत्यापित करेगी।
5. ग्राम पंचायत क्षेत्र के लिए एक ग्रामसभा होगी, जिसमें पंचायत क्षेत्र के सभी गांव से संबंधित निर्वाचक नामावलियों में पंजीकृत व्यक्ति सदस्य होंगे।
6. ग्रामसभा की एक वर्ष में कम-से-कम दो बैठकें अवश्य होगी।
7. ग्रामसभा का कार्य सामाजिक तथा आर्थिक विकास की योजनाओं एवं कार्यक्रमों तथा वार्ड सभा द्वारा अनुमोदित योजनाओं तथा कार्यक्रमों को पंचायत द्वारा लागू करने के लिए हाथ में लेने से पूर्व अनुमोदन करना है।
8. जिस वर्ग के वार्ड सरपंच (जैसे अनुसूचित जाति) को हटाया जाएगा, उसके स्थान पर उसी वर्ग (केवल अनुसूचित जाति) का वार्ड उप-सरपंच कार्यभार ग्रहण कर सकता है।
9. निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के हस्तक्षेप को रोकने के लिए यह व्यवस्था की गई है कि वहां गठित स्थायी समिति के अध्यक्ष के साथ मिलकर संस्था का कार्य चलाया जाएगा।
10. दो से अधिक बच्चे होने पर व्यक्ति पंचायत चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हो जाएगा।
11. पंचायत स्तर पर स्थायी समिति एवं सतर्कता समिति के गठन का प्रावधान है।
12. पंचायत की ऋण राशि नहीं चुकाने वाले व्यक्ति को चुनाव के अयोग्य घोषित किया गया है।
13. पंचायत चुनावों के लिए खर्च की सीमा निर्धारित की गई है। यह खर्च पोस्टर, बैनर, पर्चे आदि पर सरपंच पद के लिए पांच हजार रुपये, पंचायत समिति सदस्य के लिए दस हजार रुपये तथा जिला परिषद् सदस्य पद के लिए बीस हजार रुपये अधिकतम निर्धारित किया गया है।
पंचायत समिति के कार्य व शक्तियां:-
1. सरकार द्वारा दी गई योजनाओं का प्रभावी तरीके से क्रियान्वन करवाना एवं प्राकृतिक आपदाओं में सहायता उपलब्ध करवाना।
2. कृषि विकास को प्रोत्साहित करते हुए कृषि साख का विस्तार करना।
3. भूमि सुधार एवं मुद्रा संरक्षण कार्यक्रमों का विस्तार ।
4. गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों का आयोजन एवं क्रियान्वयन करना।
5. मछली पालन को प्रोत्साहित करना।
6. पशुपालन सेवाओं का निरीक्षण एवं क्रियान्वयन तथा नई नस्ल का सुधार।
7. खादी एवं ग्रामीण व कुटीर उद्योग के विकास के लिए हरसंभव प्रयास करना।
8. ग्रामीण आवासन स्कीमों का क्रियान्वयन एवं उधार किश्तों की वसूली ।
9. जल प्रदूषण का निवारण एवं नियंत्रण तथा स्वच्छ पेयजल की सुविधा उपलब्ध करवाना।
10. शिक्षा के विकास को बढ़ावा देना तथा भवनों एवं अध्यापकों को समुचित व्यवस्था करना।
11. स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण कार्यक्रमों के बारे में लोगों को बताना तथा कार्यक्रमों का क्रियान्वयन करना।
12. महिला एवं बाल विकास से संबंधित कार्यक्रमों का क्रियान्वयन ।
13. सहकारिता आन्दोलन द्वारा लोगो की समूह में कार्य करने के लिए प्रेरित करना।
14. सामुदायिक सम्पतियों का रखरखाव एवं नियन्त्रण ।
पंचायती राज संस्थाओं का सशक्तिकरण -
जनवरी 2000 को अधिसूचना जारी कर पंचायती राज संस्थाओं के अधिकारों में वृद्धि की गई है कुछ मुख्य अधिकार इस प्रकार है:-
1. प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र एवं उपकेन्द्र पंचायतीराज के अधीन कर दिए गए है। इन संस्थाओं पर तकनीकी नियन्त्रण चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग का रहेगा, लेकिन प्रशासनिक नियन्त्रण जिला परिषद का होगा।
2. जनस्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के सभी कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू करने का उत्तरदायित्व पंचायतीराज संस्थाओं को सौंपा गया है।
3. ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित श्रेणी के आयुर्वेदिक औषधालयों का नियन्त्रण पंचायतीराज संस्थाओं को सौंपा गया है, लेकिन इन पर तकनीकी नियन्त्रण आयुर्वेदिक विभाग का ही रहेगा।
4. एकीकृत ग्रामीण उर्जा कार्यक्रम के तहत गैरपरम्परागत ऊर्जा गतिविधियां जैसे स्ट्रीट लाईट, घरेलू बिजली आदि का क्रियान्वयन इन्हीं संस्थाओं के मार्फत होगा।
5. हैण्डपम्प संधारण का सम्पूर्ण कार्य, स्टाफ और बजट के साथ पंचायतीराज संस्थाओं को धीरे-धीरे सौंपा जाएगा।
6. पशु उपचिकित्सा केन्द्र भी इन संस्थाओं को हस्तान्तरित किए गए है।
7. ग्राम वन सुरक्षा समिति।
8. मछलीपालन तालाबों का संधारण एवं आवंटन का कार्य भी इन्हें सौंपा गया है।
9. एकीकृत ग्रामीण विकास योजनाओं के तहत जलग्रहण विकास के कार्यों में पंचायतीराज।
10. कृषि विस्तार कार्यकर्ताओं को पंचायतीराज संस्थाओं के अधीन कर दिया गया है।
11. राशन की दुकान का आवंटन, वितरित की गई सामग्री का पूर्ण लेखा-जोखा, नए राशन कार्ड संस्थाओं की पूर्ण सहभागिता रखी गई है। राशन कार्ड बनाने का अनुमोदन, राशन की दुकान की समयावधि बढ़ाने और निरस्त करने बाबत निर्णय ग्राम पंचायत में चर्चा कर किए जाएंगें और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के पर्यवेक्षण के लिए गठित सर्तकता समिति में इन संस्थाओं को जोड़ा गया है।
12. सिंचाई विभाग के अधीन तालाबों का नियंत्रण एवं रखरखाव।
13. आंगनबाड़ी को भी पंचायत के अधीन कर दिया गया है।
14. खादी का प्रशासनिक नियंत्रण भी इन्हें ही दे दिया गया है।
पंचायती राज सशक्तिकरण -
ग्राम विकास को नये आयाम देने तथा गांवों के सामाजिक एवं आर्थिक उत्थान की दिशा में पंचायती राज संस्थाओं का महत्व सर्वविदित है। इस दिशा में प्रयासरत सरकार ने गांधी जयन्ती (2 अक्टूम्बर, 2010) के अवसर पर राज्य सरकार ने पंचायती राज संस्थाओं को प्रारम्भिक शिक्षा, कृषि, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य, महिला एवं बाल विकास तथा सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग की जिला स्तरीय गतिविधियों का हस्तारण पंचायती राज संस्थाओं को कर दिया है।
पंचायती राज संस्थाएं अब सशक्त होकर उभरें, इस दिशा में सरपंच से लेकर जिला प्रमुख तक सभी को पहले के मुकाबले अधिक सजग होकर अपने कर्तव्यों का निर्वहन भली प्रकार से करना होगा। इन विभागों का सुचारु रुप से हस्तान्तरण सुनिश्चित करवाने में इन सभी की महत्ती भूमिका होगी। जो अधिकार पंचायती राज संस्थाओं को सौंपे गए हैं उनकी जानकारी देने के लिए एक लघु पुस्तिका का प्रकाशन करवाया गया है। जिला स्तर पर जिला कलेक्टर की अध्यक्षता में इस कार्य को अमली जामा पहनाने के लिए एक समिति का गठन किया गया है तथा राज्य स्तर पर इस दिषा में आने वाली कठिनाइयों एवं समस्याओं के निराकरण के लिए एक समिति का गठन भी किया गया है।
राज्य सरकार की यह मंशा है कि भविष्य में और विभाग भी पंचायती राज संस्थाओं को सौंपे जाएंगे। सफलतापूर्वक सुपुर्द किए गए 5 विभागों की जिला स्तरीय गतिविधियों का संचालन पंचायती राज संस्थाओं को ही करना होगा। यह एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है,
जिसके निर्वहन की दिशा में संवेदनशील, पारदर्शी एवं जवाबदेही के साथ कार्य करने की आवश्यकता है।
राजस्थान पंचायती राज (द्वितीय संशोधन) अध्यादेश 2014 -
राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह ने दिसम्बर, 2014 में राजस्थान पंचायतीराज अधिनियम, 1994 की धारा 19 में संशोधन के अध्यादेश को मंजूरी दी। तदनुसार राजस्थान सरकार ने पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यताओं के निर्धारण संबंधी राजस्थान पंचायती राज (द्वितीय संशोधन) अध्यादेश 2014 लागू किया। इसके अनुसार निम्नांकित प्रावधान किए गए हैं-
1. जिला परिषद या पंचायत समिति के सदस्य के लिए माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, राजस्थान या उसके समकक्ष किसी बोर्ड से माध्यमिक विद्यालय परीक्षा उत्तीर्ण व्यक्ति ही चुनाव लड़ने का पात्र होगा।
2. किसी अनुसूचित क्षेत्र में पंचायत के सरपंच के मामले में किसी विद्यालय से 5वीं कक्षा उत्तीर्ण और किसी अनुसूचित क्षेत्र की पंचायत से भिन्न किसी पंचायत के सरपंच के मामले में किसी विद्यालय से 8वीं उत्तीर्ण व्यक्ति ही चुनाव लड़ पाएगा।
3. अध्यादेश के अनुसार राजस्थान पंचायतीराज अधिनियम 1994 की धारा 19 में संशोधन कर यह प्रावधान जोड़ा गया है कि जो व्यक्ति घर में कार्यशील स्वच्छ शौचालय रखता हो और उसके परिवार का कोई भी सदस्य खुले में शौच के लिए नहीं जाता हो, वही पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव लड़ने का पात्र होगा। अध्यादेश में स्वच्छ शौचालय से आशय तीन दीवारों, एक दरवाजा और छत से ढके हुए जलबद्ध (वाटर सील्ड) शौचालय से है। परिवार में संबंधित व्यक्ति, उसके पति या पत्नी, बच्चे और ऐसे व्यक्ति के साथ निवास कर रहे उसके माता-पिता को सम्मिलित किया गया है।

पंचायती राज संस्थाएं ग्रामीण विकास की धुरी बनकर आमजन को सुशासन देते हुए ग्रामीणों की जन समस्याओं का त्वरित निराकरण सुनिश्चित करें ताकि उन्हें यह अहसास हो कि गांव की समस्या का निराकरण अब गांव में ही संभव है। ग्राम पंचायत के कार्यालय नियमित रुप से खुले, निर्धारित तिथियों पर बैठकों का आयोजन हो तथा ग्रामीण विकास की योजनाओं के साथ ही राज्य सरकार द्वारा संचालित की जा रही जन कल्याण से जुड़ी योजनाओं का व्यापक प्रचार-प्रसार गांवों में हो, जिससे आम आदमी को विकास का लाभ मिल सके। आशा की जाती है कि पंचायती राज संस्थाएं एक नए रूप में जन आकांक्षाओं का केन्द्र बनकर ग्राम स्वराज की परिकल्पना का सपना साकार करेंगी।

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