6/14/2015 06:02:00 pm
0


राजस्थानी भाषा की प्रमुख बोलियां - उपबोलियां और भौगोलिक क्षेत्र-
कोई भी भाषा कई बोलियों के मिलने से बनती है। किसी भाषा में बोलियों की अधिकता उसकी समृद्धता मानी जाती है। बोलियों की दृष्टि से राजस्थानी अत्यंत समृद्ध और सुदृढ़ भाषा है। राजस्थानी भाषा संपूर्ण राजस्थान प्रांत के निवासियों के साथ-साथ भारत भर में बसे हुए प्रवासी राजस्थानियों द्वारा अपने प्रतिदिन के कार्य-व्यवहार में बोली जाती है। राजस्थानी विश्व की समृद्धतम भाषाओं में सोहलवां स्थान रखती है। इसको बोलने वालों की संख्या दस करोड़ के लगभग है। विद्वान राजस्थानी भाषा की विभिन्न विशेषताओं के कारण देशी-विदेशी इसकी बोलियों, साहित्य और व्याकरण पर महत्त्वपूर्ण शोध करते रहे हैं और अभी तक यह परंपरा बनी हुई है। विद्वानों के शोध और विवेचना से स्पष्ट होता है कि राजस्थानी भाषा में कई बोलियां सम्मिलित है जिनमें बोलने की दृष्टि से अधिक अंतर नहीं मिलता है। भाषा वैज्ञानिक कहते हैं कि बोली और उपबोली का विभाजन सभी भाषाओ में मिलता है। राजस्थानी की बोलियां-उपबोलियां उसकी समृद्धता और विकास का सूचक है।
बोली एवं उपबोली का अर्थ -
भाषा वैज्ञानिकों की दृष्टि में भाषा के तीन स्तर बोली, विभाषा और भाषा होते हैं और उनका प्रारंभिक स्वरूप बोलीको माना जाता है। प्रो. कल्याणसिंह शेखावत के अनुसार बोली भाषा का पहला स्तर है जिसका मौखिक स्वरूप किसी एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में रहने वाले निवासियों के अनुसार सीमित होता है। डॉ. भोलानाथ तिवारी इसका अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि बोलीऔर उपबोलीउस सीमित क्षेत्र की भाषा को कहा जाता है, जिसमें उसे बोलने वाले का उच्चारण लगभग इक जैसा होता है तथा जिसमें रूप रचना, वाक्यों की बनावट, शब्द और अर्थ से जुड़ी हुई खास भिन्नता नहीं होती है।
पश्चिमी भाषाविद् एडवर्ड सेपियर के अनुसार समय के साथ कोई विशिष्ट बोली भाषा के रूप में भी बदल सकती है।
आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा की दृष्टि में भाषा और बोली में अधिक अंतर नहीं होता है तथा बोलियां ही वक्त के साथ भाषा में रूपांतरित होने की क्षमता रखती है।
भाषा- विज्ञान का नियम है कि बोली का विकसित स्वरूप ही भाषा है। इस अर्थ में भाषा के अविकसित रूप को बोलीकहा जाता है। बोली का स्वरूप मौखिक हाने के कारण उसमें व्याकरण के नियमों में नहीं बांधा जा सकता है।
विश्व की सभी समृद्धतम भाषाएं बोलियों उपबोलियों से विकसित हुई है। वो भाषा समृद्ध मानी जाती है जिसमें कई सारी बोलियां-उपबोलियां होती है। जिस तरह हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी में अवधी, मैथिली, ब्रज, खड़ी बोली, भोजपुरी, हरियाणवी, बुन्देलखण्डी आदि बोलियां है, उसी तरह राजस्थानी भाषा मारवाड़ी, ढूंढाड़ी, मेवाड़ी, हाड़ौती, शेखावटी, मेवाती, मालवी और वागड़ी बोलियों से बनी है। जिस तरह राजस्थानी बोलियों में थोड़े-थोड़े अंतर का प्रश्न है, उसका उत्तर भाषा विज्ञान का यह सिद्धान्त देता है कि प्रति पन्द्रह-बीस किलोमीटर की दूरी के पश्चात् बोली में न्यून अंतर ही जाता है। इसके लिए लोक में कई मान्यताओं में कहावतें कही जाती है।
कई प्रचलित मान्यताओं में से ये कहावत अत्यंत प्रसिद्ध है-
‘‘बारै कोसां बोली पळटै, बन फळ पळटै पाकां।
बरस छतीसां जोबन पळटै, लखण पळटै लाखा।।’’
राजस्थानी भाषा का वर्षों पुराना साहित्य इसकी बोलियों की एकरूपता का सबसे अनूठा प्रमाण है। आधुनिक युग के राजस्थानी भाषा के साहित्य में भाषा का मानक स्वरूप उपयोग में लिया जाता है। अतः हम सार रूप में कह सकते हैं कि भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से परीक्षण करने पर राजस्थानी भाषा अपनी अलग-अलग बोलियों से मिलकर बनी हुई एक समृद्ध भाषा सिद्ध होती है।
वक्ताओं की संख्या के आधार पर राजस्थानी भाषा एवं इसकी बोलियों का देश में स्थान 7 वां तथा विश्व में 24 वां स्थान है
राजस्थानी भाषा की बोलियों के संबंध में 1961 की जनगणना-
1961 की जनगणना में राजस्थान की कुल 73 बोलियाँ ज्ञात हुई थी जिनमे से 46 बोलियों में बोलने वालों की संख्या मात्र एक हज़ार से भी कम थी शेष में से 9 को बोलने वाले लोगों की संख्या 10 हजार से कम, 4 की 50 हजार से कम, 2 की एक लाख से कम, 8 की 10 लाख से कम तथा अंतिम 4 की संख्या एक करोड़ से ज्यादा थी
राजस्थानी भाषा की बोलियों के संबंध में विद्वानों के अलग-अलग वर्गीकरण-
राजस्थानी भाषा अपने समृद्ध साहित्य के कारण सदैव ही देशी-विदेशी विद्वानों के आकर्षण का केन्द्र रही है। राजस्थानी भाषा और साहित्य पर केन्द्रित अनेक शोध और अध्ययन हुए हैं और लगातार होते रहेंगे। इसी प्रकार राजस्थानी भाषा की बोलियों पर देशी-विदेशी विद्वानों ने अपनी शोधपरक विवेचना प्रस्तुत की है। इस अध्ययन की परंपरा को समझने के लिए हमें अलग-अलग विद्वानों की शोधपरक दृष्टि को सामने रखना पड़ेगा।

भारतीय भाषाओं के तुलनात्मक और ऐतिहासिक विवेचना के संबंध में सबसे प्रथम ग्रंथ जॉन बीमज् का मिलता है, जिसके तीन खण्ड प्रकाशित हुए हैं। इनमें बीमज् ने राजस्थानी को स्वतंत्र भाषा नहीं मानते हुए भूल से इसकी गिनती हिंदी की बोली उपभाषा की है। इसके तीस-चालीस वर्ष पश्चात् कर्नल जेम्स टॉड ने राजस्थानी भाषा के लिए अत्यधिक शोधपरक जानकारी एकत्रित की किंतु उस वक्त यह सामने नहीं सकी। बीमज् टॉड आदि के पश्चात् रामकृष्ण गोपाल भंडारकर, रूडोल्फ होरनले, केलॉग आदि द्वारा की गई विवेचनाओं से राजस्थानी भाषा की बोलियों के बारे में अधिक जाणकारी नहीं मिलती है।

ग्रियर्सन का वर्गीकरण-
राजस्थानी भाषा की बोलियों के संबंध में प्रथम सराहनीय शोध सर जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने सन् 1907-1908 में अपनी पुस्तक लिंग्वस्टिक सर्वे ऑफ़ इण्डिया में किया है। ग्रिर्यसन ने इसमें राजस्थानी भाषा की पांच बोलियां बताई है, जो इस प्रकार है-
1. पश्चिम राजस्थानी
2. उत्तरी-पूर्वी राजस्थानी
3. मध्यपूर्वी राजस्थानी
4. दक्षिणी-पूर्वी राजस्थानी-मालवी
5. दक्षिणी राजस्थानी
ग्रियर्सन के पश्चात् इटली निवासी और राजस्थानी भाषा-साहित्य के विद्वान डॉ. एल. पी. टैस्सीटारी ने राजस्थान और मालवा की बोलियों के दो वर्ग बनाते हुए विवेचन प्रस्तुत किया, जो इस प्रकार है-
डॉ. टैस्सीटोरी का विवेचन-
(1) पश्चिमी राजस्थानी - शेखावाटी, जोधपुर की खड़ी राजस्थानी, थटकी, थळी, बीकानेरी, बागड़ी, खैराड़ी, सिरोही की बोलियां, गोडवाड़ी, देवड़ावटी।
(2) पूर्वी राजस्थानी (ढूंढ़ाड़ी) - तोरावाटी, खड़ी जयपुरी, काठैड़ा, राजावाटी, अजमेरी, किशनगढ़ी, चौरासी, नागरचाळ, हाड़ौती।
प्रो. नरोत्तमदास स्वामी का वर्गीकरण-
राजस्थानी भाषा के प्रसिद्ध विद्वान प्रो. नरोत्तमदास स्वामी के अनुसार राजस्थानी की बोलियों को चार वर्गों में बांटा जा सकता है-
1. पश्चिमी राजस्थानी (मारवाड़ी) - जोधपुर, उदयपुर, जैसलमेर, बीकानेर और शेखावटी क्षेत्र।
2. पूर्वी राजस्थानी (ढूंढ़ाड़ी) - जयपुर और हाड़ौती क्षेत्र।
3. उत्तरी राजस्थानी - मेवाती, अहीरी बोलियां।
4. दक्षिणी राजस्थानी (मालवी) - मालवा और नीमाड़ की बोलियां।
डॉ. मोतीलाल मेनारिया का वर्गीकरण-
डॉ. मोतीलाल मेनारिया ने अपनी पुस्तक राजस्थानी भाषा और साहित्य में राजस्थानी की पांच बोलियां मानते हुए उनका उदाहरणों सहित परिचय दर्शाया है। डॉ. मेनारिया का वर्गीकरण इस प्रकार है-
1. मारवाड़ी
2. ढूंढाड़ी
3. मालवी
4. मेवाती और बागड़ी।
सभी विद्वानों के शोध और बोलियों की विशेषताओं को दृष्टिगत रखते हुए राजस्थानी भाषा की आठ बोलियां मानी जा सकती है। ये बोलियां इस प्रकार है-
1. मारवाड़ी
2. ढूंढ़ाड़ी
3. हाड़ौती
4. मेवाती
5. वागड़ी
6. मेवाड़ी
7. माळवी
8. शेखावाटी
राजस्थानी भाषा की प्रमुख बोलियां: बोली क्षेत्र और विशेषताएं
1. मारवाड़ी बोली -
मारवाड़ी राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र की बोली है। इसका पुराना नाम मरूभाषा, मरूगुर्जरी एवं डिंगळ है। मारवाड़ी का बोली क्षेत्र जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर, सिरोही के साथ-साथ अजमेर-मेरवाड़ा-किशनगढ़, सिंध एवं पंजाब प्रांत के कुछ भाग तक माना जाता है। इस प्रकार मारवाड़ी एक लम्बे-चौड़े भूभाग में बोली जाती है। इसकी खास-खास उपबोलियों में थळी, जोधपुरी और बीकानेरी गिनी जाती है। बोली-क्षेत्र और साहित्य दोनों दृष्टि से मारवाड़ी राजथानी भाषा की सबसे श्रेष्ठ बोली है। आदिकाल से लेकर अभी तक मारवाड़ी को राजस्थानी भाषा के मानक स्वरूपमें स्वीकार किया गया है तथा ये बोली राजस्थानी की साहित्यिक भाषा रही है। साहित्यिक मारवाड़ी को डिंगल कहा जाता है समृद्ध साहित्यिक परंपरा की धनी इस बोली में डिंगळ जैसी अनूठी काव्यशैली, सौरठा जैसे छंद और विश्वभर में पसंद किये जाने वाले मांड राग जैसी विशेषताएं पाई जाती है। इस बोली में संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और अरबी-फारसी के शब्दों का सहज मेल पाया जाता है।
मारवाड़ी बोली की विशेषताएं-
() सम्बन्धकारक के लिए रा, री, रै, रौ प्रत्यय प्रयुक्त होते हैं।
() संयोजक-अव्यव के रूप में नैकै औरका प्रयोग किया जाता है। सम्प्रदान के लिए 'नै', अपादान के लिए 'सूं', 'ऊँ' रूप प्रचलित है
() तालव्य की जगह दन्ती का प्रयोग किया जाता है। 'न' के लिए 'ण' वर्ण का प्रयोग होता है
() वैदिक इसकी विशेष पहचान है।
(य) उत्तम एवं मध्यम पुरुष वाचक सर्वनामों के लिए 'म्हारो, थारो एवं बहुवचनात्मक रूपों के लिए 'म्है, म्हाँ' का प्रयोग होता है
(र) सामान्यतः देवनागरी लिपि का प्रयोग होता है किन्तु बहीखातों में महाजनी लिपि का भी प्रयोग किया जाता है
मारवाड़ी बोली का उदाहरण-
‘‘सियाळै री हाड कंपावती सरदी। बीं सरदी में तो घर आळा मुरदै नै बारै नीं काढ़े मुंह अंधारै आंख्यां में गीढ़ भर्योड़ो, फाट्योड़ी कांबळ ओढ्योड़ो भीखो चूल्है माथै पाणी तातो करै हो। सामै धापूड़ी ठाष्ठा नैं दूवती चाय की त्यारी करै ही।’’ (जूझती जूण-गोपाल जोसी)
2. ढूंढाड़ी बोली -
ढूंढाड़ी बोली ढूंढाड़ी क्षेत्र में बोली जाती है। जयपुर के आसपास बोले जाने के कारण इसे जयपुरी बोली भी कहा जाता है। ढूंढाड़ी जयपुर के साथ-साथ किशनगढ़-टोंक के बहुत से भाग के अलावा अजमेर-मेरवाड़ा के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र तक बोली जाती है। पूर्वी राजस्थान के मध्य-पूर्वी भाग को 'ढूंढाड़' कहा जाता है इसका ढूंढाड़ी नाम इस क्षेत्र के नाम ढूंढाड़के आधार पर पड़ा। ढूंढाड़ नामकरणका आधार ढूंढ या ढूंढाकृति परबतजो जोबनेर के पास में स्थित है, माना जाता है।
ढूंढाड़ी बोली की उपबोलियों में तोरावाटी, काठैड़, चौरासी, नागरचोल और राजावाटी उल्लेखनीय है। इस बोली में गुजराती और मारवाड़ी के समान प्रभाव के अलावा ब्रज की विशेषताएं भी दिखाई देती है। ढूंढाड़ी बोली साहित्यिक परंपरा की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध रही है। संत कवि दादूदयाल और उनकी शिष्य-परंपरा के कवियों ने ढूंढाड़ी बोली में बहुत सारे साहित्य का सृजन किया है।
ढूंढाड़ी बोली की विशेषताएं -
() सम्बन्धकारक के लिए का, की, कै का प्रयोग किया जाता है।
() वर्तमानकाल के लिए छै, भूतकाल के लिए छीऔर भविष्यकाल के लिए स्यूं, स्या, ला, ली आदि का प्रयोग किया जाता है।
(स) सर्वनाम के तिर्यक रूप एकवचन में ऊ, ई, दूरवाचक के लिए ओ, यो, वो तथा स्त्री रूप के लिए आ, या, वा का प्रयोग होता है जब, तब एवं कब के लिए जद, तद व कद को प्रयुक्त किया जाता है
ढूंढाड़ी बोली का उदाहरण-
‘‘अेक मूंजी कनै थोड़ो-सो धन छो। ऊंनै हर भगत यो ही डर लग्यौ रह छो दुनिया भर का सगळा चोर-धाड़ेती म्हारा धन पर आंख गाड़ मेली छै। कांई ठा कै कद आर लूट लैला।’’ (राजस्थानी भाषा और साहित्य- मोतीलाल मेनारिया)
3. हाड़ौती बोली-
हाड़ौती कोटा, बूंदी और झालावाड़ क्षेत्र में बोली जाती है। इस भूभाग के नाम हाड़ौती क्षेत्रके आधार पर ही इस बोली का नामकरण हुआ है। उच्चारण की दृष्टि से हाड़ौती पर ढूंढाड़ी का पूर्ण प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। हाड़ौती बोली लोक साहित्य की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध रही है।
हाड़ौती बोली की विशेषताएं -
() इसमें सम्बन्धकारक के लिए के, का, की, को, रे, रा, की, रो, णे,णा, णी का प्रयोग किया जाता है।
() हाड़ौती बोली में ’, ‘अेऔर स्वरों का प्रयोग नहीं मिलता है।
जैसे इमलीको हाड़ौती में आम्लीउच्चारित किया जाता है। इसी तरह मिनखको मनख इसके अलावा अनुनासिकता’ (.) का भी प्रयोग मिलता है जैसे घास-घांस, राखस-रांखस, काच-कांच आदि।
हाड़ौती बोली का उदाहरण-
‘‘हाड़ौती का लोकनाटक खुल्या आसमान कै नीचै होवै छै, कदी-कदी मंच पै चांदणी ताण दै छै। लीलान् को टेम तो बंद्यो छै पण खेल कदीं बी कर्या जा सकै, पण करसाणी सूं नचींत होबो जरूरी छै।’’ (हाड़ौती का लीला-ख्याल पूर्वी राजस्थान की बोली में है।)
4. मेवाती बोली -
मेवाती उत्तर-पूर्वी राजस्थान की बोली है। इसके बोली-क्षेत्र में अलवर, भरतपुर के  उत्तर-पश्चिमी भाग और हरियाणा के गुड़गांव के दक्षिणी भाग को सम्मिलित किया जाता है। इस बोली पर ब्रज और खड़ी बोली का पूरा प्रभाव नजर आता है।
मेवाती की विशेष उपबोलियों में कठेर मेवाती, भयाना मेवाती, आरेज मेवाती, नहेड़ा मेवाती, बीघोता मेवाती और खड़ी मेवाती गिनी जाती है। इस बोली में चरणदासी पंथ के संत कवियों का साहित्य पाया जाता है। इसके अलावा इस बोली में लालदास, दयाबाई, सहजो बाई, डूंगरसिंह भीक, शक्को आदि संत कवियों ने भी रचनाये की है।
मेवाती की विशेषताएं-
() मेवाती बोली एक ओकारान्तबोली है। इसमें आकारान्तसंज्ञाओं और भूतकालीन आकारान्तक्रियाएं ओकारान्तहो जाती है। जैसें- भेड़ियो, मैंणो, कागलो, बिटोड़ो आदि।
() स्वर ध्वनि का ’, ‘’, ‘में बदलाव मेवाती बोली की विशेषता है। जैसे- जलसा-जिलासा, खजूर-खिजूर, सरकारी-सिरकारी आदि।
() आकारान्तशब्दों में एकवचन से बहुवचन बनाते समय अनुस्वार’ (.) हटाकर का प्रयोग किया जाता है। जैसे- चेलां, चेलान।
() सम्बन्धकारक के लिए का, की, के आदि का प्रयोग किया जाता है।  इसमें कर्मकारक में 'लू' विभक्ति एवं भूतकाल में हा, हो, ही सहायक क्रियाओं का प्रयोग होता है
मेवाती बोली का उदाहरण-
() ‘‘तोकू मैंनू कही ही, वाड़ी तू आयो नांय।’’
() ‘‘सुपना में छळ ली बन्दी आधी-सी रात, पिया मेरो चैपड़ कौ खिलारी रै।
तोडूं चरखा दे दूं तो में आग रचखो मेकी छाती को जळावा रै!’’
5. वागड़ी बोली-
डूंगरपुर और बांसवाड़ा के क्षेत्र को वागड़नाम से जाना जाता है। इसी के आधार पर यहां की बोली का नाम वागड़ीहुआ। यह बोली मेवाड़ के दक्षिण और सूंथ के उत्तर के अलावा मालवे की पहाड़ियों तक में भी बोली जाती है। डॉ. ग्रियर्सन और डॉ. दिनेश आदि विद्वानों ने इस बोली को भीलीनाम दिया है। वागड़ी बोली पर गुजराती का बहुत प्रभाव नजर आता है। वागड़ी लोक साहित्य की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है। इस बोली के साहित्यकारों ने आधुनिक राजस्थानी साहित्य में भी काफी यश प्राप्त किया है।
वागड़ी की विशेषताएं-
(अ) इसमें 'च' व 'छ' को 'स' के रूप में तथा 'स' को 'ह' के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। जैसे- 'चूकना' को 'सूकना', 'छम-छम' को 'सम-सम' बोलना तथा 'साड़ी' को 'हाड़ी' व 'समझ्यो' को 'हमझ्यो' उच्चारित करना।
(ब) भूतकालिक सहायक क्रिया 'था' के स्थान पर 'हतो' का रूप प्रयुक्त होता है।
(स) तुम के लिए 'तम', तुम्हारे के लिए 'तमारे' आदि का प्रयोग।
(द) गुजराती के प्रभाव से का, की, के हेतु ना, नी, ने का प्रयोग जैसे 'आज की व कल की' के लिए 'आज नी' , 'काल नी' ।
वागड़ी बोली का उदाहरण-
‘‘अॅणनै मोटे भागे सभ्यता नी गणतकी मए लई शकाय है जेनूं के मने आजनी फेशन ना परमणो संस्कृति ने बजाय सभ्यता ने संस्कृति नो शेरौ (मुखोटो) पेरावी, नै, अणगमतेस, वर्ण करवुं पड़ी र्यू है।’’ (बागड़ नी संस्कृति, पृ.51)
6. मेवाड़ी बोली-
मेवाड़ क्षेत्र के दक्षिणी-पूर्वी भाग को छोड़ कर संपूर्ण मेवाड़ और उसके सीमांत प्रदेशों के कुछेक भागों (नीमच-मध्यप्रदेश) में मेवाड़ी बोली जाती है। इसका असली रूप मेवाड़ के गांवों में सुना जा सकता है, जहां यह शुद्ध रूप में प्रयुक्त होती है। शहरी मेवाड़ी पर हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी भाषाओं का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। मेवाड़ी साहित्यिक दृष्टि से समृद्ध परंपरा की धनी रही है। महाराणा कुंभा (सं. 1490-1525) ने इसी बोली में चार नाटकों का सृजन किया था। उसके बाद मेवाड़ी बोली में कई विशिष्ट साहित्यकारों की परंपरा सामने आई, जिसमें हेमरतन सूरि, किसना आढा, महाराज चतुरसिंह जी बावजी, नाथूसिंह महियारिया, रामसिंह सोलंकी, रानी लक्ष्मीकुमारी चूण्डावत आदि नाम उल्लेखनीय है। डॉ. ब्रजमोहन जावलिया ने मेवाड़ी की दो उपबोलियां पर्वती और मैदानी बताई है।
मेवाड़ी बोली की विशेषताएं-
() मेवाड़ में -कारऔर -कारके स्थान पर -कारकी प्रवृति पाई जाती है। जैसे- हाजिरके स्थान पर हाजर’, मिनख के स्थान पर मनख, मालूम के स्थान पर मालम, विराजो के स्थान पर वराजौ आदि।
() भूतकालिक सहायक क्रियाओं के लिए हा, ही, हो और भविष्यत् कालिक क्रियाओं के लिए गा, गी, गे का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा भविष्यत्कालिक क्रियाओं में प्रसंगानुसार ला, ली, लो का प्रयोग भी किया जाता है।
जैसे- 'बहुत सारे लोग जा रहे थे' के लिए 'घणा मनख जाई रिया हा' और 'वो भोजन करेगा' के लिए 'वो जीमण करेला' का प्रयोग। 
() मेवाड़ी बोली में सम्बन्धकारक के रूप में का, की, कैके साथ में रा, री, रै, रौका  प्रयोग भी होता है।
जैसे- अंबालाल का बेटाको अंबालाल रौ बेटोतथा अंबालाल के चार बेटेको अंबालाल रा चार बेटाकहा जाता है।
मेवाड़ी बोली का उदाहरण-
‘‘पोह रो मींनो। ईयां ही ठंड घणी और आज रा ओळा मेह सूं तो चोगणी व्हैगी। वासदी सुलगाय तावै। टाबर मावों ने नीं छोडै़। डोकरा डोकरी बैठ्या ‘‘राम-राम’’ करता, इन्दर सूं कोप
कम करणै री औरदास करै। (मांझल रात, पृ.88)
7. मालवी बोली-
उज्जैन के आस-पास का क्षेत्र मालवा नाम से जाना जाता है। इस क्षेत्र में प्रचलित बोली का नाम मालवी है। इस क्षेत्र के पश्चिम में प्रतापगढ़ (राजस्थान), रतलाम (मध्यप्रदेश), दक्षिण-पश्चिम में इन्दौर, उत्तर-पश्चिम में नीचम और उत्तर में ग्वालियर के कुछ भाग में मालवी बोली का उपयोग होता है। मालवी में मारवाड़ी और ढूंढाड़ी की विशेषताएं देखने को मिलती है, साथ ही शेखावाटी बोली का प्रभाव इस बोली की मिठास में दृष्टिगोचर होता है। मालवी बोली के शब्द भण्डार पर मराठी का प्रभाव भी दिखाई देता है। इसकी उपबोलियों में नीमाड़ी, उमढवाड़ी, रतलामी, सोंधवाड़ी आदि प्रमुख है। लोक साहित्य की दृष्टि से मालवी पूर्णरूपेण समृद्ध बोली है।
मालवी बोली की विशेषताएं-
() काल को दर्शाने के लिए इसमें हो’, ‘हीके स्थान पर थो’, ‘थीका प्रयोग किया जाता है।
() के स्थान पर या ध्वनि मिलती है।
() के स्थान पर का प्रयोग किया जाता है।
मालवी बोली का उदाहरण-
‘‘अेक मूंजी रै कनै थौड़ो माल थो। वणी नैं हदांई डर लाग्यो रेतो थो के आखी दुनिया रा चोर नै डाकू म्हाराज धन पर आंख्या लगायां थका है, नी मालम कही आई नै वी लूटी लेगा।’’
8. शेखावाटी बोली-
राजस्थान प्रांत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र की सीकर झुंझुनु और चुरू की भूमि शेखावाटी नाम से जानी जाती है। क्षेत्र के नाम के आधार पर ही इस बोली का नाम शेखावटीहो गया। वर्तमान के सीकर, झुंझुनु और चुरू के कुछ क्षेत्र तक शेखावाटी बोली जाती है। यह क्षेत्र राजस्थान की साहित्यिक और सांस्कृतिक समृद्धता का केन्द्र माना जाता है। राजस्थानी साहित्य के आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक इस क्षेत्र की अनूठी साहित्यिक परंपरा रही है। शेखावाटी बोली में कोई उपबोली नहीं मानी जाती है। लेकिन इस पर मारवाड़ी और ढूंढाड़ी बोली का पूरा प्रभाव दिखाई देता है।
शेखावाटी बोली की विशेषताएं-
() भविष्यतकालिका क्रिया के लिए सा, सी का प्रयोग किया जाता है।
() सम्बन्ध कारक के लिए का, की, केका प्रयोग किया जाता है।
शेखावाटी बोली का उदाहरण-
‘‘मेरा बाप का नौकर-चाकरां नै रोटी घणी और मैं भूको मरूं। में उठस्यूं और मेरै बाप कै कनै जास्यूं और बै नै केस्यूं बाप, मैं रामजी को पाप कर्यौ और मैं तेरो बेटो कुहवावण जागो कोनी। तेरै नौकरां में अेक मत्रौ बी राख ले।’’ (राजस्थान का भाषा सर्वेक्षण, पृ.129)
उक्त बोलियों के अलावा एक अन्य महत्त्वपूर्ण व लोकप्रिय बोली 'अहीरवाटी' है जिसके बारें में भी यहाँ चर्चा जरुरी है
अहीरवाटी बोली -
पूर्वी राजस्थान की दूसरी महत्त्वपूर्ण बोली अहीरवाटी है। इसका क्षेत्र राजस्थान के अलवर जिले की बहरोड़, मुंडावर तहसील तथा किशनगढ़ का पश्चिमी भाग है इस बोली के प्रमुख विद्वान कवि जोधराज थे जो राजा चंद्रभान सिंह के दरबारी कवि थे उन्होंने हम्मीर रासो महाकाव्य की रचना की इस बोली में शंकर राव ने 'भीम विलास' ग्रन्थ की रचना की थी
प्राचीनकाल में अहीर जाति के इस क्षेत्र में आबाद हो जाने से इसे ''अहीरवाटी या अहीरवाल'' कहा जाने लगा ऐतिहासिक दृष्टि से इस क्षेत्र को 'राठ' तथा बोली को 'राठी' भी कहा जाता है
अहीरवाटी बोली की विशेषताएं-
1. पश्चिमी राजस्थानी के प्रभाव से 'न' को 'ण' बोला जाता है
2. वर्तमान काल की सहायक क्रिया के लिए सूं, सां, सैं का, भूतकाल के लिए थो, था, थी का एवं भविष्यतकाल के लिए गो, गा, गी का प्रयोग किया जाता है
3. असामयिक क्रिया के लिए 'कै'' रूप का प्रयोग होता है जैसे- जाकै - जाकर के, खाकै - खाकर के आदि
4. वाला अर्थ के लिए 'ण' प्रत्यय का प्रयोग होता है
अहीरवाटी बोली का उदाहरण-
1. ''जच्चा की चटोरी जीभ जलेबी भांवै सैं, हे सुसरा नै गिरवी धरदे हे सासू का लगादे ब्याज जलेबी भांवैं सैं।''
रांगड़ी बोली-
रांगड़ी बोली राजपूतों में प्रचलित मारवाड़ी और मालवी के सम्मिश्रण से बनी है तथा राजस्थान के दक्षिण-पूर्वी भाग में बोली जाती है।

0 टिप्पणियाँ:

Post a Comment

Your comments are precious. Please give your suggestion for betterment of this blog. Thank you so much for visiting here and express feelings
आपकी टिप्पणियाँ बहुमूल्य हैं, कृपया अपने सुझाव अवश्य दें.. यहां पधारने तथा भाव प्रकट करने का बहुत बहुत आभार

स्वागतं आपका.... Welcome here.

राजस्थान के प्रामाणिक ज्ञान की एकमात्र वेब पत्रिका पर आपका स्वागत है।
"राजस्थान की कला, संस्कृति, इतिहास, भूगोल और समसामयिक दृश्यों के विविध रंगों से युक्त प्रामाणिक एवं मूलभूत जानकारियों की एकमात्र वेब पत्रिका"

"विद्यार्थियों के उपयोग हेतु राजस्थान से संबंधित प्रामाणिक तथ्यों को हिंदी माध्यम से देने के लिए किया गया यह प्रथम विनम्र प्रयास है।"

राजस्थान सम्बन्धी प्रामाणिक ज्ञान को साझा करने के इस प्रयास को आप सब पाठकों का पूरा समर्थन प्राप्त हो रहा है। कृपया आगे भी सहयोग देते रहे। आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत है। कृपया प्रतिक्रिया अवश्य दें। धन्यवाद।

विषय सूची

राजस्थान सामान्य ज्ञान (331) Rajasthan GK (295) GK (189) सामान्य ज्ञान (139) क्विज (130) Quiz (111) राजस्थान समसामयिक घटनाचक्र (94) Rajasthan History (79) समसामयिक घटनाचक्र (75) राजस्थान की योजनाएँ (52) समसामयिकी (44) General Knowledge (43) राजस्थान का इतिहास (42) Science GK (38) विज्ञान क्विज (36) योजनाएँ (35) Science Quiz (34) सामान्य विज्ञान (30) Geography of Rajasthan (25) Question and Answer (20) राजस्थान का भूगोल (19) राजस्थान के मेले (19) राजस्थान के किले (18) Forts of Rajasthan (17) Welfare plans of Rajasthan (16) राजस्थान के दर्शनीय स्थल (15) राजस्थानी साहित्य (15) प्रतिदिन क्विज (14) राजस्थान के लोक नाट्य (14) राजस्थान की कला (13) राजस्थान के प्राचीन मंदिर (13) राजस्थान के मंदिर (12) राजस्थानी भाषा (11) राजस्थान के तीर्थ स्थल (10) राजस्थान के लोक वाद्य (9) लोक देवता (9) Folk Musical Instruments of Rajasthan (8) Minerals of Rajasthan (8) राजस्थान के अनुसन्धान केंद्र (8) राजस्थान के प्रमुख पर्व एवं उत्सव (8) राजस्थान के हस्तशिल्प (8) GK राजस्थान समसामयिक घटनाचक्र (7) राजस्थान की चित्रकला (7) विज्ञान सामान्य ज्ञान (7) Tourism (6) अनुसंधान केन्द्र (6) राजस्थान के कलाकार (6) राजस्थान के खिलाड़ी (6) राजस्थान के लोक नृत्य (6) होली है (6) Fairs of Rajasthan (5) Geography of India (5) राजस्थान की जनजातियां (5) राजस्थान की नदियाँ (5) राजस्थान की स्थापत्य कला (5) राजस्थान के ऐतिहासिक स्थल (5) राजस्थान सरकार मंत्रिमंडल (5) राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार (5) Rivers of Rajasthan (4) राजस्थान में प्रजामण्डल आन्दोलन (4) राजस्थान रत्न पुरस्कार (4) राजस्थानी साहित्य की प्रमुख रचनाएं (4) forest of Rajasthan (3) अनुप्रति योजना (3) राजस्थान की जनसंख्या (3) राजस्थान के राज्यपाल (3) राजस्थान के संग्रहालय (3) राजस्थान सरकार के उपक्रम (3) राजस्थान साहित्य अकादमी (3) Handicrafts of Rajasthan (2) Metalic Minerals of Rajasthan (2) Ministers of Govt of India (2) Tourist Circuits (2) जिलानुसार झील व बाँध (2) जिलावार तहसीलों की सूची (2) भूकंप (2) राजस्थान की प्रसिद्ध दरगाहें (2) राजस्थान की मीनाकारी (2) राजस्थान की हवेलियां (2) राजस्थान के आभूषण (2) राजस्थान के जिले (2) राजस्थान के जैन तीर्थ (2) राजस्थान के महल (2) राजस्थान के महोत्सव (2) राजस्थान के रीति-रिवाज (2) राजस्थान के लोक सभा सदस्य (2) राजस्थान मदरसा बोर्ड (2) राजस्थान में कृषि (2) राजस्थान में पशुधन (2) राजस्थान में प्राचीन सभ्यताएँ (2) राजस्‍व मण्‍डल राजस्‍थान (2) राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार (2) Livestock in Rajasthan (1) Major Dialects of Rajasthani (1) folk art (1) अपराजिता (1) क्षेत्रीय सांस्कृतिक केन्द्र (1) तलवारों से गैर (1) बिजौलिया किसान आंदोलन (1) बूंदी का किसान आंदोलन (1) बैराठ की सभ्यता (1) भारत की मृदा (1) भारत की स्थिति (1) भारत के उपग्रह (1) भारत के कमांडर-इन-चीफ (1) भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रम (1) भारतीय मूर्तिकला (1) मीणा आन्दोलन (1) मीणाओं के आराध्य भूरिया बाबा (1) मौर्य तथा प्राचीन राजस्थान (1) रणकपुर (1) राजकीय संग्रहालय अजमेर (1) राजकीय संग्रहालय आहाड़-उदयपुर (1) राजपूताना में 1857 की क्रांति (1) राजपूतों की उत्पत्ति के मत (1) राजसमन्द का राजप्रशस्ति शिलालेख (1) राजस्थान का एकीकरण (1) राजस्थान का खजुराहो जगत का अंबिका मंदिर (1) राजस्थान का चौहान वंश (1) राजस्थान का जलियावाला बाग हत्याकांड (1) राजस्थान का नामकरण (1) राजस्थान का प्रथम मसाला पार्क (1) राजस्थान का राज्य पक्षी गोडावण (1) राजस्थान का राठौड़ वंश- (1) राजस्थान का वैभवशाली मूर्तिशिल्प (1) राजस्थान की खारे पानी की झीले (1) राजस्थान की प्रसिद्ध बावड़ियां (1) राजस्थान की मृदा (1) राजस्थान की वन सम्पदा (1) राजस्थान की वेशभूषा (1) राजस्थान की सीमा (1) राजस्थान की स्थिति एवं विस्तार (1) राजस्थान के अधात्विक खनिज (1) राजस्थान के उद्योग (1) राजस्थान के कला एवं संगीत संस्थान (1) राजस्थान के चित्र संग्रहालय (1) राजस्थान के तारागढ़ किले (1) राजस्थान के धरातलीय प्रदेश (1) राजस्थान के धात्विक खनिज (1) राजस्थान के प्रमुख व्यक्तियों के उपनाम (1) राजस्थान के प्रमुख शिलालेख (1) राजस्थान के प्रसिद्ध साके एवं जौहर (1) राजस्थान के लोक संत (1) राजस्थान के लोकगीत (1) राजस्थान के विधानसभाध्यक्ष (1) राजस्थान के विविध रंग का रिकार्ड (1) राजस्थान के संभाग (1) राजस्थान के संस्थान (1) राजस्थान निवेश संवर्धन ब्यूरो (1) राजस्थान बजट 2011-12 (1) राजस्थान बार काउंसिल (1) राजस्थान में गौ-वंश (1) राजस्थान में पंचायतीराज (1) राजस्थान में परम्परागत जल प्रबन्धन (1) राजस्थान में प्रथम (1) राजस्थान में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संरक्षित स्मारक (1) राजस्थान में वर्षा (1) राजस्थान में सडक (1) राजस्थान सुनवाई का अधिकार (1) राजस्थानी की प्रमुख बोलियां (1) राजस्थानी भाषा का वार्ता साहित्य (1) राजस्थानी साहित्य का काल विभाजन- (1) राजा अजीतसिंह (1) राज्य की जलवायु (1) राज्य ग्रामीण विकास संस्थान (1) राज्य महिला आयोग (1) राज्य वित्त आयोग (1) राज्य सभा सदस्य (1) रावण का श्राद्ध (1) राष्ट्रीय ऊष्ट्र अनुसंधान केन्द्र (1) राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (1) राष्ट्रीय पर्यटन पुरस्कार (1) राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस (1) राष्ट्रीय हस्त शिल्प पुरस्कार (1) लैला मजनूं की मज़ार का मेला (1) विजय सिंह पथिक (1) संसदीय सचिव (1) हेरिटेज वॉक एट फोर्ट कुम्भलगढ़ (1)
All rights reserve to Shriji Info Service.. Powered by Blogger.

Disclaimer:

This Blog is purely informatory in nature and does not take responsibility for errors or content posted in this blog. If you found anything inappropriate or illegal, Please tell administrator. That Post would be deleted.

Sponsors

If you want to sponsor us for better Educational work. You are always welcome. Your donation will be used for better education of poor school children.



Please Contact us at- rajasthanstudy65@gmail.com

Advertise

Advertise here for the sake of better Education in my School situated in Rajasthan. This website has a very good numbers of audience. This website is viewed by thousands of people specially youngsters everyday. So you can get a nice audience for your product or service. You can contact us for advertisement of your business or any other kind of work which you want to explore to our audience. If you want to come along with us, then contact us. You are always welcome..



Contact us at rajasthanstudy65@gmail.com