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भूकंप का अर्थ-
साधारण भाषा में भूकंप का अर्थ है - पृथ्वी का कंपन यह एक प्राकृतिक घटना है। ऊर्जा के निकलने के कारण तरंगें उत्पन्न होती हैं, जो सभी दिशाओं में फैलकर भूकंप लाती हैं।
''पृथ्वी के भूपटल में उत्पन्न तनाव का, उसकी सतह पर अचानक मुक्त होने के कारण पृथ्वी की सतह का हिलना या कांपना, भूकंप कहलाता है।''
भूकंप विज्ञान (सिस्मोलॉजी)-
विज्ञान की वह शाखा जिसके अंतर्गत भूकंप का अध्ययन किया जाता है, भूकंप विज्ञान (सिस्मोलॉजी) कहलाती है और भूकंप विज्ञान का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों को भूकंपविज्ञानी कहते हैं। अंग्रेजी शब्द सिस्मोलॉजीमेंसिस्मोउपसर्ग ग्रीक शब्द है जिसका अर्थ भूकंप है तथा लोजी का अर्थ विज्ञान है। भूकंपविज्ञानी भूकंप के परिमाण को आधार मानकर पता लगते है कि इसकी व्यापकता कितनी हैं।

पृथ्वी में कंपन क्यों होता है?
विवर्तनिक भूकंप या टैक्टोनिक प्लेट सिद्धांत-
इसे समझने के लिए हमें पृथ्वी की संरचना को समझना होगा। पूरी धरती 12 टैक्टोनिक प्लेटों पर स्थित है। इन प्लेटों के नीचे तरल पदार्थ है जिसे लावा कहते हैं। ये प्लेटे इसी लावे पर तैर रही हैं और इनके एक दूसरे से टकराने से ऊर्जा निकलती है जिसे भूकंप कहते हैं। अतः हम कह सकते है कि पृथ्वी में कंपन इसकी प्लेटों के टकराने से होता है। ये प्लेटे पृथ्वी की सतह से लगभग 30-50 किमी तक नीचे हैं। लेकिन यूरोप में कुछ स्थानों पर ये अपेक्षाकृत कम गहराई पर हैं। दरअसल ये प्लेटे अत्यंत धीरे-धीरे घूमती रहती हैं। ये प्रतिवर्ष 4-5 मिमी से 1 सेमी तक अपने स्थान से खिसक जाती हैं। कोई प्लेट दूसरी प्लेट के निकट जाती है तो कोई दूर हो जाती है। ऐसे में कभी-कभी ये टकरा भी जाती हैं।
प्राकृतिक रूप से आने वाले भूकंप विवर्तनिक भूकंप भी कहलाते हैं क्योंकि ये पृथ्वी के विवर्तनिक गुण से संबंधित होते हैं। प्राकृतिक रूप से आने वाले अधिकतर भूकंप भ्रंश (फाल्ट) के साथ आते हैं। भ्रंश भूपटल में हलचल के कारण उत्पन्न होने वाली दरार या टूटन है। ये भ्रंश कुछ मिलीमीटर से कई हजार किलोमीटर तक लंबे हो सकते हैं। भूविज्ञान कालक्रम के दौरान अधिकतर भ्रंश दोहरे विस्थापनों का निर्माण करते हैं। यदि भ्रंश लम्बवत होता है तब भ्रंश को सामान्य भ्रंश कहा जाता है जहां प्रत्येक तरफ की चट्टानें एक-दूसरे से विपरीत गति करती हैं। जब एक किनारा दूसरे किनारे पर चढ़ जाता है तो इसे विलोम भ्रंश कहा जाता है। अल्प कोण का विलोम भ्रंश, क्षेप (थ्रस्ट) कहलाता है। दोनों किनारों में एक-दूसरे के सापेक्ष गति होने पर पार्श्वीय भ्रंश या चीर भ्रंश का निर्माण होता है।
विवर्तनिक भूकंप के प्रकार-
विवर्तनिक भूकंप को पुनः दो उपभागों में वर्गीकृत किया गया है-
1. आंतरिक प्लेट भूकंप      और       
2. अंतर प्लेट भूकंप में
जब कोई भूकंप विवर्तनिक प्लेट की सीमा के साथ होता है तो उसे आंतरिक प्लेट भूकंप कहते हैं। अधिकतर विवर्तनिक भूकंप प्रायः इसी श्रेणी के होते हैं। जब प्लेट के अंदर और प्लेट सीमा से दूर भूकंप आते हैं तो इन्हें अंतर प्लेट भूकंप कहते हैं।

प्रायः भ्रंश के किनारे-किनारे ही ऊर्जा निकलती है। भूपर्पटी की शैलों में गहन दरारें ही भ्रंश होती हैं। भ्रंश के दोनों तरफ शैलें विपरीत दिशा में गति करती है। जहाँ ऊपर के शैलखंड दबाव डालते हैं, उनके आपस का घर्षण उन्हें परस्पर बाँधे रहता है। फिर भी अलग होने की प्रवृत्ति के कारण एक समय पर घर्षण का प्रभाव कम हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप शैलखंड विकृत होकर अचानक एक दूसरे के विपरीत दिशा में सरक जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप ऊर्जा निकलती है और ऊर्जा तरंगें सभी दिशाओं में गतिमान होती हैं। वह स्थान जहाँ से ऊर्जा निकलती है, भूकंप का उद्गम केन्द्र (Focus) कहलाता है। इसे अवकेंद्र (Hypocentre) भी कहा जाता है। ऊर्जा तंरगें अलग-अलग दिशाओं में चलती हुई पृथ्वी की सतह तक पहुँचती हैं। भूतल पर वह बिंदु जो उद्गम केंद्र के समीपतम होता है, अधिकेंद्र (Epicentre) कहलाता है। अधिकेंद्र पर ही सबसे पहले तंरगों को महसूस किया जाता है। अधिकेंद्र उद्गम केंद्र के ठीक ऊपर (900 के कोण पर) होता है।
अधिकेंद्र को ही सामान्यतः भूंकप का केंद्र कहा जाता है अतः भूकंप का केंद्र वह स्थान होता है जिसके ठीक नीचे प्लेटों में हलचल से भूगर्भीय ऊर्जा निकलती है। इस स्थान पर भूकंप का कंपन ज्यादा होता है। कंपन की आवृत्ति ज्यों-ज्यों दूर होती जाती हैं, इसका प्रभाव कम होता जाता है। फिर भी यदि रिक्टर स्केल पर 7 या इससे अधिक की तीव्रता वाला भूकंप है तो आसपास के 40 किमी के दायरे में झटका तेज होता है। लेकिन यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि भूकंपीय आवृत्ति ऊपर की तरफ है या दायरे में। यदि कंपन की आवृत्ति ऊपर को है तो कम क्षेत्र प्रभावित होगा।
भूकंप की गहराई-
भूकंप की गहराई से मतलब है कि हलचल कितनी गहराई पर हुई है। भूकंप की गहराई जितनी ज्यादा होगी सतह पर उसकी तीव्रता उतनी ही कम महसूस होगी। अधिकांश टेक्टोनिक भूकंप 10 किलोमीटर से अधिक की गहराई से उत्पन्न नहीं होते हैं। 70 किलोमीटर से कम की गहराई पर उत्पन्न होने वाले भूकंप 'छिछले-केन्द्र' के भूकंप कहलाते हैं, जबकि 70-300 किलोमीटर के बीच की गहराई से उत्पन्न होने वाले भूकंप 'मध्य -केन्द्रीय' या 'अन्तर मध्य-केन्द्रीय' भूकंप कहलाते हैं।

भूकंपीय तरंगें (Earthquake waves)-
सभी प्राकृतिक भूकंप स्थलमंडल (Lithosphere) में ही आते हैं। स्थलमंडल पृथ्वी के धरातल से 200 कि0मी0 तक की गहराई वाले भाग को कहते हैं। भूकंपमापी यंत्र (Seismograph) सतह पर पहुँचने वाली भूकंप तरंगों को अभिलेखित करता हैं। यह वक्र तीन अलग बनावट वाली तरंगों को प्रदर्शित करता है। भूकंपीय तरंगों के प्रकार-
बुनियादी तौर पर भूकंपीय तरंगें दो प्रकार की हैं -
1. भूगर्भिक तरंगें या काय तरंगें (Body waves)
2. धरातलीय तरंगें (Surface waves)
(1) भूगर्भिक तरंगें-
उद्गम केंद्र से ऊर्जा के मुक्त होने के कारण भूगर्भिक तरंगें उत्पन्न होती हैं और पृथ्वी के अंदरूनी भाग से होकर सभी दिशाओं में आगे बढ़ती हैं। इसलिए इन्हें भूगर्भिक तरंगें कहा जाता है।
भूगर्भीय तरंगों के प्रकार-
भूगर्भीय तरंगें भी दो प्रकार की होती हैं। इन्हें 'P' तरंगें 'S' तरंगें कहा जाता है।
(1.1) 'P' तरंगें-
'P' तरंगें तीव्र गति से चलने वाली तरंगें हैं और धरातल पर सबसे पहले पहुँचती हैं। इन्हें प्राथमिक तरंगेंभी कहा जाता है। 'P' तरंगें ध्वनि तरंगों जैसी होती है। ये गैस, तरल ठोस तीनों प्रकार के पदार्थों से गुजर सकती हैं। 'P' तरंगों को 'अनुदेर्ध्य पृष्ठीय तरंग' भी कहा जाता है, क्योंकि इनके द्वारा कम्पन तरंग संचरण की दिशा में (आगे-पीछे) होते हैं चूँकि इनमें चट्टानों के कण माध्यम में आगे-पीछे कम्पन करते हैं, अतः हमें सबसे पहले 'P' तरंगों का अनुभव होता है। 'P' तरंगों के कारण ही भवनों में सर्वप्रथम कंपन होता है। 'P' तरंगों के बाद ही किसी संरचना के पार्श्वीय भाग को स्पंदित करने वाली एस तरंगों के प्रभाव को अनुभव किया जा सकता है। चूंकि इमारतों को लंबवत कंपनों की तुलना में अनुप्रस्थ कंपन आसानी से क्षतिग्रस्त करती हैं। अतः 'P' तरंगें अधिक विनाशकारी है।
(1.2) 'S' तरंगें-
'S' तरंगें धरातल पर कुछ समय अंतराल के बाद पहुँचती हैं। ये 'द्वितीयक तरंगें' कहलाती हैं। 'S' तरंगों की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि ये केवल ठोस पदार्थों के ही माध्यम से चलती हैं। है। इसी विशेषता ने वैज्ञानिकों को भूगर्भीय संरचना समझने में मदद की। 'S' तरंगों को 'अनुप्रस्थ पृष्ठीय तरंग' भी कहा जाता है, क्योंकि इनके द्वारा कम्पन तरंग संचरण के लम्बवत होते हैं
सूक्ष्म और तीव्र वेग वाली होने के कारण P एवं S तरंगें झटकों और धक्कों के लिए जिम्मेदार होती है।
(2) धरातलीय तरंगें (Surface Waves)­-
भूगर्भिक तरंगों एवं धरातलीय शैलों के मध्य अन्योन्य क्रिया के कारण नई तरंगें उत्पन्न होती हैं, जिन्हें धरातलीय तरंगें कहा जाता है। ये तरंगें धरातल के साथ-साथ चलती हैं। इन तरंगों का वेग अलग-अलग घनत्व वाले पदार्थों से गुजरने पर परिवर्तित हो जाता है। अधिक घनत्व वाले पदार्थों में तरंगों का वेग अधिक होता है। पदार्थों के घनत्व में भिन्नताएँ होने के कारण परावर्तन (Reflection) एवं अपवर्तन (Refraction) होता है, जिससे इन तरंगों की दिशा भी बदलती है। परावर्तन (Reflection) से तरंगें प्रतिध्वनित होकर वापस लौट आती है जबकि अपवर्तन (Refrection) से तरंगें कई दिशाओं में चलती हैं। भूकंपलेखी पर बने आरेख से तरंगों की दिशा-भिन्नता का अनुमान लगाया जाता है। धरातलीय तरंगें भूकंपलेखी पर अंत में अभिलेखित होती हैं। ये तरंगें ज्यादा विनाशकारी होती हैं। इनसे शैल विस्थापित होती हैं और इमारतें गिर जाती हैं।
धरातलीय तरंगों (Surface Waves) के प्रकार-
धरातलीय तरंगें दो प्रकार की तरंगे लव तरंग और रैले तरंग होती है।

2.1 रैले तरंग- इनका यह नाम इन तरंगों की उपस्थिति का पता लगाने वाले वैज्ञानिक लार्ड रैले (1842-1919) के नाम पर दिया गया है। यह तरंगें सतह के ऊपर गति करती हुई चट्टानों के कणों को दीर्घवृत्तीय गति प्रदान करती हैं। अधिक आयाम की रैले तरंग को स्टोनले तरंग कहते हैं।

2.2 लव तरंग- इन तरंगों का नाम वैज्ञानिक ऑगस्टस एडवर्ड हंज लव के नाम पर रखा गया है। लव तरंगें चट्टानों के कणों को अपने फैलाव की दिशा से लंबवत विस्थापित करती है और इन तरंगों में कोई लंबवत और अनुप्रस्थ घटक नहीं होता है।
वहीं रैले और लव तरंगों के कारण कम आवृत्ति वाले कंपन उत्पन्न होते हैं।
भूगर्भिक तरंगें या काय तरंगों और धरातलीय तरंगों में अंतर-
1. भूगर्भिक तरंगें या काय तरंगों सूक्ष्म और तीव्र वेग की होती है इस कारण ये तरंगें झटकों और धक्कों के लिए जिम्मेदार होती है। इसके विपरीत धरातलीय तरंगें लंबी और धीमी होती हैं और यह लहरदार (रोलिंग) प्रभाव उत्पन्न करती हैं।
2. भूकंपी तरंगों की गति विभिन्न प्रकार की चट्टानों में अलग-अलग होती हैं। जहां धरातलीय तरंगें अधिक समय तक बनी रहती हैं, वहीं भूगर्भिक तरंगें कुछ ही समय में समाप्त हो जाती हैं।
भूकंपीय तरंगों का संचरण-
भिन्न-भिन्न प्रकार की भूकंपीय तरंगों के संचरित होने की प्रणाली भिन्न-भिन्न होती है। जैसे ही ये संचरित होती हैं तो शैलों में कंपन पैदा होती है। 'P' तरंगों से कंपन की दिशा तरंगों की दिशा के समानांतर ही होती है। यह संचरण गति की दिशा में ही पदार्थ पर दबाव डालती है। इसके (दबाव) के फलस्वरूप पदार्थ के घनत्व में भिन्नता आती है और शैलों में संकुचन फैलाव की प्रक्रिया पैदा होती है। अन्य तीन तरह की तरंगें संचरण गति के समकोण दिशा में कंपन पैदा करती हैं। 'S' तरंगें ऊर्ध्वाधर तल में, तरंगों की दिशा के समकोण पर कंपन पैदा करती हैं। अतः ये जिस पदार्थ से गुजरती हैं उसमें उभार गर्त बनाती हैं। धरातलीय तरंगें सबसे अधिक विनाशकारी समझी जाती हैं।
     
भूकंपों की माप-
भूकंपीय घटनाओं का मापन भूकंपीय तीव्रता के आधार पर अथवा आघात की तीव्रता के आधार पर किया जाता है। भूकंपीय तीव्रता की मापनी को 'रिक्टर स्केल' (Richter scale) के नाम से जाना जाता है। भूकंपीय तीव्रता भूकंप के दौरान ऊर्जा मुक्त होने से संबंधित है। इस मापनी के अनुसार भूकंप की तीव्रता 0 से 10 तक होती है। भूकंपीय आघात की तीव्रता/गहनता की मापनी (Intensity scale) को इटली के भूकंप वैज्ञानिक मरकैली (Mercalli) के नाम पर जाना जाता है। यह झटकों से हुई प्रत्यक्ष हानि द्वारा निर्धारित की जाती है। इसकी गहनता या तीव्रता 1 से 12 तक होती है। भूकंपलेखी यंत्र (Seismograph) द्वारा दूरस्थ स्थानों से आने वाली भूकंपीय तरंगों को अभिलेखित किया जाता है।
भूकंप के आघात-
किसी बड़े भूकंप से पहले अथवा बाद में विभिन्न तीव्रता के कंपन उत्पन्न होते हैं। भूकंप-वैज्ञानिकों ने इस घटना की व्याख्या करने के लिए निम्नलिखित तीन आघातों को बताया है-
1. पूर्ववर्ती आघात- मुख्य आघात से पहले के कंपन को पूर्ववर्ती आघात कहते हैं।
2. मुख्य आघात- किसी भी भूकंप समूह के सबसे बड़े भूकंप को, जिसका परिमाण सर्वाधिक हो, मुख्य आघात कहते हैं।
3. पश्चवर्ती आघात- मुख्य आघात के बाद आने वाले कंपनों को पश्चवर्ती आघात कहा जाता है।

भारत को भूकंप का खतरा-
इंडियन प्लेट हिमालय से लेकर अंटार्कटिक तक फैली है। यह पाकिस्तान बार्डर से सिर्फ छूती भर है। यह हिमालय के दक्षिण में है। जबकि यूरेशियन प्लेट हिमालय के उत्तर में है। इंडियन प्लेट उत्तर-पूर्व दिशा में यूरेशियन प्लेट जिसमें चीन आदि बसे हैं कि तरफ बढ़ रही है। यदि ये प्लेट टकराती हैं तो भूकंप का केंद्र भारत में होगा।

भारत के भूंकपीय क्षेत्र (जोन)-

भारत के भूंकपीय क्षेत्र Indian Seismic Zone
Intensity on MMI scale
I (Very Low intensity zone- अति अल्प तीव्रता क्षेत्र)
less than V
II (Low intensity zone- अल्प तीव्रता क्षेत्र)
VI (or less)
III (Moderate intensity zone- मध्यम तीव्रता क्षेत्र)
VII
IV (Severe intensity zone- उच्च तीव्रता क्षेत्र)
VIII
V (Very severe intensity zone- अति उच्च तीव्रता क्षेत्र)
IX (and above)

भूंकप के जोखिम के हिसाब से भारत को चार भूंकपीय जोनों में विभाजित किया गया है। जोन I- में अत्यंत कम या नगण्य खतरे वाले स्थान हैं। जोन II- दक्षिण भारतीय क्षेत्र, जो सबसे कम जोखिम वाले हैं। जोन III-मध्य भारत, जोन IV-दिल्ली समेत उत्तर भारत का तराई क्षेत्र, जोन V-हिमालय क्षेत्र और पूर्वोत्तर क्षेत्र तथा कच्छ। सबसे ज्यादा खतरे वाले स्थान जोन V में हैं।

भूकंपीय माइक्रोजोनिंग-
देश में भूकंप के संबंध में अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए माइक्रोजोनिंग का कार्य शुरू किया गया है। इसमें क्षेत्रवार जमीन की संरचना आदि के आधार पर से मुख्य भूकंप जोनों (क्षेत्रों) को भूकंप के खतरों के हिसाब से तीन माइक्रोजोन में विभाजित किया जाता है। दिल्ली, बेंगलूर समेत कई शहरों की ऐसी माइक्रोजोनिंग हो चुकी है।

भूकंप की तीव्रता के आधार पर वर्गीकरण-
हल्के भूकंप- रिक्टर स्केल पर 5 से कम तीव्रता वाले भूकंपों को हल्का माना जाता है। साल में करीब 6000 ऐसे भूकंप आते हैं। जबकि 2 या इससे कम तीव्रता वाले भूकंपों को रिकार्ड करना भी मुश्किल होता है तथा उनके झटके महसूस भी नहीं किए जाते हैं। ऐसे भूकंप साल में 8000 से भी ज्यादा आते हैं।
मध्यम और बड़े भूकंप- रिक्टर स्केल पर 5-5.9 के भूकंप मध्यम दर्जे के होते हैं तथा प्रतिवर्ष 800 झटके लगते हैं। जबकि 6-6.9 तीव्रता के तक के भूकंप बड़े माने जाते हैं तथा साल में 120 बार आते हैं। 7-7.9 तीव्रता के भूकंप साल में 18 आते हैं। जबकि 8-8.9 तीव्रता के भूकंप साल में एक आ सकता है। इससे बड़े भूकंप 20 साल में एक बार आने की आशंका रहती है। रिक्टर स्केल पर साधारणतया 5 तक की तीव्रता वाले भूकंप खतरनाक नहीं होते हैं। लेकिन यह क्षेत्र की संरचना पर निर्भर करता है। यदि भूकंप का केंद्र नदी का तट पर हो और वहां भूकंपरोधी तकनीक के बगैर ऊंची इमारतें बनी हों तो 5 की तीव्रता वाला भूकंप भी खतरनाक हो सकता है। यह देखा गया है कि 8.5 तीव्रता वाला भूकंप 7.5 तीव्रता वाले भूकंप से करीब 30 गुना अधिक शक्तिशाली होता है।
भारत में आए मुख्य भूकंप-
भारतीय मौसम विभाग द्वारा तैयार किए गए एक कैटलाग में भारत में आए भूकंपों में से 1200 भूकंपों को सूचीबद्ध किया गया है जिनमे से मुख्य भूकंप निम्नांकित हैं-
दिनांक
भूकंप का अधिकेंद्र
तीव्रता
16 जून, 1819
कच्छ, गुजरात
8.0
10 जनवरी, 1869
कचार के पास, असम
7.5
30 मई, 1885
सोपोर, जम्मू एवं कश्मीर
7.0
12 जून, 1897
शिलांग
8.7
08 फरवरी, 1900
कोयम्बटूर
6.0
04 अप्रैल, 1905
कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश
8.0
08 जुलाई, 1918
श्रीमंगल, असम
7.6
02 जुलाई, 1930
दुब्री, असम
7.1
15 जनवरी, 1934
बिहार-नेपाल सीमा
8.3
26 जून, 1941
अंडमान द्वीप
8.1
23 अक्टूबर, 1943
असम
7.2
15 अगस्त, 1950
असम
8.5
21 जुलाई, 1956
अंजार, गुजरात
7.0
10 दिसंबर, 1957
कोयना, महाराष्ट्र
6.5
19 जनवरी, 1975
किन्नौर, हिमाचल प्रदेश
6.2
06 अगस्त, 1988
मणिपुर, म्यांमार सीमा
6.6
21 अगस्त, 1988
बिहार-नेपाल सीमा
6.4
20 अक्टूबर, 1991
उत्तरकाशी
6.6
30 सितंबर, 1993
लातूर, महाराष्ट्र
6.3
22 मई, 1997
जबलपुर, मध्यप्रदेश
6.0
29 मार्च, 1999
चमोली, उत्तराखंड
6.8
26 जनवरी, 2001
भुज, गुजरात
7.8

सुनामी-
समुद्र के भीतर भूकंप से या भूकंप के कारण हुए भू स्खलन के समुद्र में टकराने से सुनामी आ सकते हैं। उदाहरण के लिए, 2004 में हिंद महासागर में आई सुनामी भूकंप। समुद्र के भीतर अचानक जब बड़ी तेज़ हलचल होने लगती है तो उसमें उफान उठता है जिससे ऐसी लंबी और बहुत ऊंची लहरों का रेला उठना शुरू हो जाता है जो ज़बरदस्त आवेग के साथ आगे बढ़ता है, जिसे सूनामी कहते हैं। दरअसल सूनामी जापानी शब्द है जो सू और नामी से मिल कर बना है सू का अर्थ है समुद्र तट औऱ नामी का अर्थ है लहरें।
भूकंप के खतरों से बचाव-
भूकंप के खतरों से बचाव के लिए नए घरों को भूकंप रोधी बनाना चाहिए। जिस स्थान पर घर बना रहे हैं उसकी जांच करा लेनी चाहिए कि वहां जमीन की संरचना भूकंप के लिहाज से मजबूत है या नहीं। भूकंप रोधी मकान महंगे नहीं होते हैं। भूकंप रोधी घरों को बनाने की तकनीक अलग है। यदि घर पुराने हैं तो रेट्रोफिटिंग नामक तकनीक उपलब्ध है जिसके द्वारा उसे भूकंपरोधी बना सकते हैं। इसमें दीवारों को पास में जोड़ा जाता है।

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