1/09/2011 10:46:00 pm
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1. रामदेवरा (जैसलमेर)-

देश में ऐसे देवता कम ही हैं जिनके दर पर हिन्दू-मुसलमान दोनों ही श्रद्धा और आस्था से सिर नवाते हैं। ऐसे ही एक लोक देवता है परमाणु विस्फोट के लिए प्रसिद्ध जैसलमेर के पोकरण से 13 किमी दूर स्थित रुणीजा अर्थात रामदेवरा के बाबा रामदेव। हिन्दू-मुस्लिम एकता व पिछडे वर्ग के उत्थान के लिए कार्य करने वाले प्रसिद्ध संत बाबा रामदेव की श्रद्धा में डूबे लाखों भक्त प्रतिवर्ष दर्शनार्थ आते है। हिन्दू मुस्लिम दोनों की आस्था के केन्द्र रामदेव के मंदिर में लोक देवता रामदेवजी की मूर्ति भी है और रामसा पीर की समाधि (मजार) भी। मान्यता है कि यहाँ के पवित्र राम सरोवर में स्नान से अनेक चर्मरोगों से मुक्ति मिलती है। चमत्कारी रामसा पीर के श्रद्धालु केवल आसपास के इलाकों से ही नहीं वरन् गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश से भी सैंकडों किलोमीटर पैदल चल कर आते हैं। यहाँ प्रतिवर्ष भादवा शुक्ल द्वितीया से भादवा शुक्ल एकादशी तक विशाल मेला लगता है। बाबा रामदेव का जन्म विक्रम संवत 1409 की भादवा शुक्ल पंचमी को तोमर वंशीय अजमल जी और माता मैणादे के यहाँ हुआ था। माना जाता है कि ये भगवान श्रीकृष्ण का अवतार थे। रामदेव अपने जीवन काल में ही अपने चमत्कारों से लोगों की आस्था का केन्द्र हो गये। भैरव राक्षस के आतंक से लोगों को मुक्त कराना, बोयता महाजन के डूबते जहाज को बचाना, सगुनाबाई के बच्चों को जीवित करना, अंधों को दृष्टि प्रदान करना और कोढियों को रोगमुक्त करना उनके चमत्कारों में से कुछ थे ।

2. केला देवी (करौली)-

करौली से 23 किमी दूर स्थित इस स्थान पर जादौन राजपूत (यादव या यदुवंश) की कुलदेवी केलादेवी का भव्य मंदिर है। त्रिकुट पहाड़ियों के मध्य यह स्थान बनास की सहायक कालीसिल नदी के किनारे स्थित है। संगमरमर से बने मुख्य मंदिर में केलादेवी और चामुण्डा देवी की प्रतिमाएं स्थापित है। केलादेवी को महालक्ष्मी का रूप भी माना जाता है । नवरात्रि के दौरान प्रतिवर्ष यहाँ लाखों श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं । चैत्र कृष्ण द्वादशी से प्रारंभ हो कर एक पखवाड़े तक चलने वाले केलादेवी मेले में लाखों दर्शनार्थियों के आने के कारण इसे लक्खी मेला कहा जाता है । राजपूतोँ के अतिरिक्त मीणा भी इसके प्रमुख भक्त माने जाते हैं । यहाँ एक भैरव मंदिर एवं हनुमान (लांगुरिया) मंदिर भी बने हुए हैं । इस मेले में करोली के ख्यातिनाम लांगुरिया लोकगीत भी गाए जाते हैं । केलादेवी को शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ भी माना जाता है।

3. दरगाह अजमेर शरीफ-

इसका भारत में ही नहीं वरन विदेशों में भी बड़ा महत्व है। यह प्रसिद्ध सूफी संत ख्वाज़ा मोइनुद्धीन चिश्ती की दरगाह है। ख्वाज़ा मोइनुद्धीन चिश्ती एक ऐसे संत थे जिन्होंने धर्म का ध्यान रखे बिना प्रत्येक धर्म के गरीबों की सेवा के लिए कार्य किया और 'गरीब नवाज' कहलाए। इसी कारण यह तीर्थ अजमेर आने वाले केवल मुसलमानों के लिए ही नहीं बल्कि सभी धर्मावलम्बियों के लिये एक पवित्र स्थान है। सभी मुस्लिम तीर्थ स्थलों में मक्का के बाद इसका दूसरा स्थान हैं। इसलिये इसे भारत का मक्का भी कहा जाता हैं। इसका निर्माण 13वीं शताब्दी का माना जाता हैं। यहाँ आने वाले जायरीन चाहे वे किसी भी मजहब के क्यों न हों, ख्वाज़ा के पर दस्तक देने अवश्य आते हैं। यह दरगाह अजमेर स्टेशन से 2 किमी. दूर स्थित है। दरगाह में अंदर सफेद संगमरमरी शाहजहांनी मस्जिद,बारीक कारीगरी युक्त बेगमी दालान, जन्नती दरवाजा, बुलंद दरवाज़ा एवं दो मुगलकालीन देगेँ हैं। इन देगों में काजू, बादाम, पिस्ता इत्यादि सूखे मेवो तथा इलायची, केसर युक्त चावल पकाया जाता है और गरीबों में बाँटा जाता है। ख्वाज़ा की पुण्यतिथि पर प्रतिवर्ष रज्जब के पहले दिन से छठे दिन तक यहाँ उर्स का आयोजन किया जाता है, जिसमें लाखों जायरीन देश-विदेश से आकर जियारत करते हैं।

4. श्रीचारभुजानाथ (गढ़बोर, राजसमन्द)-


राजसमन्द जिला मुख्यालय से 38 किमी दूर अरावली पर्वत श्रंखला के मध्य गढ़बोर गाँव मेँ स्थित 'चारभुजानाथ धाम' भगवान विष्णु का एक प्रसिद्ध मंदिर है। इसके समीप ही प्रसिद्ध दुर्ग कुंभलगढ़ है। पास ही गोमती नदी प्रवाहित होती है। इस मंदिर में स्थित शिलालेख के अनुसार इसका निर्माण 1444 AD में के गंगदेव द्वारा कराया गया। इस गाँव का नाम पूर्व में बद्री था इसी कारण इस प्रतिमा को बद्रीनाथ भी माना जाता है। श्रीचारभुजानाथ की काले पत्थर की प्रतिमा 85 सेमी ऊँची है। इसके चार हाथ है, इनमें शंख, चक्र, गदा और कमल का पुष्प है । इस मंदिर के पुजारी गुर्जर हैं लेकिन सभी जातियों द्वारा इनकी अर्चना की जाती है। यह मंदिर संगमरमर और चूने की घुटाई से बना है तथा इसमें काँच की सुंदर कारागरी की गई है । यहाँ निज मंदिर के दरवाजे सोने के है जबकि बाहर के दरवाजे चाँदी के हैं। यहाँ परिसर में भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ की प्रतिमा भी स्थापित है। प्रवेश द्वार पर पत्थर के दो हाथी भी बने हैं। लाखों तीर्थ यात्री इस मंदिर की यात्रा करते हैं । जनश्रुति है कि यहाँ पाण्डवों ने अपना निर्वासन काल बिताया था। यहाँ प्रतिवर्ष जलझूलनी एकादशी (भाद्रपद शुक्ल एकादशी) को एक विशाल मेला भरता है जिसमें हजारों श्रद्धालु आते हैं। इस मेले में चारभुजानाथ की विशाल रामरेवाड़ी यात्रा निकलती है जिसकी बहुत बड़ी शोभायात्रा होती है। इस मेले हेतु भक्त मध्यप्रदेश, मेवाड़ और मारवाड से सैकड़ों किलोमीटर की पदयात्रा करके भी पहुँचते हैं।

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