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UN SDG - Inclusive and equitable quality education for all संयुक्त राष्ट्र का टिकाऊ विकास का चौथा लक्ष्य : सर्वजन के लिए गुणवत्तापरक और समावेशी शिक्षा

संयुक्त राष्ट्र का टिकाऊ विकास का चौथा लक्ष्य : सर्वजन के लिए गुणवत्तापरक और समावेशी शिक्षा 

UN SDG - Ensure inclusive and equitable quality education and promote lifelong learning opportunities for all

समूचे विश्व में पिछले कुछ दशकों में शिक्षा को सर्वसुलभ बनाने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रगति हुई है, लेकिन ग़रीबी, हिंसक संघर्षों और अन्य आपात हालात के चलते अब भी कई देशों में इस दिशा में चुनौतियां बनी हुई हैं। 2030 टिकाऊ विकास एजेंडे का चौथा लक्ष्य सर्वजन के लिए गुणवत्तापरक और समावेशी शिक्षा सुनिश्चित करने पर ही केंद्रित है।
संयुक्त राष्ट्र द्वारा टिकाऊ विकास के 2030 एजेंडे से जुड़े 17 लक्ष्यों में से किसी एक लक्ष्य पर हर महीने अपना ध्यान केंद्रित किया जाता हैं। इसी कड़ी में संयुक्त राष्ट्र की वेबसाइट पर टिकाऊ विकास के चौथे लक्ष्य पर जानकारी साझा की गयी हैं, जिसका उद्देश्य दुनिया में गुणवत्तापरक शिक्षा को सुनिश्चित करना है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा टिकाऊ विकास की बुनियाद है, इसीलिए यह टिकाऊ विकास लक्ष्य की बुनियाद भी है। नीतिगत हस्तक्षेप के तौर पर शिक्षा एक ऐसा ज़रिया है जो आत्मनिर्भर बनाता है, कौशल में वृद्धि से आर्थिक वृद्धि बढ़ाने में सहायक है और बेहतर आजीविका के लिए अवसर खोलकर लोगों के जीवन स्तर में सुधार कर सकता है।
आज दुनिया में ज्ञान प्राप्त करने के पहले से कहीं अधिक अवसर हैं लेकिन सभी उनका लाभ नहीं उठा सकते। अनेक देशों ने सभी स्तरों पर शिक्षा की सुलभता बढ़ाने और स्कूलों में भर्ती दरों में वृद्धि करने में बहुत प्रगति की है और बुनियादी साक्षरता कौशल में भी ज़बरदस्त सुधार हुआ है, जिसके कुछ पैरामीटर आगे दिए गए हैं -
  • 15-24 वर्ष की आयु के युवा वर्ग में दुनिया भर में 1990 और 2016 के बीच साक्षरता सुधरी है। यह दर 83 प्रतिशत से बढ़कर 91 प्रतिशत हो गई है। 
  • प्राइमरी स्कूलों में शिक्षा पूरी करने वाले बच्चों की दर 89.6 फ़ीसदी है हालांकि 2013 में यह दर 90 प्रतिशत को पार कर गई थी।
  • गिने-चुने देशों ने ही शिक्षा के सभी स्तरों पर लैंगिक समानता हासिल की है। 
  • हर पांच में से एक बच्चा, किशोर और युवा स्कूल से बाहर है। 
  • इनमें प्राथमिक स्कूल जाने की उम्र वाले छह करोड़ से अधिक बच्चे,  निचले माध्यमिक स्कूलों की उम्र वाले छह करोड़ और ऊपरी माध्यमिक स्कूल की उम्र वाले 13 करोड़ से ज़्यादा बच्चे शामिल हैं।

चुनौती क्या है?

  • आज विश्व  के पास पहले से कहीं अधिक ज्ञान है। किन्तु  हर व्यक्ति उसका लाभ नहीं उठा सकता। दुनिया भर में देशों ने सभी स्तरों पर शिक्षा की सुलभता बढ़ाने और स्कू्लों में भर्ती दरों में वृद्धि करने में बहुत प्रगति की है तथा बुनियादी साक्षरता कौशल में भी जबरदस्त सुधार हुआ है। इन तमाम सफलताओं के बावजूद अनेक कमियां बाकी हैं। गिने-चुने देशों ने ही शिक्षा के सभी स्तरों पर जैंडर समानता हासिल की है। इसके अलावा 5.7 करोड़ बच्चे अब भी स्कूलों से बाहर हैं और इनमें से आधे सहारा के दक्षिणी अफ्रीकी देशों में रहते हैं।

सर्वजन के लिए गुणवत्तापरक और समावेशी शिक्षा क्यों महत्वपूर्ण  है -

  • गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सतत् विकास की बुनियाद है, इसीलिए सतत् विकास लक्ष्य की बुनियाद भी है। नीतिगत हस्तक्षेप के तौर पर शिक्षा, ताकत को कई गुणा बढ़ाने वाली शक्ति है, जो आत्मननिर्भरता देती है, कौशल में वृद्धि से आर्थिक वृद्धि बढ़ाती है तथा बेहतर आजीविका के लिए अवसर खोलकर लोगों के जीवन स्तर में सुधार करती है।
  • 2030 के लिए सतत् विकास लक्ष्यों में सभी  बालक-बालिकाओं की प्राइमरी और माध्यमिक शिक्षा पूरी कराना और हर किसी के लिए उत्तम एवं व्याकवसायिक शिक्षा पाने के अवसर बराबरी के आधार पर सुलभ कराने की गारंटी देने का आह्वान किया गया है। नीतिगत उपायों से सुलभता और शिक्षा की गुणवत्ताा सुधारने के साथ-साथ संबद्ध बाधाओं को भी हटाना होगा, जिनमें जैंडर असमानताएं, खाद्य सुरक्षा और सशस्त्र  संघर्ष शामिल हैं।

भारत और एसडीजी लक्ष्य-4

भारत में प्राथमिक शिक्षा सर्व सुलभ कराने में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। प्राइमरी और प्रारंभिक, दोनों स्तर के स्कूलों में लड़कियों की भर्ती और शिक्षा पूरी करने में सुधार हुआ है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति और टिकाऊ विकास लक्ष्य-4, दोनों का उद्देश्य ''सबके लिए उत्तम शिक्षा और आजीवन सीखने की सुविधा'' देना है।
सरकार की प्रमुख योजना सर्व शिक्षा अभियान का उद्देश्य सभी भारतीयों के लिए सर्व सुलभ उत्तम शिक्षा प्रदान करना था। सरकार के इस प्रयास में पोषित आहार, उच्चतर शिक्षा और शिक्षक प्रशिक्षण से जुड़ी अन्य लक्षित योजनाओं से सहारा मिला है।
2013-14 तक लड़के और लड़कियों के लिए प्राइमरी शिक्षा में शुद्ध भर्ती दर 88% थी, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर युवा साक्षरता दर लड़कों के लिए 94% और लड़कियों के लिए 92% थी।

एसडीजी-4 के मुख्य उद्देश्य-

  • 2030 तक सुनिश्चित करना कि सभी बालक-बालिका समान और उत्तम निःशुल्क प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा पूरी करें, जिससे संयुक्त राष्ट्र टिकाऊ विकास के चौथे लक्ष्य के लिए उपयुक्त और प्रभावकारी परिणाम हासिल हो सकें।
  • 2030 तक सुनिश्चित करना कि सभी बालक-बालिकाओं को बाल्यकाल में ही उत्तम विकास, देखभाल और प्राथमिक पूर्व शिक्षा सुलभ हो जिससे वे प्राथमिक शिक्षा के लिए तैयार हो सकें।
  • 2030 तक सुनिश्चित करना कि सभी महिलाओं और पुरुषों को समान रूप से सस्ती और गुणवत्तापूर्ण स्नातक/स्नातकोत्तर स्तर की अकादमिक, तकनीकी व व्यावसायिक शिक्षा, विश्वविद्यालय सहित सुलभ हो।
  • 2030 तक ऐसे युवाओं और वयस्कों  की संख्या में काफ़ी हद तक वृद्धि करना, जिनके पास अच्छीे नौकरी या अच्छा रोजगार अथवा उद्यमिता के लिए तकनीकी और व्यावसायिक कौशल सहित उपयुक्त कौशल हों।
  • 2030 तक शिक्षा में लड़कियों और लड़कों के बीच विषमता पूरी तरह समाप्त करना और विकलांग व्यक्तियों, मूल निवासियों और संकट की परिस्थितियों में घिरे बच्चों सहित सभी के लिए शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण के सभी स्तरों तक समान पहुंच सुनिश्चित करना।
  • 2030 तक सुनिश्चित करना कि सभी युवा और वयस्कों का एक बड़ा अनुपात (पुरुष और महिला सहित) साक्षर हो जाएं और गणना करना सीख लें।
  • 2030 तक सुनिश्चित करना कि सीखने वाले सभी लोग टिकाऊ विकास को प्रोत्साहित करने के लिए आवश्यक ज्ञान और कौशल प्राप्त कर लें। इसमें अन्य बातों के अलावा टिकाऊ विकास और टिकाऊ जीवन शैली, मानव अधिकारों, लैंगिक समानता, शांति और अहिंसा की संस्कृति को प्रोत्साहन, वैश्विक नागरिकता, सांस्कृतिक विविधता की समझ और टिकाऊ विकास में संस्कृति के योगदान के बारे में शिक्षा प्राप्त करना शामिल है।
  • ऐसी शिक्षण सुविधाओं का निर्माण करना और उन्हें उन्नत करना जो बाल, विकलांगता और लैंगिक संवेदी हों तथा सबके लिए सुरक्षित, अहिंसक, समावेशी और सीखने का प्रभावी वातावरण प्रदान कर सके।
  • 2020 तक दुनिया भर में विकासशील देशों, ख़ासकर सबसे कम विकसित देशों, लघु द्वीपीय विकासशील देशों और अफ़्रीकी देशों के लिए उपलब्ध छात्रवृत्तियों की संख्या में उल्लेखनीय विस्तार करना जिससे इन देशों के लोग व्यावसायिक प्रशिक्षण, सूचना एवं संचार तकनीक, तकनीकी, इंजीनियरिंग और वैज्ञानिक कार्यक्रमों में विकसित देशों और अन्यं विकासशील देशों में उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकें।
  • 2030 तक दक्ष योग्य शिक्षकों की आपूर्ति में उल्लेखनीय वृद्धि करना। इसके लिए विकासशील देशों, विशेषकर सबसे कम विकसित देशों और लघु द्वीपीय विकासशील देशों में शिक्षक प्रशिक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग जुटाना शामिल है।
  • समावेशी और समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना तथा सबके लिए आजीवन सीखने के अवसरों को प्रोत्साहन देना। 

क्या होता है टिकाऊ विकास-

टिकाऊ विकास का अर्थ भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं की पूर्ति से समझौता किए बिना वर्तमान पीढ़ियों की जरूरतें पूरी करना है। अर्थात टिकाऊ विकास वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता है। इससे प्रगति का ऐसा समवलोकन विकसित होता है जिसमें तात्कालिक एवं दीर्घकालीन उद्देश्य, स्थानीय और वैश्विक कार्यक्रम एकांगी होते हैं। वस्तुतः विकास मानव प्रगति के अविभाज्य और परस्पर आश्रित घटकों के रूप में सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय मुद्दों से जुड़ा है।
अब तक आर्थिक विकास के दो आधार माने जाते रहे हैंः

1. इसमें केवल मानव जाति की जरूरतों पर विचार किया गया है और परस्पर आश्रित पारिस्थितिकी की उपेक्षा की गई है।
2. इसमें पर्यावरण को वस्तु के रूप में समझा जाता है।
 
‘‘टिकाऊ विकास‘‘ (sustainable development) शब्द ब्रुंटल आयोग ने गढ़ा है, जिसमें टिकाऊ  विकास  को  ऐसे  विकास  के  रूप  में  पारिभाषित  किया  गया  है,  जो  ‘‘अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु भावी पीढ़ियों के सामर्थ्य से समझौता किए बिना वर्तमान जरूरतों की पूर्ति करता है।‘‘ 
टिकाऊ विकास का अर्थ प्राकृतिक पर्यावरण के बचाव के साथ मनुष्य की जरूरतों की पूर्ति में संतुलन लाना है ताकि वर्तमान में ही जरूरतों की पूर्ति न हो, बल्कि अपरिमित भविष्य में भी संसाधन बने रहें। टिकाऊ विकास संसाधनों के उपयोग का लक्ष्य मनुष्य की जरूरतें पूरी करना ही नहीं, बल्कि पर्यावरण को बचाना भी है। 

टिकाऊ विकास का क्षेत्र, अवधारणा की दृष्टि से, चार आयामों में विभाजित है; 

1. सामाजिक,        2. आर्थिक,       3. पर्यावरण एवं     4. संस्थागत। 

इनमे से पहले तीन आयाम टिकाऊ विकास के मूल सिद्धांत हैं, जबकि अंतिम आयाम संस्थागत नीति और क्षमता के मुद्दों से जुड़ा है। उक्त चारों क्षेत्रों में संतुलित वृद्धि हो ताकि किसी भी एक क्षेत्र को हानि न उठानी पड़े। 
 

सांस्कृतिक विविधता-

टिकाऊ विकास की यह प्रक्रिया केवल पर्यावरणीय मुद्दों पर ही केन्द्रित नहीं है। हमें हरित विकास और संवहनीय विकास के बीच अंतर को समझना चाहिए। हरित विकास में आर्थिक और सांस्कृतिक पक्षों की तुलना में पर्यावरण को प्राथमिकता दी जाती है परंतु सांस्कृतिक विविधता भी जैव विविधता की तरह मानव जाति के लिए आवश्यक है। यह विकास की बुनियादी शर्तों में से एक है, जिसे आर्थिक वृद्धि की दृष्टि से ही नहीं समझा जासकता, बल्कि यह सुस्थापित सामाजिक, बौद्धिक, भावात्मक, नैतिक और आध्यात्मिक अस्तित्व हासिल करने का माध्यम भी है। इस अर्थ में, सांस्कृतिक विविधता टिकाऊ विकास का एक नीतिगत क्षेत्र है। विकासशील देश जैव विविधता की दृष्टि से ही समृद्ध नहीं हैं, बल्कि सांस्कृतिक विविधता की दृष्टि से भी समृद्ध हैं। अतः हमें विश्व की विभिन्न मानव संस्कृतियों का संरक्षण करते हुए सहजीवन अपनाना होगा।

क्यों आवश्यक है टिकाऊ विकास की अवधारणा -

मनुष्य अपने हित के उन्नयन के लिए पर्यावरण का निरन्तर इस्तेमाल किए जा रहा है। मनुष्य संपन्न बनने के अपने जूनून में प्रकृति के अंधाधुंध दोहन की प्रवृत्ति का दास बन चुका है। वह उच्चतर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) प्राप्त करने तथा अत्यधिक औद्योगिक प्रगति के मोह में ग्रस्त हो चुका है। उसका यह मोह पर्यावरण को निगल रहा है तथा धरती मां के जीवन के अवलंब, पारिस्थितिकी क्षमता को तहस-नहस कर रहा है। जीवनदायी धरा का ह्रास होता जा रहा है और इसका लगातार क्षय हो रहा है। औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थ से नदियों, झीलों और समुद्र का जल प्रदूषित हो रहा है तथा इनका जल औद्योगिक उपयोग या मानवीय उपभोग दोनों के लिए उपयुक्त नहीं रहा है। वायु में विषैले गैसीय और विशिष्ट प्रदूषक तत्त्व भरे पड़े हैं। कृषि उत्पादन तथा जनस्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए प्रयुक्त कीटनाशी दवाएं पर्यावरण में विष फैला चुकी हैं। उत्पादन तथा उपभोग या खपत से जुड़ा प्रत्येक भागी अवशिष्ट पदार्थ के निपटान पर खर्च को फिजूल खर्च मानता है।
अभी भी, पर्यावरण को साझा संपत्ति समझा जाता है। प्रत्येक घटक इसका ऐसे इस्तेमाल कर रहा है, मानों उस पर मनुष्य का ही हक है। क्षति पर ध्यान दिए बिना इसका अंधाधुंध प्रयोग किया जा रहा है और इससे पर्यावरण संबंधी मानकों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है और यह स्थिति सभी के लिए हानिकारक है।

टिकाऊ विकास के मूल में है ''हमारा साझा भविष्य''-

‘‘हमारा साझा भविष्य‘‘ इस टिकाऊ विकास अवधारणा की शुरुआत है जिसके परिणामस्वरूप इस प्रकार का साहित्य तैयार किया जा रहा है। 1991 में जब से ब्राजील के रियो दी जिनेरो में संयुक्त राष्ट्र का 'पर्यावरण एवं विकास' पर सुविख्यात 'पृथ्वी शिखर सम्मेलन (Earth Summit)' हुआ है, तब से टिकाऊ विकास पर तेजी से पुस्तकें लिखी जा रही है। ब्रिटेन के ई.एफ. शूमाखर जैसे बहुपक्षीय आर्थिक सिद्धांतवादी, बैरी काॅमनर तथा लेस्टर आर, ब्राउन जैसे पर्यावरणविद, पाॅल एरलिक जैसे जनसंख्या विश्लेषक, जर्मनी के विली ब्रांट और संयुक्त राज्य अम्रीका के जिम्मी कार्टर, जैसे विभिन्न क्षेत्रों के अग्रणी लोगों ने विचारों के प्रतिपादन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
हमारी तीव्र आर्थिक प्रगति की ललक और आपाधापी तथा इसके लिए किए जा रहे प्राकृतिक सन्साधनों के अंधाधुंध दोहन ने विश्व परिदृश्य में भू, जल एवं वायु प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन परत में छेद, ऊपरी मिट्टी (top soil) का गायब होना, स्वास्थ्य संबंधी खर्चों में बहुत ज्यादा वृद्धि, एलर्जी, वैश्विक वार्मिंग, प्रजातियों का नष्ट होना, भोजन में कीटनाशी तत्त्व की वृद्धि, एंटीबायोटिक प्रतिरोधक बैक्टीरिया, अपराध, बेरोजगारी आदि जैसे नकारात्मक तत्त्व शामिल कर दिए हैं। समग्र समाज के लिए होने वाले नुकसान भी यदि उनके मूल्य में वास्तविक लागत के रूप में शामिल कर लिए जाते तो अधिकांश बाजारों में सामान्य और सर्वाधिक हानिकारक उत्पाद कदापि विनिर्मित नहीं किए जा सकते हैं। आज, किसी देश के वैश्विक कारोबार की सफलता उनके उत्पाद की यथासंभव अन्य देशों की जनता तक पहुँच पर टिकी है। सर्वाधिक मुनाफा कमाने वाली कंपनियां वही हैं, जो कारोबार चलाने की वास्तविक लागत पूरी करने के लिए किसी अन्य देश द्वारा उसका खर्चा वहन करने की तरकीब अपनाते हैं। ऐसे में उनकी औद्योगिक व आर्थिक प्रगति का भुगतान अन्य देशों को पर्यावरण क्षति के रूप में सहना पड़ता है। इस आर्थिक प्रक्रिया से शेयर धारकों को ही मुनाफा होता है, जबकि अन्य हितभागी पर्यावरण को स्वच्छ बनाना तथा बेरोजगारी की समस्या से निपटना आदि के खर्चे ही उठाते रहते हैं। अतः इन समस्याओं से निजात पाने के लिए यह आवश्यक है कि हम सभी टिकाऊ विकास के लिए कार्य करें।

टिकाऊ विकास संवर्धन के उपाय-

टिकाऊ विकास इक्कीसवीं सदी के महत्त्वपूर्ण विकास का एजेंडा है तथा यह समग्र विकास की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण बदलाव दर्शाता लाता है। सभी देशों को टिकाऊ विकास संवर्धन के लिए उपयुक्त उपाय अपनाने होंगे। संयुक्त राष्ट्र ने संस्थागत फ्रेमवर्क में टिकाऊ विकास पर बल दिया है। टिकाऊ विकास के लिए सुशासन, सुदृढ़ आर्थिक नीतियों व लोगों की जरूरतों की पूर्ति हेतु जिम्मेदार सामाजिक लोकतांत्रिक संस्थाओं और समुन्नत बुनियादी ढाँचे का होना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त, ये टिकाऊ आर्थिक वृद्धि, ग़रीबी उन्मूलन तथा रोजगार के सृजन का भी आधार हैं। 
 

टिकाऊ विकास के संकेतक-

संयुक्त राष्ट्र टिकाऊ विकास आयोग (सीएसडी) द्वारा 1995 में बनाए गए संकेतकों के अनुसार टिकाऊ विकास के सामाजिक संकेतक मोटे तौर पर इस प्रकार वर्गीकृत हैं:-
  1. ग़रीबी 
  2. शासन
  3. स्वास्थ्य
  4. शिक्षा
  5. जनांकिकी
टिकाऊ विकास के संवर्धन के लिए सुझाए गए कुछ उपाय इस प्रकार हैं:
  1. टिकाऊ विकास के संवर्धन का आधार भूमि, जल और ऊर्जा संबंधी संसाधनों का परिरक्षण है। सीमित संसाधनों के परिरक्षण के लिए उपयुक्त कार्रवाई करनी होगी। वर्तमान पीढ़ी द्वारा संसाधनों के परिरक्षण के परिणामस्वरूप भावी पीढ़ी के पास अपार संभावनाएं होंगी।
  2. ऐसी प्रौद्योगिकी और उपागमों (एप्रोच) का विकास, जिनसे पर्यावरण को कम से कम क्षति पहुंचे। ऐसे विकास के लिए वैज्ञानिक जानकारी तथा निरंतर निवेश अपेक्षित हैं। 
  3. पर्यावरणीय लक्ष्यों के कार्यान्वयन के लिए राजनीतिक और जनता का सहयोग नितांत अनिवार्य है।
  4. पर्यावरणीय मुद्दों तथा विशेष तौर पर नियोजन की प्रक्रियाओं में जनता की भागीदारीकी बढ़ोतरी।

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