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Kshetrapal's temple of Khadagda - खड़गदा का क्षेत्रपाल का मंदिर

Kshetrapal's temple of Khadagda - खड़गदा का क्षेत्रपाल का मंदिर


ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाला 200 वर्ष पुराना स्थानीय लोकदेवता क्षेत्रपाल जी (खेतपाल जी) का यह मंदिर डूंगरपुर जिले के सागवाड़ा उपखंड क्षेत्र के 'खड़गदा' गाँव में गलियाकोट मार्ग पर स्थित है। यह मंदिर डूंगरपुर जिला मुख्यालय से दूरी 55 किमी. तथा बांसवाड़ा से 80 किमी दूर है। इस मंदिर की लोकप्रियता खेतपाल भैरव व देवी के मंदिर होने के कारण है। यहाँ की भगवान क्षेत्रपाल की प्रतिमा 11वीं-12 वीं शताब्दी के होने का अनुमान है। मंदिर के गर्भगृह में पश्चिमोन्मुखी छह फीट ऊंची तथा ढाई फीट चौड़ी दिव्य आभा युक्त मनोहारी चतुर्भुज प्रतिमा स्थापित है। प्रतिमा के हाथों में त्रिशूल, डमरु, ढाल एवं मुंड़ सुशोभित है। साथ ही स्वामी भक्ति के प्रतीक के रूप ''भैरव वाहन श्वान'' भी स्थापित है। यहां भगवान क्षेत्रपाल की आज्ञा लिए बगैर कोई कार्य प्रारंभ नहीं करने की परम्परा रही है। इस मंदिर के चारों ओर अन्य छोटे मंदिर हैं, जिनमें देवी गणपति, भगवान शिव, देवी लक्ष्मी और भगवान हनुमान स्थापित हैं। 
 

हनुमान जयंती पर लगता है विशाल मेला - 

 
हनुमान जयंती पर यहां दो दिवसीय विशाल मेले का आयोजन होता है जिसे भारी संख्या में लोग भाग लेते हैं। हनुमान जयंती पर आयोजित होने वाले मेले के दौरान भगवान क्षेत्रपाल को रजत रथ में विराजमान करवा कर शोभायात्रा निकाली जाती है तथा खेतपाल जी को नगर भ्रमण कराया जाता है। इस दौरान महिलाएं सिर पर कलश लेकर चलती है तथा भारी जनसमूह जयकारे लगाता हुआ आगे बढ़ता है। मंदिर परिसर में स्थित संकटमोचन हनुमान मंदिर में भी लोग देवदर्शन कर बजरंगबली की प्रतिमा पर विभिन्न प्रकार का वागा व तेल चढ़ा कर आशीर्वाद प्राप्त करते है। इसके बाद गंगाजल कलश यात्रा निकाली जाती है। कलश यात्रा भगवान क्षेत्रपाल के जयकारों के साथ मोरन नदी पर पहुंचती है, जहां वैदिक मंत्रोच्चार के साथ कलशों में मोरन नदी का जल भरकर इस पवित्र जल भगवान को अर्पित किया जाता है।
 

रोजाना चलता है क्षेत्रपाल अन्न क्षेत्र -

 

हनुमान जयंती पर आयोजित होने वाले मेले के साथ ही आम दिनों में भी इस स्थान पर श्रद्धालुओं और पर्यटकों की बड़ी संख्या देखी जा सकती है। मोरन नदी के तट पर प्राकृतिक सौंदर्य से पूर्ण मार्ग पर स्थित यह रमणीय देवस्थान श्रद्धालुओं के साथ प्रकृति प्रेमियों को भी आकर्षित करता है। सड़क की बेहतर सुविधा से संपन्न इस स्थान पर बसों तथा निजी वाहनों से पहुंचा जा सकता है। मंदिर परिसर में रहने के लिए धर्मशाला तथा पिकनिक पार्टी के लिए समस्त प्रकार की व्यवस्थाएं उपलब्ध हैं। यहाँ ''श्री क्षेत्रपाल अन्न क्षेत्र ट्रस्ट'' भी संचालित किया जा रहा है, जिसमें श्रद्धालुओं को दोपहर के भोजन के रूप में खिचड़ी, कढ़ी एवं हलवा प्रसाद स्वरूप  दिया जाता है। यदि कोई व्यक्ति अपने पुण्यजन की स्मृति में अथवा जन्म दिन आदि के अवसर पर अन्नक्षेत्र के माध्यम से प्रसाद देना चाहता है तो अन्न क्षेत्र में वितरित किया जा सकता है।
 

नवसंतान प्राप्त दंपति होली पर क्षेत्रपाल जी चढ़ाते है खिचड़े का भोग -

 
खड़गदा के इस क्षेत्रपाल मंदिर में होली के अवसर पर नवसंतान प्राप्त दंपति वंशवृद्धि होने की ख़ुशी में या अन्य श्रद्धालु मनोवांछित फल प्राप्त होने पर भगवान श्री क्षेत्रपाल को गाजे-बाजे के साथ आकर सामूहिक रूप से खिचड़ा चढ़ाते हैं। खिचड़ा चढ़ाने की इस परंपरा का निर्वहन प्रतिवर्ष किया जाता है। इस आयोजन के तहत होली के दिन सुबह-सुबह प्रथम संतानप्राप्त दंपति तथा उनके परिजन व अन्य ग्रामीण श्रद्धालु गांव के नवरात्रि चौक पर एकत्रित होते है और फिर ढोल व कुण्डी की ताल बजाते हुए एवं महिलाएँ मंगल गीत गाती हुई क्षेत्रपाल मंदिर जाते हैं। इस दौरान प्रथम संतान प्राप्त माताएं चावल तथा मूंग की दाल की सवा किलो देसी घी से बना खिचड़ा के पात्र सिर पर धारण किए चलती हैं। शोभायात्रा के रूप में सभी लोग क्षेत्रपाल मंदिर में पहुंचते हैं तथा एक-एक कर सभी नवसंतान प्राप्त दंपत्तिं क्षेत्रपाल दादा की विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना करते हैं और साथ में लाए गए खिचड़ा को भगवान को अर्पित करते हैं। माताएं अपने शिशुओं को भगवान के सामने रखते हुए इनकी दीर्घायु की कामना से आशीर्वाद ग्रहण करती हैं।

क्या है क्षेत्रपाल देवता की महिमा -


क्षेत्रपाल क्षेत्र के रक्षक व पालक लोक देवता माने जाते हैं। भगवान क्षेत्रपाल को शिव पुत्र माना गया है। मान्यता है कि दानवों के आंतक को समाप्त करने के लिए भगवान शिव ने 64 क्षेत्रपालों को जन्म दिया था। क्षेत्रपाल को भगवान शिव का दस हजारवां हिस्सा माना जाने के कारण उन्हें कच्चुका, मुक्ता, निर्वाणी, सिद्ध, कपाली, बटूक व भैरव के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन काल में राजा राज्य को संकटों से मुक्ति दिलाने के लिए विभिन्न देवों की अर्चना - प्रार्थना करते थे। इसीलिए विभिन्न देवी-देवताओं के साथ लोकदेवता क्षेत्रपाल भी राजवंशों के अनन्य उपास्य देव रहे हैं। 
 
 

Comments

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