Skip to main content

गहलोत सरकार ने आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को दी सौगात, बढ़ाया मानदेय

राज्य सरकार ने आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को दी सौगात, मानदेय किया 7 हजार रुपए


राज्य सरकार ने आगंनबाड़ी कार्यकर्ताओं, मिनी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के मानदेय में बढ़ोतरी कर दी सौगात

जयपुर, 9 मार्च। लोकसभा चुनाव से पहले राज्य सरकार ने आगंनबाड़ी कार्यकर्ताओं, मिनी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के मानदेय में बढ़ोतरी कर उन्हें सौगात दी है।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस संबंध में वित्त विभाग के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इसके तहत अब आंगनबाड़ी कार्यकर्ता का मानदेय 7 हजार रुपए प्रतिमाह, मिनी आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का मानदेय 5300 रुपए प्रतिमाह और आंगनबाड़ी सहायिकाओं का मानदेय 4000 रुपए प्रतिमाह होगा।

मानदेय की बढ़ी हुई दरें एक अक्टूबर, 2018 से लागू होंगी। ध्यातव्य है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, मिनी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं का मानदेय में केन्द्र सरकार 60 और राज्य सरकार 40 फीसदी राशि वहन करते हैं।

राज्य सरकार अपने अंश की हिस्सा राशि के बाद भी आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, मिनी आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को 2400 रुपए, 1750 रुपए और 1700 रुपए अतिरिक्त राशि के रूप में प्रतिमाह दे रही है। अब इस अतिरिक्त राशि में क्रमश: 100, 50 और 50 रुपए प्रतिमाह की वृद्धि की गई है। इस निर्णय सेे राज्य सरकार पर प्रतिवर्ष लगभग 10 करोड़ रुपए का अतिरिक्त वित्तीय भार आएगा।

उम्मीद है आपको ये लेख पसंद आया होगा, कैसा लगा आप जरुर नीचे comment करके बताइएगा। अगर कोई सुझाव देना चाहते हो तो जरुर दीजिये जिससे हम आपके लिए कुछ नया कर सके। हमारे Blog को अभी तक अगर आप Subscribe नहीं किया है तो जरुर Subscribe करें। 
जय हिंद, जय भारत, धन्यवाद।

Comments

Popular posts from this blog

Kaun tha Hashmat Wala Raja Rao Maldev - कौन था हशमत वाला राजा राव मालदेव

राव मालदेव राठौड़ का इतिहास | History of Rao Maldev Rathod (मालदेओ राठौड़ इतिहास)   राव मालदेव का जन्म 5 दिसंबर 1511 को हुआ था । वह अपने पिता राव गांगा को मारकर 5 जून, 1532 को जोधपुर के राज्य सिंहासन पर आसीन हुए थे । इसलिए इसे पितृहंता शासक कहते हैं। जिस समय राव मालदेव ने गद्दी संभाली, उस समय दिल्ली के शासक मुगल बादशाह हुमायूँ थे । राव मालदेव की माँ का नाम रानी पद्मा कुमारी था जो सिरोही के देवड़ा शासक जगमाल की पुत्री थी । जैसलमेर के शासक राव लूणकरण की पुत्री उमादे से राव मालदेव का विवाह हुआ था । रानी उमादे विवाह की प्रथम रात्रि को ही अपने पति से रूठ गई और आजीवन उनसे रूठी रही । इस कारण उमादे इतिहास में ‘ रूठी रानी ‘ के नाम से प्रसिद्ध हो गई । राव मालदेव की मृत्यु होने पर रानी उमादे सती हो गई । मालदेव के राज्याभिषेक के समय जोधपुर और सोजत परगने ही उनके अधीन थे। वीर और महत्वाकांक्षी राव मालदेव ने शासन संभालते ही राज्य प्रसार का प्रसार करने पर ध्यान केंद्रित किया और जल्दी ही उन्होंने सींधल वीरा को परास्त कर भाद्राजूण पर अधिकार कर लिया। साथ ही फलौदी को जैसलमेर के भाटी शास...

How to do scientific farming of fennel - कैसे करें सौंफ की वैज्ञानिक खेती

औषधीय गुणों से भरपूर है सौंफ - प्राचीन काल से ही मसाला उत्पादन में भारत का अद्वितीय स्थान रहा है तथा 'मसालों की भूमि' के नाम से विश्वविख्यात है। इनके उत्पादन में राजस्थान की अग्रणी भूमिका हैं। इस समय देश में 1395560 हैक्टर क्षेत्रफल से 1233478 टन प्रमुख बीजीय मसालों का उत्पादन हो रहा है। प्रमुख बीजीय मसालों में जीरा, धनियां, सौंफ व मेथी को माना गया हैं। इनमें से धनिया व मेथी हमारे देश में ज्यादातर सभी जगह उगाए जाते है। जीरा खासकर पश्चिमी राजस्थान तथा उत्तर पश्चिमी गुजरात में एवं सौंफ मुख्यतः गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, बिहार तथा मध्य प्रदेश के कई इलाकों में उगाई जाती हैं। हमारे देश में वर्ष 2014-15 में सौंफ का कुल क्षेत्रफल 99723 हैक्टर तथा इसका उत्पादन लगभग 142995 टन है, प्रमुख बीजीय मसालों का उत्पादन व क्षेत्रफल इस प्रकार हैं। सौंफ एक अत्यंत उपयोगी पादप है। सौंफ का वैज्ञानिक नाम  Foeniculum vulgare होता है। सौंफ के दाने को साबुत अथवा पीसकर विभिन्न खाद्य पदार्थों जैसे सूप, अचार, मीट, सॉस, चाकलेट इत्यादि में सुगन्धित तथा रूचिकर बनाने में प्रयोग कि...

Vedic Period - Early Vedic Society वैदिक काल- प्रारम्भिक वैदिक समाज

प्रारम्भिक वैदिक समाज Vedic Period - Early Vedic Society प्रारम्भिक वैदिक समाज कबीलाई समाज था तथा वह जातीय एवं पारिवारिक संबंधों पर आधारित था। प्रारम्भिक वैदिक समाज जाति के आधार पर विभाजित नहीं था एवं विभिन्न व्यावसायिक समूह अर्थात् मुखिया, पुरोहित, कारीगर आदि एक ही जन समुदाय के हिस्से थे। प्रारम्भिक वैदिक समाज में कबीले के लिए ‘जन’’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता था और ऋग्वेद में विभिन्न जन का उल्लेख है। विभिन्न कबीलों में पारस्परिक संघर्ष सामान्य थे, जैसे ऋग्वेद में ‘‘दशराज युद्ध’’ का वर्णन हुआ है और इसी युद्ध के वर्णन से हमें कुछ कबीलों के नाम प्राप्त होते हैं जैसे भरत, पुरु, यदु, द्रहयु, अनू और तुरवासू। प्रारम्भिक वैदिक समाज में कबीलों के युद्ध जैसे कि पहले भी कहा गया है पशुओं के अपरहय एवं पशुओं की चोरी को लेकर होते रहते थे। ‘‘राजा’’ या ‘‘गोपति’’- कबीले का मुखिया ‘‘राजा’’ या ‘‘गोपति’’ होता था। वह युद्ध में नेता तथा कबीले का रक्षक था। ‘‘राजा’’ या ‘‘गोपति’’ का पद अन्य व्यावसायिक समूहों की भांति ही पैतृक नहीं था बल्कि उसका जन के सदस्यों में से चुनाव होता था। ‘राजन्य’- योद्धा को ‘राजन्य’ क...