Skip to main content

OBC Commission of Rajasthan - राजस्थान राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग



उच्चतम न्यायालय द्वारा मण्डल आयोग रिपोर्ट के संबंध में इन्द्रा साहनी 16 नवम्बर, 1992 को दिए गए निर्देशों के अनुरुप केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकारों को 4 माह के अन्दर अपने-अपने राज्यों में पिछड़ा वर्ग आयोगों की स्थापना की जानी थी, इसकी अनुपालना में राजस्थान सरकार की अधिसूचना संख्या एफ 11(125) आरएण्डपी /सकवि/ 92-93/14293 दिनांक 11 मार्च, 1993 के द्वारा राजस्थान में सर्वप्रथम राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया।

राजस्थान सरकार द्वारा पूर्व में प्रशासनिक आदेश द्वारा गठित आयोग के स्थान पर दिनांक 21.10.2016 को राजस्थान राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग अध्यादेश, 2016 जारी किया गया। जिसके संदर्भ में दिनांक 24.10.2016 को अधिसूचना क्रमाक एफ.11(150)आरएण्डपी /आरआरबीसी/2015/65566 द्वारा राजस्थान राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया।

इस आयोग को राजस्थान राज्य में पिछड़े वर्गों (अनुसूचित जाति/जनजाति के अतिरिक्त) की सूची में विभिन्न वर्गों को सम्मिलित करने व हटाने हेतु राज्य सरकार को सुझाव देने का कार्य सौंपा गया।

राजस्थान राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के पूर्व अध्यक्ष  -

  • From 19.03.1993   to 18.03.1996   - Justice(Retd.) Indrasen Israni
  • From 19.03.1996 to 17.05.1999    - Justice(Retd.) Indrasen Israni
  • From 21.05.2002 to  15.01.2004    - Justice(Retd.) Ranvir Sahay Verma
  • From 03.03.2008   to 02.03.2011   - Justice(Retd.) P. K. Tiwari
  • rom 07.06.2012   to 06.06.2015     - Justice(Retd.) Indrasen Israni
 
राजस्थान राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के वर्तमान अध्यक्ष व सदस्य -


Name

Designation

Justice J.R.Goyal

Chairman

Shri Sitaram Sharma

Member

Dr.A.S.Bhati

Member

Shri Hari Kumar Godara

Member Secretary


राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल जाति /वर्ग की सूची- 

 



Comments

Popular posts from this blog

Kaun tha Hashmat Wala Raja Rao Maldev - कौन था हशमत वाला राजा राव मालदेव

राव मालदेव राठौड़ का इतिहास | History of Rao Maldev Rathod (मालदेओ राठौड़ इतिहास)   राव मालदेव का जन्म 5 दिसंबर 1511 को हुआ था । वह अपने पिता राव गांगा को मारकर 5 जून, 1532 को जोधपुर के राज्य सिंहासन पर आसीन हुए थे । इसलिए इसे पितृहंता शासक कहते हैं। जिस समय राव मालदेव ने गद्दी संभाली, उस समय दिल्ली के शासक मुगल बादशाह हुमायूँ थे । राव मालदेव की माँ का नाम रानी पद्मा कुमारी था जो सिरोही के देवड़ा शासक जगमाल की पुत्री थी । जैसलमेर के शासक राव लूणकरण की पुत्री उमादे से राव मालदेव का विवाह हुआ था । रानी उमादे विवाह की प्रथम रात्रि को ही अपने पति से रूठ गई और आजीवन उनसे रूठी रही । इस कारण उमादे इतिहास में ‘ रूठी रानी ‘ के नाम से प्रसिद्ध हो गई । राव मालदेव की मृत्यु होने पर रानी उमादे सती हो गई । मालदेव के राज्याभिषेक के समय जोधपुर और सोजत परगने ही उनके अधीन थे। वीर और महत्वाकांक्षी राव मालदेव ने शासन संभालते ही राज्य प्रसार का प्रसार करने पर ध्यान केंद्रित किया और जल्दी ही उन्होंने सींधल वीरा को परास्त कर भाद्राजूण पर अधिकार कर लिया। साथ ही फलौदी को जैसलमेर के भाटी शास...

How to do scientific farming of fennel - कैसे करें सौंफ की वैज्ञानिक खेती

औषधीय गुणों से भरपूर है सौंफ - प्राचीन काल से ही मसाला उत्पादन में भारत का अद्वितीय स्थान रहा है तथा 'मसालों की भूमि' के नाम से विश्वविख्यात है। इनके उत्पादन में राजस्थान की अग्रणी भूमिका हैं। इस समय देश में 1395560 हैक्टर क्षेत्रफल से 1233478 टन प्रमुख बीजीय मसालों का उत्पादन हो रहा है। प्रमुख बीजीय मसालों में जीरा, धनियां, सौंफ व मेथी को माना गया हैं। इनमें से धनिया व मेथी हमारे देश में ज्यादातर सभी जगह उगाए जाते है। जीरा खासकर पश्चिमी राजस्थान तथा उत्तर पश्चिमी गुजरात में एवं सौंफ मुख्यतः गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, बिहार तथा मध्य प्रदेश के कई इलाकों में उगाई जाती हैं। हमारे देश में वर्ष 2014-15 में सौंफ का कुल क्षेत्रफल 99723 हैक्टर तथा इसका उत्पादन लगभग 142995 टन है, प्रमुख बीजीय मसालों का उत्पादन व क्षेत्रफल इस प्रकार हैं। सौंफ एक अत्यंत उपयोगी पादप है। सौंफ का वैज्ञानिक नाम  Foeniculum vulgare होता है। सौंफ के दाने को साबुत अथवा पीसकर विभिन्न खाद्य पदार्थों जैसे सूप, अचार, मीट, सॉस, चाकलेट इत्यादि में सुगन्धित तथा रूचिकर बनाने में प्रयोग कि...

Vedic Period - Early Vedic Society वैदिक काल- प्रारम्भिक वैदिक समाज

प्रारम्भिक वैदिक समाज Vedic Period - Early Vedic Society प्रारम्भिक वैदिक समाज कबीलाई समाज था तथा वह जातीय एवं पारिवारिक संबंधों पर आधारित था। प्रारम्भिक वैदिक समाज जाति के आधार पर विभाजित नहीं था एवं विभिन्न व्यावसायिक समूह अर्थात् मुखिया, पुरोहित, कारीगर आदि एक ही जन समुदाय के हिस्से थे। प्रारम्भिक वैदिक समाज में कबीले के लिए ‘जन’’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता था और ऋग्वेद में विभिन्न जन का उल्लेख है। विभिन्न कबीलों में पारस्परिक संघर्ष सामान्य थे, जैसे ऋग्वेद में ‘‘दशराज युद्ध’’ का वर्णन हुआ है और इसी युद्ध के वर्णन से हमें कुछ कबीलों के नाम प्राप्त होते हैं जैसे भरत, पुरु, यदु, द्रहयु, अनू और तुरवासू। प्रारम्भिक वैदिक समाज में कबीलों के युद्ध जैसे कि पहले भी कहा गया है पशुओं के अपरहय एवं पशुओं की चोरी को लेकर होते रहते थे। ‘‘राजा’’ या ‘‘गोपति’’- कबीले का मुखिया ‘‘राजा’’ या ‘‘गोपति’’ होता था। वह युद्ध में नेता तथा कबीले का रक्षक था। ‘‘राजा’’ या ‘‘गोपति’’ का पद अन्य व्यावसायिक समूहों की भांति ही पैतृक नहीं था बल्कि उसका जन के सदस्यों में से चुनाव होता था। ‘राजन्य’- योद्धा को ‘राजन्य’ क...