Skip to main content

नाथद्वारा का अद्भुत दीपोत्सव, गोवर्धन पूजा और अन्नकूट



पुष्टिमार्गीय वल्लभ संप्रदाय के प्रमुख तीर्थ स्थल नाथद्वारा में दीपावली का दिन सर्वाधिक आनंद का दिन होता है। भक्त मानते हैं कि प्रभु श्रीनाथजी प्रातः जल्दी उठकर सुगन्धित पदार्थों से अभ्यंग कर, श्रृंगार धारण कर खिड़क (गौशाला) में पधारते हैं, गायों का श्रृंगार करते हैं तथा उनको खूब खेलाते हैं।
श्रीजी का दीपावली का सेवाक्रम -
दीपावली का महोत्सव होने के कारण श्रीनाथजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की वंदनमाल बाँधी जाती हैं। मंदिर में प्रातः 4.00 बजे शंखनाद होता है तथा प्रातः लगभग 4.45 बजे मंगला के दर्शन खोले जाते हैं। मंगला के दर्शन के उपरांत प्रभु को चन्दन, आंवला एवं फुलेल (सुगन्धित तेल) से अभ्यंग (स्नान) कराया जाता है। श्रीनाथजी को लाल सलीदार ज़री की सूथन, फूलक शाही श्वेत ज़री की चोली, चाकदार वागा एवं श्रीमस्तक पर ज़री की कूल्हे के ऊपर पाँच मोरपंख की चन्द्रिका की जोड़ धारण कराई जाती है। भगवान को आज वनमाला का (चरणारविन्द तक) तीन जोड़ी (माणक, हीरा-माणक व पन्ना) का भारी श्रृंगार किया जाता है जिसमें हीरे, मोती, माणक, पन्ना तथा जड़ाव सोने के सर्व आभूषण धारण कराए जाते हैं। मस्तक पर फूलकशाही श्वेत ज़री की जडाव की, कूल्हे के ऊपर सिरपैंच तथा पांच मोरपंख की चन्द्रिका की जोड़ एवं बाईं ओर शीशफूल सुशोभित कराएँ जाते हैं। श्रीकर्ण में मकराकृति कुंडल, बाईं ओर माणक की चोटी (शिखा), पीठिका के ऊपर प्राचीन हीरे का जड़ाव का चौखटा, श्रीकंठ में बघनखा, गुलाबी एवं श्वेत पुष्पों की दो सुन्दर थागवाली माला से श्रृंगार किया जाता है। श्रीहस्त में कमलछड़ी, हीरा के वेणुजी (बांसुरी) एवं दो वेत्रजी पधराये जाते हैं। आज श्रीनाथजी में जड़ाव की, श्याम आधारवस्त्र पर कूंडों में वृक्षावली एवं पुष्प लताओं के मोती के सुन्दर ज़रदोज़ी के काम वाली पिछवाई सज्जित की जाती है। जडाऊ गद्दी, तकिया एवं चरणचौकी पर लाल रंग की मखमल की बिछावट की जाती है। यहाँ पर अन्नकूट के महोत्सव की तैयारी बहुत पहले से ही करनी प्रारंभ कर दी जाती है। इसी क्रम में कार्तिक कृष्ण दशमी से कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा (अन्नकूट उत्सव) तक सात दिवस ग्वाल भोग के दर्शन के समय में श्रीनाथजी को अन्नकूट के लिए सिद्ध की जा रही विशेष सामग्रियों का प्रसाद धरा जाता हैं। इस श्रृंखला में दीपावली के दिन विशेष रूप से ग्वाल भोग में दीवला व दूधघर में बनाई गई केसरयुक्त बासोंदी की हांडी परोसी जाती है। ये सामग्रियां दीपावली के दूसरे दिन होने वाले अन्नकूट उत्सव पर भी चढ़ाई जाती है। राजभोग में दाख (किशमिश) का रायता और सखड़ी में केसरयुक्त पेठा, मीठी सेव आदि का प्रसाद निवेदित किया जाता है। 
राजभोग आरती के पश्चात मंदिर के तिलकायत महाराज अन्नकूट महोत्सव के लिए चावल पधराने जाते हैं। उनके साथ चिरंजीवी श्री विशालबावा, श्रीजी के मुखियाजी व अन्य सेवक श्रीजी के ख़ासा भण्डार में जा कर टोकरियों में भर कर चावल को अन्नकूट की रसोई में जाकर पधराते हैं। तदुपरांत नगरवासी व अन्य वैष्णव भक्त भी अपने चावल अन्नकूट की रसोई में अर्पित करते हैं। सायं से अन्नकूट की चावल की सेवा प्रारंभ होती है। आज श्रीजी में राजभोग दर्शन पश्चात कोई दर्शन बाहर नहीं खोले जाते। भोग समय फीका के स्थान पर बीज-चालनी (घी में तले नमकयुक्त सूखे मेवे व बीज) अरोगाये जाते हैं। श्री नवनीतप्रियाजी में सायं के समय कानजगाई के व शयन समय रतनचौक में हटड़ी के दर्शन होते हैं।
कानजगाई -
कानजगाई संध्या के समय होती है। इस उत्सव में गौ-माता की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। कानजगाई के अवसर पर प्रभु को विशेष रूप से दूधघर में सिद्ध केशर मिश्रित दूध की मटकी (चपटिया) का प्रसाद अर्पित किया जाता है एवं शिरारहित पान की बीड़ा धरा जाता है। संध्या के समय गौशाला से मोरपंख, गले में घंटियों और पैरों में घुंघरूओं से सुशोभित व श्रृंगारित इतनी संख्या में गाएं लाई जाती है कि मंदिर का गोवर्धन पूजा का पूरा चौक भर जाए। श्रृंगारित गायों की पीठ पर मेहंदी कुंकुम के छापे व सुन्दर आकृतियाँ बनी होती है। ग्वाल-बाल भी सुन्दर वस्त्रों से सुसज्जजित होकर गायों को रिझाते एवं क्रीडा करवाते हैं। गाएं उनके पीछे दौड़ती हैं जिससे भक्त नगरवासी और वैष्णव भक्तजन आनन्द लेते हैं। गौधूली वेला में शयन समय कानजगाई होती है। नवनीतप्रियाजी के मंदिर से लेकर सूरजपोल की सभी सीढ़ियों तक विभिन्न रंगों की चलनियों से रंगोली की साजसज्जा की जाती है। कीर्तन की मधुर स्वरलहरियों के मध्य नवनीतप्रियाजी को सोने की चकडोल में गोवर्धन पूजा के चौक में सूरजपोल की सीढ़ियों पर एक चौकी पर बिराजमान किया जाता है। श्रीनाथजी व श्री नवनीतप्रियाजी के कीर्तनिया कीर्तन करते हैं व झालर, घंटा बजाये जाते हैं। पूज्य श्री तिलकायत महाराज गायों का पूजन कर, तिलक-अक्षत कर लड्डू का प्रसाद खिलाते हैं। गौशाला के बड़े ग्वाल को भी प्रसाद दिया जाता है। तत्पश्चात पूज्य श्री तिलकायत नंदवंश की मुख्य गाय को आमंत्रण देते हुए कान में कहते हैं – “कल प्रातः गोवर्धन पूजन के समय गोवर्धन को गूंधने को जल्दी पधारना”, गायों के कान में आमंत्रण देने की इस रीति को कानजगाई कहा जाता है। प्रभु स्वयं गायों को आमंत्रण देते हैं ऐसा भाव है।

इसके अलावा कानजगाई का एक और विशिष्ट भाव है कि गाय के कान में इंद्र का वास होता है और प्रभु कानजगाई के द्वारा उनको कहते हैं कि – “हम श्री गिरिराजजी को कल अन्नकूट अरोगायेंगे, तुम जो चाहे कर लेना”। सभी पुष्टिमार्गीय मंदिरों में अन्नकूट के एक दिन पूर्व गायों की कानजगाई की जाती है।

 

दीपावली के हटड़ी के दर्शन-


आज श्रीनाथजी के शयन के दर्शन दर्शनार्थियों के लिए नहीं खुलते हैं। शयन के दर्शन श्री नवनीतप्रिया जी के ही होते हैं। इस समय श्री नवनीतप्रियाजी रतनचौक में हटड़ी में विराजित हो दर्शन देते हैं। हटड़ी में विराजने का भाव कुछ इस प्रकार है कि नंदनंदन प्रभु बालक रूप में अपने पिता श्री नंदरायजी के संग हटड़ी (हाट अथवा वस्तु विक्रय की दुकान) में बिराजते हैं और तेजाना, विविध सूखे मेवा व मिठाई के खिलौना आदि विक्रय कर उससे एकत्र धनराशि से अगले दिन श्री गिरिराजजी को अन्नकूट का भोग अरोगाते हैं। हटड़ी के दर्शन रात्रि लगभग 9.00 बजे तक खुले रहते हैं और दर्शन उपरांत श्री नवनीतप्रियाजी श्रीनाथजी के निजमंदिर में पधारकर उनके संग विराजते हैं। यहाँ श्री गुसांईजी, उनके सभी सात लालजी और तत्कालीन प्रचारक महाराज काका वल्लभजी के भाव से 9 बार आरती होती है। श्री गुसांईजी व श्री गिरधरजी की आरती स्वयं श्री तिलकायत महाराज करते हैं। अन्य गृहों के बालक यदि उपस्थित हों तो वे श्री तिलकायत से आज्ञा लेकर सम्बंधित गृह की आरती करते हैं और अन्य की उपस्थिति न होने पर स्वयं तिलकायत महाराज आरती करते हैं। काका वल्लभजी की आरती श्रीजी के वर्तमान प्रचारक महाराज गौस्वामी चिरंजीवी श्री विशालबावा करते हैं। आज श्रीजी में शयन पश्चात शयन के व मान के पद नहीं गाए जाते हैं। यह भाव है कि दीपावली की रात्रि शयन उपरांत श्रीनाथजी व श्री नवनीतप्रियाजी प्रभु लीलात्मक भाव से गोपसखाओं, श्री स्वामिनीजी, सखीजनों सहित आमने-सामने बैठकर चौपड़ खेलते हैं। अखण्ड दीप जलाएं जाते हैं, मंदिर में चौपड़ खेलने की अति आकर्षक, सुन्दर भावात्मक साज-सज्जा की जाती है। दीप इस प्रकार जलाए जाते हैं कि प्रभु के श्रीमुख पर उनकी चकाचौंध नहीं पड़े, इस भावात्मक साज-सज्जा को मंगला के पूर्व हटा लिया जाता है। इसी भाव से दिवाली की रात्रि प्रभु के श्रृंगार हटाए नहीं किए जाते हैं।

गोवर्धन पूजा एवं अन्नकूट महोत्सव-


कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को प्रभु के गोवर्धन पूजा के उत्सव के दिन लगभग 6 बजे से मंगला दर्शन खुलते हैं, जो लगभग 2 घंटे खुले रहते हैं। प्रभु के वस्त्र एवं श्रृंगार विगत दिवस की रात्रि अर्थात दीपावली की रात्रि  जैसा ही रखा जाता है, अतः आज मंगला के दर्शन उन्हीं वस्त्र, श्रृंगार में होते हैं जो दीपावली की रात्रि के दर्शन का होता है। मंगला दर्शन उपरांत डोल-तिबारी में अन्नकूट भोग सजाए जाने का क्रम प्रारंभ हो जाता है, अतः अन्य सभी समय के दर्शन दर्शनार्थियों के लिए नहीं खोले जाते हैं एवं दिन भर का पूरा सेवाक्रम भीतर ही होता हैं। रात्रि लगभग 8.30 बजे अन्नकूट के दर्शन खुलते हैं जो कि रात्रि लगभग 1 बजे तक होते हैं। आज भी महोत्सव होने के कारण श्रीनाथजी मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी (देहलीज) को हल्दी से लीपी जाती हैं एवं आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बाँधी जाती हैं। जैसाकि पूर्व में उल्लेख किया गया है कि कार्तिक कृष्ण दशमी से आज कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा तक सात दिवस श्रीजी को अन्नकूट के लिए सिद्ध की जा रही विशेष सामग्रियां गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में अर्पित की जाती हैं। ये सामग्रियां आज अन्नकूट उत्सव पर भी अर्पित की जाती है। इस श्रृंखला में ग्वाल भोग में आज श्रीनाथजी को विशेष रूप से उड़द दाल की बूंदी के लड्डू व दूधघर में सिद्ध की गई केसरयुक्त बासोंदी की हांडी तथा राजभोग में अनसखड़ी में दाख (किशमिश) का रायता  अर्पित किया जाता है। अन्नकूट के दिन श्रीनाथजी को सभी साज दीपावली के दिवस का ही धराया जाता है तथा दीपावली के दिवस धरे गये श्वेत ज़री के वस्त्र ही पहनाएं जाते हैं। श्रृंगार वृद्धि में ऊर्ध्व भुजा की ओर लाल रंग का ज़री का बिना तुईलैस किनारी बिना का पीताम्बर, जिनके दो अन्य छोर चौखटे के ऊपर रहते हैं, सज्जित किया जाता हैं। ऐसा पीताम्बर वर्ष में दो बार (आज के दिन व जन्माष्टमी, नन्दोत्सव के दिन) धराया जाता है। जन्माष्टमी, नन्दोत्सव के दिन यह केवल चौखटे पर धराया जाता है परन्तु आज यह श्रीहस्त में भी धराया जाता है। श्रीमस्तक के ऊपर लाल रंग की ज़री की तुई की किनारी वाला गौकर्ण पहनाया जाता है। कूल्हे के ऊपर सिरपैंच बड़ा कर दिया जाता है और इसके बदले जड़ाव पान होता है। कमलछड़ी एवं पुष्प मालाजी दीपावली के दिवस वाले ही होते हैं अतः इन्हें बदला जाता हैं। श्रीहस्त में जड़ाव सोने के वेणुजी और दो वेत्रजी सुशोभित किये जाते हैं।

गोवर्धन पूजा - 


राजभोग पश्चात गोवर्धन पूजा की जाती है। दोपहर में गोवर्धन पूजा के चौक में गोबर से गोवर्धन का निर्माण किया जाता है जिसे सिन्दूर से रंगी लकड़ी के जाली से ढंका गया होता है। दोपहर में ही श्रीनाथजी के ग्वालबाल श्रीजी मंदिर की सात परिक्रमा कर गीत गाते हुए श्री विट्ठलनाथजी के घर (मंदिर) उन्हें गोवर्धनपूजा में आने का आमंत्रण देते हैं। तदुपरांत द्वितीय गृहाधीश श्री कल्याणरायजी महाराज अन्य गुसाई बालकों की अगुआई में श्री ठाकुरजी विट्ठलनाथजी को सुखपाल में विराजित कर वैष्णवों के संग कीर्तन की स्वर लहरियों के मध्य श्रीनाथजी के मंदिर में अन्नकूट अरोगाने पधराते हैं। श्री विट्ठलनाथजी को श्रीनाथजी सम्मुख विराजित कर श्री तिलकायत महाराज एवं उपस्थित अन्य गौस्वामी बालकों और श्रीजी के सभी मुख्य सेवकों के साथ श्री नवनीतप्रियाजी को पधारने जाते हैं। वहां श्री नवनीतप्रियाजी के मुखियाजी, तिलकायतजी को टोरा बाँधते हैं। खासा-भण्डार के सेवक हल्दी, गुलाल एवं अबीर से रंगोली छांटते चलते हैं जिस पर होकर पूज्य तिलकायत श्री नवनीतप्रियाजी को खुली स्वर्ण की चकडोल में विराजित कर गोवर्धन-पूजा के चौक में सूरजपोल के पावन सोपानों पर विराजित करते हैं। इस दौरान और गोवर्धन पूजन के दौरान कीर्तनिया चले रे गोपाल...गोवर्धन पूजन कीर्तन गाते रहते हैं। तदुपरांत गौ-माताएँ कानजगाई के दिवस की भांति ही धूमधाम से क्रीड़ा करती हुई मंदिर मार्ग को अपनी रुनझुन से निनादित करती हुई मंदिर के गोवर्धन-पूजा के चौक में आती हैं। प्रभु श्री नवनीतप्रियाजी को विशेष रूप से दूधघर में सिद्ध केशर मिश्रित दूध की दो चपटिया (मटकी) का भोग लगाया जाता है और गोवर्धन-पूजा शुरु हो जाती है। मंदिर के  तिलकायत द्वारा मानसी-गंगा के जल, दूध, चंदन, कूमकुम आदि विविध सामग्रियों से लगभग पौन घंटे तक गोवर्धन-पूजा की जाती है। इसके बाद गोवर्धनजी को विशाल टोकरों में रखे महाप्रसाद का भोग अर्पित किया जाता है। भोग के पश्चात झालर-घण्टों और शंख की ध्वनि के मध्य आरती की जाती है। इसके बाद दूधघर के ग्वाल, गौशाला के बड़े ग्वाल तथा सातों घरों के ग्वालों, पानघरिया, फूल-घरिया, ख़ासा-भंडारी, परछना मुखिया आदि मंदिर के विविध विभागों के प्रमुखों को तिलकायत टौनाबाँध कर मठड़ी, पान का बीड़ा व सेव लड्डू का नेग देते हैं। गोवर्धन-पूजा के पूर्ण होने पर श्रीनवनीतप्रियाजी बगीचे के रास्ते से होते हुए श्रीजी के सम्मुख अन्नकूट ग्रहण करने पधारते हैं तथा उधर गोबर के गोवर्धन पर गौएँ चढ़ाई जाती हैं। गौधूली वेला में गाएं अपने अस्थाई विश्रामस्थल पर ले जाई जाती हैं, जहाँ पर श्रीजी की ओर से गायों को गेहूं दलिया व गुड की थूली खिलाई जाती है। इसके तुरन्त बाद सभी गाएं नगर के प्राचीन मार्ग में क्रीडा करते हुए नाथूवास स्थित गौशाला में चली जाती हैं। नगरवासी व वैष्णव गोबर के गोवर्धन की परिक्रमा करते हैं।



अन्नकूट -

श्रीनाथजी के मंदिर की डोलतिबारी के पिछले दो खण्डों में घास का मिढ़ा(चावल रखने का घास से निर्मित कुआं) बनाया जाता है जिसमें डेढ़ सौ मण से अधिक चावल का ढेर लगा कर अन्नकूट (अर्थात अन्न का शिखर) बनाया जाता है। उसके ऊपर चारों दिशाओं में घी में सेके हुए कसार के चार बड़े गुंजे और मध्य में एक गुंजा आधा भीतर व आधा बाहर रखा जाता है। चारों दिशाओं के गुंजों पर क्रमशः शंख, चक्र, गदा व पद्म उकेरे जाते हैं। शिखर पर तुलसी की मोटी माला धराई जाती है। इसके चारों ओर सखड़ी की सामग्रियां रखी जाती हैं। इन सामग्रियों से पूरी डोलतिबारी और पौन रतनचौक भर जाता है। इसके अतिरिक्त दूधघर तथा बालभोग की सामग्री प्रभु के निज मंदिर, मणिकोठा एवं छठीकोठा में चार-चार टोकरे में एक के ऊपर एक करके रखी जाती है। प्रभु समक्ष भोग धरकर अन्नकूट के सेवक अन्नकूट के मुखिया की अगुआई में श्रीजी मंदिर की बड़ी परिक्रमा करते हैं। लगभग डेढ़ घंटे के पश्चात भोग सरने (हटाने) प्रारंभ हो जाते हैं। अनसखड़ी की सभी सामग्रियां हटा ली जाती है जबकि सखड़ी की केवल शाक, दाल आदि की मटकियाँ रहने दी जाती हैं। लगभग 8.30 बजे दर्शन खुल जाते हैं। इन दर्शनों में थोड़ी-थोड़ी देर में विभिन्न भावों से नौ बार आरती होती है। चौथी आरती के बाद रात्रि लगभग 11.30 बजे आदिवासी भीलों को चावल लूटने दिया जाता है।







Comments

Popular posts from this blog

Kaun tha Hashmat Wala Raja Rao Maldev - कौन था हशमत वाला राजा राव मालदेव

राव मालदेव राठौड़ का इतिहास | History of Rao Maldev Rathod (मालदेओ राठौड़ इतिहास)   राव मालदेव का जन्म 5 दिसंबर 1511 को हुआ था । वह अपने पिता राव गांगा को मारकर 5 जून, 1532 को जोधपुर के राज्य सिंहासन पर आसीन हुए थे । इसलिए इसे पितृहंता शासक कहते हैं। जिस समय राव मालदेव ने गद्दी संभाली, उस समय दिल्ली के शासक मुगल बादशाह हुमायूँ थे । राव मालदेव की माँ का नाम रानी पद्मा कुमारी था जो सिरोही के देवड़ा शासक जगमाल की पुत्री थी । जैसलमेर के शासक राव लूणकरण की पुत्री उमादे से राव मालदेव का विवाह हुआ था । रानी उमादे विवाह की प्रथम रात्रि को ही अपने पति से रूठ गई और आजीवन उनसे रूठी रही । इस कारण उमादे इतिहास में ‘ रूठी रानी ‘ के नाम से प्रसिद्ध हो गई । राव मालदेव की मृत्यु होने पर रानी उमादे सती हो गई । मालदेव के राज्याभिषेक के समय जोधपुर और सोजत परगने ही उनके अधीन थे। वीर और महत्वाकांक्षी राव मालदेव ने शासन संभालते ही राज्य प्रसार का प्रसार करने पर ध्यान केंद्रित किया और जल्दी ही उन्होंने सींधल वीरा को परास्त कर भाद्राजूण पर अधिकार कर लिया। साथ ही फलौदी को जैसलमेर के भाटी शास...

How to do scientific farming of fennel - कैसे करें सौंफ की वैज्ञानिक खेती

औषधीय गुणों से भरपूर है सौंफ - प्राचीन काल से ही मसाला उत्पादन में भारत का अद्वितीय स्थान रहा है तथा 'मसालों की भूमि' के नाम से विश्वविख्यात है। इनके उत्पादन में राजस्थान की अग्रणी भूमिका हैं। इस समय देश में 1395560 हैक्टर क्षेत्रफल से 1233478 टन प्रमुख बीजीय मसालों का उत्पादन हो रहा है। प्रमुख बीजीय मसालों में जीरा, धनियां, सौंफ व मेथी को माना गया हैं। इनमें से धनिया व मेथी हमारे देश में ज्यादातर सभी जगह उगाए जाते है। जीरा खासकर पश्चिमी राजस्थान तथा उत्तर पश्चिमी गुजरात में एवं सौंफ मुख्यतः गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, बिहार तथा मध्य प्रदेश के कई इलाकों में उगाई जाती हैं। हमारे देश में वर्ष 2014-15 में सौंफ का कुल क्षेत्रफल 99723 हैक्टर तथा इसका उत्पादन लगभग 142995 टन है, प्रमुख बीजीय मसालों का उत्पादन व क्षेत्रफल इस प्रकार हैं। सौंफ एक अत्यंत उपयोगी पादप है। सौंफ का वैज्ञानिक नाम  Foeniculum vulgare होता है। सौंफ के दाने को साबुत अथवा पीसकर विभिन्न खाद्य पदार्थों जैसे सूप, अचार, मीट, सॉस, चाकलेट इत्यादि में सुगन्धित तथा रूचिकर बनाने में प्रयोग कि...

Vedic Period - Early Vedic Society वैदिक काल- प्रारम्भिक वैदिक समाज

प्रारम्भिक वैदिक समाज Vedic Period - Early Vedic Society प्रारम्भिक वैदिक समाज कबीलाई समाज था तथा वह जातीय एवं पारिवारिक संबंधों पर आधारित था। प्रारम्भिक वैदिक समाज जाति के आधार पर विभाजित नहीं था एवं विभिन्न व्यावसायिक समूह अर्थात् मुखिया, पुरोहित, कारीगर आदि एक ही जन समुदाय के हिस्से थे। प्रारम्भिक वैदिक समाज में कबीले के लिए ‘जन’’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता था और ऋग्वेद में विभिन्न जन का उल्लेख है। विभिन्न कबीलों में पारस्परिक संघर्ष सामान्य थे, जैसे ऋग्वेद में ‘‘दशराज युद्ध’’ का वर्णन हुआ है और इसी युद्ध के वर्णन से हमें कुछ कबीलों के नाम प्राप्त होते हैं जैसे भरत, पुरु, यदु, द्रहयु, अनू और तुरवासू। प्रारम्भिक वैदिक समाज में कबीलों के युद्ध जैसे कि पहले भी कहा गया है पशुओं के अपरहय एवं पशुओं की चोरी को लेकर होते रहते थे। ‘‘राजा’’ या ‘‘गोपति’’- कबीले का मुखिया ‘‘राजा’’ या ‘‘गोपति’’ होता था। वह युद्ध में नेता तथा कबीले का रक्षक था। ‘‘राजा’’ या ‘‘गोपति’’ का पद अन्य व्यावसायिक समूहों की भांति ही पैतृक नहीं था बल्कि उसका जन के सदस्यों में से चुनाव होता था। ‘राजन्य’- योद्धा को ‘राजन्य’ क...