Skip to main content

स्वतन्त्रता पूर्व राजस्थान का शैक्षिक परिदृश्य- आधुनिक शिक्षा


आधुनिक शिक्षा से तात्पर्य:- 

 - ब्रिटिश सर्वोच्चता काल 1818 - 15 अगस्त 1947 में संस्थाओं के पारस्परिक स्वरूप में परिवर्तन आया, इस क्रम में देशी शिक्षा भी आधुनिक शिक्षा का स्वरूप ग्रहण करने लगी।

- आधुनिक शिक्षा से तात्पर्य हम उस शिक्षा पद्धति से लेते हैं तो तर्क पर आधारित वैज्ञानिक दृष्टिकोण
विकसित करें, जिसमें एक निश्चित कक्षाक्रम, परीक्षा प्रणाली, निश्चित पाठ्यक्रम, योग्यता के आधार
पर नियुक्त शिक्षक आदि व एक निश्चित प्रशासनिक व्यवस्था लिये हो। सर्वोच्चता काल में विकसित
व्यवस्था को केवल अंग्रेजी या केवल पाश्चात्य शिक्षा कहना उपयुक्त नहीं है, क्योंकि इसमें अंग्रेजी,
पाश्चात्य और भारतीय तत्व मौजूद थे इसे आधुनिक शिक्षा कहना ही उपयुक्त होगा।  

आधुनिक शिक्षा की आवश्यकता:- 

     -  विभिन्न कारणों से औपनिवेशिक साम्राज्य के लोगों को शिक्षा द्वारा सभ्य बनाना ईस्ट इण्डिया कम्पनी का एक लक्ष्य था।

- 1824 में कम्पनी ने कोलकाता में जनरल कमेटी ऑफ़ पब्लिक इंस्ट्रकशनन को राजपूताना में चार स्कूल खोलने के निर्देश दिये।

- राजपूताना को सभ्य बनाने की नीति के अन्तर्गत रियासतों के शासकों को पत्र लिखकर यह निर्देश दिये कि सामाजिक और आर्थिक सुधार केवल सरकारी तन्त्र से सम्भव नहीं है बल्कि शिक्षा द्वारा जन-चेतना के माध्यम से ही सम्भव है लेकिन विभिन्न अभिलेखों के अध्ययन से कम्पनी का अप्रत्यक्ष लक्ष्य भी उभरता है जिसके अनुसार-

1. एक तो उन्हें व्यावहारिक प्रशासनिक कठिनाइयाँ आ रही थीं उन्हें शासकों से पत्र व्यवहार, वार्तालाप, गुप्त मंत्रणा में कठिनाई आती थी।

2. दूसरा प्रशासनिक परिवर्तन के कारण कार्यालयों में ऐसे कर्मचारी चाहिये थे जो कि उनकी भाषा, रीति-नीति को समझ कर क्रियान्वित करने में सहायक हो।

3. तीसरा कारण यह भी था कि राजपूताना एक प्रमुख व्यापारिक केन्द्र था एवं सुरक्षा की दृष्टि से एक सम्पर्क भाषा की आवश्यकता थी। जिससे औपनिवेशिक हित पूरे हो सकें।

4. चौथा मनोवैज्ञानिक कारण भी था जिसके अनुसार विजेता के सिद्धान्तों पर आधारित शिक्षा का प्रचलन, सांस्कृतिक सुगमता का सरल मार्ग होता है।

5. पाँचवा कारण स्थानीय नागरिकों को नई व्यवस्था से उत्पन्न स्थितियों का लाभ उठाना था। अब नियुक्तियां वंशानुगत को स्थान पर योग्यता के आधार पर होने लगी। 

                 अतः आधुनिक शिक्षा के प्रति स्वाभाविक आकर्षण बढ़ने लगा।

आधुनिक शिक्षा-

- आधुनिक शिक्षा का विकास मूलतः तीन संस्थाओं के माध्यम से हुआ

        1. ब्रिटिश सर्वोच्चता

        2. मिशनरी

        3. निजी एवं सार्वजनिक संस्थाऐं


- आधुनिक शिक्षा का सर्वोच्च काल दो अवधियों में विभक्त रहा-

      1. पहला 1818-1857 तक ईस्ट इण्डिया कम्पनी का काल और

      2. 1858-15 अगस्त 1947 तक ब्रिटिश ताज का शासन काल

-   
-दोनों ही कालों में प्रान्तों पर इनका सीधा प्रशासन था लेकिन देशी रियासतों में वे परामर्शदाता थे, वस्तुतः राजाओं की स्थिति अधीनस्थ सहयोग की थी अतः ब्रिटिश सरकार के नियमों की क्रियान्विति शासकों के माध्यम से होती थी।

- अभिलेखागार दस्तावेजों में राजस्थान की रियासतों के लिये राजपूताना और अजमेर मेरवाड़ा के लिये 'केन्द्र शासित क्षेत्र' उल्लेखित किया गया है।

- 1932 से पूर्व तक कुछ रियासतें मध्य भारत रेजीडेन्ट के अधीन थी, 1932 में सभी रियासतें अजमेर मेरवाड़ा के अधीन कर दी गई, अब अजमेर में सुपरिंटेडेन्ट के स्थान पर 'एजेन्ट टू द गर्वनर जनरल' (ए.जी.जी.) नियुक्त किया गया और उसके अधीन सभी रियासतों में रेजीडेन्ट की नियुक्ति हुई जो कि शासकों को परामर्श देते थे।

- सर्वोच्चता काल में विकसित शिक्षा प्रणाली उपरोक्त प्रशासनिक तन्त्र से प्रभावित हुई।

- नई शिक्षा में जो कक्षाक्रम व्यवस्था बनी वह थी-

1.     स्कूल शिक्षा      और     2. कॉलेज शिक्षा।

  
स्कूल शिक्षा-
-   
स्कूल शिक्षा तीन सोपानों में विभक्त थी।

1. प्राथमिक              2. मिडिल             और         3. हाई स्कूल 
 
- प्राथमिक स्कूल ‘वर्नाकुलर’ स्कूल थे। (VERNACULAR:- The native or indigenous language.)

- ग्रामीण और तहसील स्तर पर वर्नाकुलर मिडिल स्कूलों का उल्लेख किया गया है।

- दूसरे स्तर पर ‘एंग्लो वर्नाकुलर’ स्कूल थे। यह भी दो भागों में विभक्त थे एक मिडिल स्कूल एवं दूसरा हाईस्कूल था। (ANGLO-VERNACULAR SCHOOLS: The schools using both English and a local vernacular especially of schools in India, Burma, and Ceylon during the period of British rule)

- प्राइमरी में 1 से 5 तक, मिडिल में 6 से 8 वीं तक और हाई स्कूल में 9 वीं और 10 वीं कक्षा तक पढ़ाया जाता था।

कॉलेज शिक्षा-
 
-    आधुनिक शिक्षा का दूसरा भाग कॉलेज शिक्षा का था जिसमें निम्नांकित पाठ्यक्रम एवं परीक्षा व्यवस्था थी-

1. इंटरमीडिएट- 11 वीं एवं 12 वीं कक्षायें

2. स्नातक (बी.ए)- 13 वीं एवं 14 वीं कक्षायें

3. स्नातकोत्तर (एम.ए.)- 15 वीं एवं 16 वीं कक्षायें
-   
- इस प्रकार कक्षाक्रम व्यवस्था 10+2+2+2 की थी।

- इसके अतिरिक्त व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा भी एक व्यवस्थित स्वरूप में विकसित होने लगी।

राजपूताना में आधुनिक शिक्षा का प्रारम्भ:-

-   आधुनिक शिक्षा की ओर प्रारम्भिक कार्य केन्द्रशासित प्रदेश “अजमेर मेरवाड़ा क्षेत्र” से प्रारम्भ हुआ।

- 1819 में रेजीडेन्ट आक्टरलोनी के निर्देश पर जेवन कैरी ने पहले अजमेर में और बाद में पुष्कर, भिनाय और केकड़ी में अंग्रेजी भाषा के स्कूल खोले, लेकिन 1931 में जनता के विरोध के कारण ये स्कूल बन्द करने पड़े।

- 1835 ई. में कम्पनी ने अंग्रेजी को राजकीय भाषा के रूप में मान्यता दी, परिणामस्वरूप अंग्रेजी ज्ञान की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए 1836 में अजमेर में पहला सरकारी स्कूल खोला गया। यह स्कूल 1868 में इन्टरमीडिएट और 1869 में स्नातक कॉलेज बना।

- रियासतों की दृष्टि से सर्वप्रथम अलवर महाराज बन्ने सिंह की प्रेरणा से प. रूपनारायण ने 1842 ई. में और 1842 ई. में ही कुछ समय बाद भरतपुर के महाराज बलवन्त सिंह ने स्कूल खोले। 1844 में सर्वप्रथम इसी स्कूल ने आधुनिक परीक्षा प्रणाली को अपनाया। 1847 में यह इंटरमीडिएट, 1888 में स्नातक और 1900 में स्नातकोत्तर कॉलेज के रूप में क्रमोन्नत हुआ।

- 1844 में जयपुर में, 1867 में जोधपुर में दरबार स्कूल और 1883 में टोंक के नवाब ने सरकारी स्कूल प्रारम्भ किए।

- 19वीं सदी के अन्त तक जैसलमेर को छोड़कर राजपूताना की सभी रियासतों में राजकीय शिक्षण संस्थायें प्रारम्भ हो चुकी थी।

- प्राथमिक और मिडिल स्कूल क्रमोन्नत होते हुये हाई स्कूल बने इनमें सबसे पहले 1836 में अजमेर का सरकारी स्कूल 1851 मे हाई स्कूल बना।

- रियासतों में सबसे पहले जयपुर में 1844 में हाई स्कूल की पढ़ाई प्रारम्भ हुई। यह हवामहल के सामने मदनमोहन मंदिर में संचालित होता था, इसमें हिन्दू मुस्लिम सभी विद्यार्थी अध्ययन करते थे।

- 1870 मे अलवर, भरतपुर 1876 में सर प्रताप हाईस्कूल जोधपुर और 1882 मे उदयपुर में हाई स्कूल कक्षाओं की पढ़ाई प्रारम्भ हो गई थी।

- यह क्रम राजपूताना की रियासतों में, वहां की जागीरों और ग्रामीण क्षेत्र तक 1947 तक निरन्तर बढ़ता रहा तथा स्कूल शिक्षा क्रमोन्नत होते हुये महाविद्यालय स्तर पर पहुंची।

- महाविद्यालय शिक्षा का प्रथम सोपान इंटरमीडिएट कक्षाएं (ग्यारहवी एवं बारहवीं) सबसे पहले 1868 में केन्द्रशासित अजमेर में प्रारंभ हुई।

- उसी वर्ष 1868 में जयपुर का महाराजा स्कूल (कॉलेज) इंटरमीडिएट कॉलेज बना, 1873 में जोधपुर में इंटरमीडिएट कॉलेज, 1922 में उदयपुर और 1928 में बीकानेर का डूंगर कॉलेज इंटरमीडिएट कॉलेज और भरतपुर में 1941 में महारानी जया कॉलेज क्रमोन्नत हुये।

- कॉलेज शिक्षा के दूसरे सोपान, स्नातक शिक्षा में भी अजमेर गवर्मेन्ट इंटरमीडिएट कॉलेज स्नातक कॉलेज में क्रमोन्नत हुआ।

- रियासतों में जयपुर में महाराजा कॉलेज 1888 में, जोधपुर में 1893 में जसवन्त कॉलेज, बीकानेर में 1928 में और उदयपुर में 1935 में स्नातक कॉलेज के रूप में क्रमोन्नत हुए।

- कॉलेज शिक्षा का तीसरा सोपान स्नातकोत्तर (पी.जी) की पढ़ाई सर्वप्रथम 1900 ई. में जयपुर रियासत में प्रारम्भ हुई।

- तत्पश्चात् 1942 व बीकानेर में उदयपुर में स्नातकोत्तर कक्षाएँ प्रारम्भ हुई।

- 1861 ई में जयपुर में मेडिकलकॉलेज की स्थापना की गई। इस कॉलेज से 6 वर्ष में मात्र 12 छात्र ही सफलता प्राप्त कर सके। इसके बाद 1867 ई में ये मेडिकल कॉलेज बंद हो गया।

- प्राथमिक से उच्च शिक्षा तक की प्रारम्भिक स्वरूप कालान्तर में विशाल स्वरूप ग्रहण करता गया, शिक्षा का विकास का क्रम विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न संस्थाओं के माध्यम से हुआ। विभिन्न क्षेत्रों में अर्थात् महिला, शिक्षा, कमजोर वर्ग की शिक्षा, शासक वर्ग की शिक्षा, शासक एवं सामन्तों (नोबल्स) की शिक्षा में हुआ जिनका वर्णन आगे की पोस्ट में दिया जाएगा।

(जारी है ........)

Comments

Popular posts from this blog

Kaun tha Hashmat Wala Raja Rao Maldev - कौन था हशमत वाला राजा राव मालदेव

राव मालदेव राठौड़ का इतिहास | History of Rao Maldev Rathod (मालदेओ राठौड़ इतिहास)   राव मालदेव का जन्म 5 दिसंबर 1511 को हुआ था । वह अपने पिता राव गांगा को मारकर 5 जून, 1532 को जोधपुर के राज्य सिंहासन पर आसीन हुए थे । इसलिए इसे पितृहंता शासक कहते हैं। जिस समय राव मालदेव ने गद्दी संभाली, उस समय दिल्ली के शासक मुगल बादशाह हुमायूँ थे । राव मालदेव की माँ का नाम रानी पद्मा कुमारी था जो सिरोही के देवड़ा शासक जगमाल की पुत्री थी । जैसलमेर के शासक राव लूणकरण की पुत्री उमादे से राव मालदेव का विवाह हुआ था । रानी उमादे विवाह की प्रथम रात्रि को ही अपने पति से रूठ गई और आजीवन उनसे रूठी रही । इस कारण उमादे इतिहास में ‘ रूठी रानी ‘ के नाम से प्रसिद्ध हो गई । राव मालदेव की मृत्यु होने पर रानी उमादे सती हो गई । मालदेव के राज्याभिषेक के समय जोधपुर और सोजत परगने ही उनके अधीन थे। वीर और महत्वाकांक्षी राव मालदेव ने शासन संभालते ही राज्य प्रसार का प्रसार करने पर ध्यान केंद्रित किया और जल्दी ही उन्होंने सींधल वीरा को परास्त कर भाद्राजूण पर अधिकार कर लिया। साथ ही फलौदी को जैसलमेर के भाटी शास...

How to do scientific farming of fennel - कैसे करें सौंफ की वैज्ञानिक खेती

औषधीय गुणों से भरपूर है सौंफ - प्राचीन काल से ही मसाला उत्पादन में भारत का अद्वितीय स्थान रहा है तथा 'मसालों की भूमि' के नाम से विश्वविख्यात है। इनके उत्पादन में राजस्थान की अग्रणी भूमिका हैं। इस समय देश में 1395560 हैक्टर क्षेत्रफल से 1233478 टन प्रमुख बीजीय मसालों का उत्पादन हो रहा है। प्रमुख बीजीय मसालों में जीरा, धनियां, सौंफ व मेथी को माना गया हैं। इनमें से धनिया व मेथी हमारे देश में ज्यादातर सभी जगह उगाए जाते है। जीरा खासकर पश्चिमी राजस्थान तथा उत्तर पश्चिमी गुजरात में एवं सौंफ मुख्यतः गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, बिहार तथा मध्य प्रदेश के कई इलाकों में उगाई जाती हैं। हमारे देश में वर्ष 2014-15 में सौंफ का कुल क्षेत्रफल 99723 हैक्टर तथा इसका उत्पादन लगभग 142995 टन है, प्रमुख बीजीय मसालों का उत्पादन व क्षेत्रफल इस प्रकार हैं। सौंफ एक अत्यंत उपयोगी पादप है। सौंफ का वैज्ञानिक नाम  Foeniculum vulgare होता है। सौंफ के दाने को साबुत अथवा पीसकर विभिन्न खाद्य पदार्थों जैसे सूप, अचार, मीट, सॉस, चाकलेट इत्यादि में सुगन्धित तथा रूचिकर बनाने में प्रयोग कि...

Vedic Period - Early Vedic Society वैदिक काल- प्रारम्भिक वैदिक समाज

प्रारम्भिक वैदिक समाज Vedic Period - Early Vedic Society प्रारम्भिक वैदिक समाज कबीलाई समाज था तथा वह जातीय एवं पारिवारिक संबंधों पर आधारित था। प्रारम्भिक वैदिक समाज जाति के आधार पर विभाजित नहीं था एवं विभिन्न व्यावसायिक समूह अर्थात् मुखिया, पुरोहित, कारीगर आदि एक ही जन समुदाय के हिस्से थे। प्रारम्भिक वैदिक समाज में कबीले के लिए ‘जन’’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता था और ऋग्वेद में विभिन्न जन का उल्लेख है। विभिन्न कबीलों में पारस्परिक संघर्ष सामान्य थे, जैसे ऋग्वेद में ‘‘दशराज युद्ध’’ का वर्णन हुआ है और इसी युद्ध के वर्णन से हमें कुछ कबीलों के नाम प्राप्त होते हैं जैसे भरत, पुरु, यदु, द्रहयु, अनू और तुरवासू। प्रारम्भिक वैदिक समाज में कबीलों के युद्ध जैसे कि पहले भी कहा गया है पशुओं के अपरहय एवं पशुओं की चोरी को लेकर होते रहते थे। ‘‘राजा’’ या ‘‘गोपति’’- कबीले का मुखिया ‘‘राजा’’ या ‘‘गोपति’’ होता था। वह युद्ध में नेता तथा कबीले का रक्षक था। ‘‘राजा’’ या ‘‘गोपति’’ का पद अन्य व्यावसायिक समूहों की भांति ही पैतृक नहीं था बल्कि उसका जन के सदस्यों में से चुनाव होता था। ‘राजन्य’- योद्धा को ‘राजन्य’ क...