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भरतपुर की होली

सभी पाठकों को होली की शुभकामनाएँ

राजस्थान के विभिन्न इलाकों में होली अलग अलग तरीकों से अलग ही अंदाज व अनूठी परंपरा के साथ मनाई जाती है।
राजस्थान का भरतपुर क्षेत्र ब्रज का भाग होने से वहाँ की संस्कृति पर ब्रजांचल का पूरा प्रभाव है। यहाँ होली अत्यंत ही धूमधाम के साथ मनाई जाती है। ब्रजांचल फाल्गुन के आगमन के साथ ही होली के रंग में रंगना शुरू हो जाता है। यहाँ होली की परंपरा अत्यंत ही प्राचीन है तथा कृष्ण भक्ति से ओतप्रोत है। कृष्ण भक्ति के रस में डूबे हुए होली के रसिया गीत ब्रज की धरोहर है, जिनमें नायक ब्रजराज रास बिहारी भगवान श्रीकृष्ण तथा नायिका ब्रजेश्वरी राधारानी को ह्रदय के अंतरतम में विराजमान करके भक्ति भावना से हुरियारे लोग रसिये गाते हुए रंगों से सराबोर होते हुए होली खेलते हैं। ब्रज के गाँव गाँव में ब्रजवासी अपने लोकवाद्य "बम" के अलावा ढप, ढोल एवं झांझ बजाते हुए रसिया गाते हैं। डीग ब्रज की ह्रदयस्थली है, होली उत्सव में यहाँ की ग्रामीण महिलाएँ अपने सिर पर भारी भरकम चरकुला रखकर उस पर जलते दीपकों के साथ नृत्य करती हैं। चरकुला यहाँ का प्रसिद्ध लोकनृत्य है। संपूर्ण ब्रज में इस तरह प्रतिवर्ष आनंद की अमृत वर्षा होती है। यही रंगीन परंपरा ब्रज की सांस्कृतिक धरोहर है। रियासती जमाने में भरतपुर के ब्रज अनुरागी राजाओं ने यहाँ सर्वसाधारण जनता के लिए स्वांगों की परंपरा को संरक्षण दिया जो आज भी इस अंचल में प्रचलित है। दामोदर जैसे गायकों के रसिया भरतपुर के जन जन की जबान पर हैं जिनमें श्रृंगार रस के साथ ही अध्यात्म रस की अमृतधारा बहती है। यहाँ की स्त्रियाँ फाल्गुन आते ही गा उठती हैं "सखीरी भागन ते फागुन आयौ, मैं तो खेलूंगी श्याम संग फाग।" ब्रज के एक कवि ने कहा है " कंकड हूँ जहाँ कांकुरी है रहे, संकर हूँ कि लगै जहं तारी, झूठे लगे जहं वेद-पुराण और मीठे लगे रसिया रसगारी।"
बरसाने, नंदगांव, कामां, डीग आदि स्थानों पर ब्रज की लट्ठमार होली की परंपरा आज भी यहां की संस्कृति को पुष्ट करती है। चैत्र कृष्ण द्वितीया को दाऊजी का हुरंगा भी प्रसिद्ध है। भरतपुर जिले में होली से पहले से ही होली से संबंधित विभिन्न आयोजन प्रारंभ हो जाते हैं जो होली के पश्चात भी चलते रहते हैं।
भरतपुर के होली के प्रमुख कार्यक्रमों में से एक कार्यक्रम "रंगीलौ महोत्सव" का आयोजन 14 मार्च से 19 मार्च तक किया गया जिसमें ही विभिन्न रंगारंग प्रस्तुतीयाँ दी गई। इस 41 वें रंगीलौ महोत्सव का आयोजन मित्र मंडली तरुण समाज समिति तथा भारत सरकार, संस्कृति मंत्रालय के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। 18 मार्च को शहर में शोभायात्रा निकाली गई।
इसके अलावा किला स्थित बिहारी जी मंदिर में रंगीली एकादशी के मौके पर 16 मार्च को होली का आयोजन किया गया जिसमें फूलों की होली खेली गई तथा शहर के अन्य कई मंदिरों में भी होली के आयोजन हुए। कामां में 16 मार्च को ब्रज की लट्ठमार होली का आयोजन किया गया। इस महोत्सव के तहत नन्दगांव बरसाने के कलाकारों द्वारा स्व. मा.केशदेव गुप्ता की स्मृति में रासलीला मंचन, शंकर लीला एवं फूलों की होली का मनोहारी प्रदर्शन हुआ। इस अवसर पर भरतपुर में डॉ. रामानन्द तिवारी भारतीयनन्दन के पुत्र एवं ब्रज संस्कृति की पताका को पूरे देश व विदेश में संरक्षित व संवर्धित करने वाले भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी पूर्व विशिष्ठ सचिव भारत सरकार सरकार प्रमोद दीपक सुधाकर को 'ब्रज - वत्सल' के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। साथ ही भारत सरकार के गीत एवं नाटक प्रभाग द्वारा भी सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए।


ब्रज की लट्ठमार होली -

लट्ठमार होली की शुरूआत सोलहवीं शताब्दी में ब्रज के बरसाना गाँव में हुई मानी जाती है। तब से यह परंपरा ब्रज के विभिन्न इलाकों बरसाना, नंदगाँव, मथुरा, डीग, कामाँ और भरतपुर आदि में अनवरत यूं ही निभाई जा रही है। इस होली में हुरियारों [ होली खेलने वाले पुरुषों ] द्वारा हुरियारिनों [ स्त्रियों ] से गीतों के माध्यम से होली की छेडछाड़ की जाती हैं। जब यह छेडछाड़ उनके लिए असहनीय बन जाती है तो वे एक-एक हुरियारो को घेरकर उन पर लट्ठ बरसाने लगती हैं। हुरियार भी इसके लिए पूरी तैयारी करके आते हैं। उनके सिर पर मजबूत साफा बंधा होता है तो हाथ में चमड़े की मजबूत ढाल होती है। इससे वे अपना बचाव करते हैं।

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