6/01/2011 11:11:00 pm
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राजस्थान की भील जनजाति -

राजस्थान की आदिवासी जनसंख्या की दृष्टि से भील जनजाति का द्वितीय स्थान है। भील मुख्यतः दक्षिणी राजस्थान के बाँसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर व राजसमंद जिलों में निवास करते हैं। इनकी सर्वाधिक संख्या उदयपुर जिले में हैं।
यह भारत की सबसे प्राचीन जनजाति मानी जाती है। ये मेवाड़ी, भीली तथा वागड़ी भाषा का प्रयोग करते हैं। सामाजिक दृष्टि से ये पितृसत्तात्मक होते हैं तथा आर्थिक रूप ये कृषक होते हैं। भील लोग परंपरागत रूप से तीरंदाज होते हैं। इतिहासकार टॉलमी ने भीलों को फिलाइट (तीरंदाज) कहा है।
भील शब्द 'बील' शब्द से बना है जिसका अर्थ तीर कमान रखने वाली जनजाति से है। सदैव संघर्षरत रहने के कारण भील अच्छे योद्धा भी होते हैं। महाराणा प्रताप की सेना में "भीलू राणा'' एवं अन्य कई वीर योद्धा थे, जिन्होंने उनकी युद्ध में बहुत सहायता की थी। मेवाड़ राज्य के राज चिह्न पर भीलू राणा और प्रताप की दोस्ती का प्रतीक आज भी अंकित हैअंग्रेजी शासन के दौरान 'मेवाड़ भील कोर' का गठन किया गया था जो आज भी विद्यमान है। भारत सरकार की अधिसूचना के अनुसार राजस्थान में भील जनजाति के अंतर्गत निम्नांकित को शामिल किया गया है- 
1. Bhil, 
2. Bhil Garasia, 
3. Dholi Bhil, 
4. Dungri Bhil, 
5. Dungri Garasia, 
6. Mewasi Bhil, 
7. Rawal Bhil, 
8. Tadvi Bhil, 
9. Bhagalia, 
10. Bhilala, Pawra, Vasava, Vasave
11. Bhil Meena

सामाजिक जीवन-

निवास स्थान-
  • इनके निवास स्थान के क्षेत्र सामान्यतः ऊबड़ खाबड़ तथा वन से आच्छादित होते हैं। ये पहाड़ियों पर छितरे हुए रहते हैं। भील पहाडियों पर झोपड़ियां बना कर रहते है। ये झोपड़ियां दूर-दूर छितराई हुई होती है। 
  • भीलों की कुछ झोपडियों के समूह को "फलां" कहते है। अतः इनके छोटे गाँव या मोहल्ले को 'फलां ' और बड़े गाँव को 'पाल' कहते हैं।
  • भीलों के घरों को 'कू ' कहते हैं।  इनके घरों को 'टापरा' भी कहा जाता है।
  • वाड़ा - टेकरी पर एक मकान (छपरा) होता है जिसके चारों ओर खुली जगह में खेती या पशुपालन होता है, उसे वाड़ा कहते हैं
  • पहाड़ियों पर रहने वाले भीलों को पालवी कहते हैं।
  • मैदानों पर रहने वाले भीलों को बांगड़ी कहते हैं।
  • वन में रहने के कारण कर्नल जेम्स टॉड ने इन्हें ' वनपुत्र ' कहा है।
विवाह एवं पारिवारिक जीवन-
  • भीलों में कई गौत्र होते हैं। भीलों में विवाह संबंध गौत्र से बाहर ही होते हैं। इनमें मोरबांदिया विवाह, अपहरण विवाह, देवर विवाह, विनिमय विवाह, सेवा विवाह तथा क्रय विवाह की प्रथाएं प्रचलित है।
  • कन्या का जो मूल्य वर पक्ष द्वारा दिया जाता है उसे 'दापा ' कहते हैं।
  • इनमें नाता प्रथा भी प्रचलित है जिसमें पुरुष या स्त्री विवाह विच्छेद करके अन्य पुरुष/स्त्री के साथ रहने लगते हैं। 
  • इनमें संयुक्त परिवार भी पाए जाते हैं लेकिन संयुक्त परिवार की तुलना में एकाकी परिवार अधिक पाए जाते हैं।
  • भीलों में गाँव के मुखिया को 'गमेती ' कहते हैं। लेकिन आजकल पंचायती राज के कारण गाँवों में मुखिया सरपंच हो गए हैं।
  • देवरे में पूजा करने वाले तथा झाड़ फूँक करने वाले को ' भोपा ' कहते हैं।
  • धार्मिक संस्कारों को संपन्न कराने वाले को ' भगत ' कहते हैं। 
  • भीलों के कुल देवता टोटम देव है।  
  • भील लोग धर्मराज, भेरू जी एवं दैवी शक्ति के उपासक होते हैं।
  • राजसमन्द के भीलों की कुल देवी आमजा माता/केलवाड़ा माता (केलवाडा- राजसमन्द ) है।
  • भील हिन्दू देवी देवताओं के अलावा स्थानीय लोक देवताओं की भी पूजा करते हैं।
  • भीलों का रणघोष शब्द ''फाइरे-फाइरे'' है। 
  • भील पांडा शब्द से खुश होते हैं एवं कांडी शब्द को गाली मानते है। 
  • भीलों में प्रचलित मृत्यु भोज की प्रथा 'काट्टा' कहलाती हैं।
  • भीलों का गौत्र 'अटक' कहलाती है। 
  • गवरी (राई नृत्य), घूमर, गैर, द्विचकी एवं हाथीमना भीलों के प्रमुख नृत्य हैं। होली पर ये गैर नृत्य व नेजा नृत्य करते हैं। इनमें लोकगीत भी बहुत लोकप्रिय है।
 विशिष्ट प्रथाएं-
1. हाथी वेडो- भीलों में प्रचलित विवाह की प्रथा, जिसके अन्तर्गत बांस, पीपल या सागवान वृक्ष के समक्ष फेरे लिये जाते है। इसमें वर को हरण तथा वधू को लाडी कहते है। 
2. भंगोरिया उत्सव- भीलों में प्रचलित उत्सव जिसके दौरान भील अपने जीवनसाथी का चुनाव करते है।
3. भराड़ी- भील जाति में वैवाहिक अवसर पर जिस लोक देवी का भित्ति चित्र बनाया जाता है, की भराड़ी कहते है। 
 4. नवई धान की पूजा-
वर्षाकाल के बाद जब अपनी फसल पककर घर पर आती है। तब उसकी पूजा करने के बाद ही उसका उपयोग करते है। गांव का मुखिया या बुजुर्ग मक्का, मूंग, भिंडी आदि धान्यों को मिलाकर पकाते हैं जिसे खिचड़ा कहते है। सबसे पहले नये धान की पूजा खेत या खलिहान की जाती है। प्रसाद के रूप में सबको खिचड़ा दिया जाता है। अन्न पर जीवन निर्भर है। उसे प्राप्त करने के लिए ही पूरा परिवार परिश्रम करता है। अन्न को ईश्वर स्वरूप पूज्य मानकर उसकी पूजा का विधान है। वैसे भी भील परिवार निर्धन होता है इसलिए अन्न का उनके लिए बड़ा महत्व है। यह मध्यप्रदेश के भीलों में अधिक प्रचलित है

5. खेतरपाल की पूजा -
खेतरपाल शब्द क्षेत्रपाल से बना है। जिसका अर्थ है 'खेत की रक्षा करने वाला देवता'। भीलों का विश्वास है कि खेतरपाल देवता उनके खेत की रक्षा करता है इसलिए भील लोग खेत की मेड़ पर एक उबड़ खाबड़ पत्थर का खेतरपाल के प्रतीक रूप में गाड़कर उस पर सिंदूर लगाकर उसकी पूजा करते है। यह खेतरपाल चोरों से उसकी रक्षा करता हैं
फसल काटते वक्त खेतरपाल की पूजा करते हैं। नारियल फोड़ते है।

भीलों के विशेष लोकगीत-
1. सुवंटिया - भील स्त्री द्वारा गाया जाने वाला।
2. हमसीढ़ो- भील स्त्री व पुरूष द्वारा युगल रूप में गाया जाने वाला। 
पहनावा-

  • भील पुरुष प्रायः कमीज तथा तंग धोती ( ठेपाड़ा या ठेपाडू ) एवं सिर पर फाडियुं (फेंटा), साफा ( पोत्या ) पहनते हैं। 
  • भील स्त्रियों के पहनावे में घाघरा, लूगड़ी (छोटी साड़ी) व चोली सम्मिलित हैं। 
  • भील लंगोटी को ' खोयतू ' कहते हैं।   
  • भील पुरूषों की साधारण धोती को 'फालू' कहते हैं।
  • ' सिन्दूरी ' भील स्त्रियों द्वारा पहनी जाने वाली गहरी रंग की एक साड़ी है, सामान्यतः गहरे लाल रंग की साड़ी को। 
  • भील दुल्हन द्वारा पहने जाने वस्त्र को रंग की साड़ी को 'पीरिया ' कहा जाता है। 
  • लाल व काले रंग का घाघरा 'कछावू' कहलाता है।  
  • भील पुरुष व महिलाएँ चाँदी, पीतल, गिलट (अलुमिनियम) आदि धातुओं के आभूषण पहनते हैं। 
  • भील स्त्री व पुरुषों में गोदना का प्रचलन भी पाया जाता है। 
भीलों के प्रमुख मेले-
  • वेणेश्वर का मेला- भील जनजाति का सबसे बड़ा मेला डूंगरपुर जिले का वेणेश्वर का मेला है जिसे ''आदिवासियों का महाकुंभ'' कहते हैं। यह मेला माघ पूर्णिमा को भरता है। 
  • घोटिया आम्बा का मेला- इसके अलावा अन्य दूसरा बड़ा मेला बाँसवाड़ा जिले का ''घोटिया आम्बा का मेला'' है जो चैत्र अमावस्या को भरता है।
  • गौतमेश्वर का मेला- एक अन्य बड़ा मेला प्रतापगढ़ जिले के अरनोद कस्बे के लगने वाला ''गौतमेश्वर का मेला'' है, जो प्रतिवर्ष वैशाख माह की पूर्णिमा को लगता है।
  • ऋषभदेव का मेला- उदयपुर जिले के प्रसिद्ध जैन तीर्थ केसरिया जी गाँव (पुराना नाम धुलैव) में स्थित प्रथम जैन तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) के जन्म दिवस चैत्र कृष्ण अष्टमी पर प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले ऋषभदेव के मेले में भी भील आदिवासी बड़ी संख्या में भाग लेते हैं। ऋषभदेव जी की काले रंग की मूर्ति होने के कारण भील लोग इन्हें काल्या बाबा कहते हैं तथा ये आदिवासी केसरिया नाथ जी या काला बाबा के चढ़ी हुई केसर का पानी पीकर कभी झूठ नहीं बोलते। 
आर्थिक जीवन-
  • आर्थिक दृष्टि से भील अत्यंत निर्धन जनजाति है। ये लोग घुमक्कड़ स्वभाव के होते हैं किन्तु अब ये अनेक भागों में कृषि करने लगे हैं। कृषि व शिकार करना, वनोत्पाद को बेचना, पशुपालन एवं मजदूरी इनके प्रमुख व्यवसाय है।
  • ये तालाबों व नदियों में काँटे से मछलियां पकड़ते हैं। जंगल में ये तीर कमान, गोफन व जाल की सहायता से शिकार करते हैं।
  • भीलों द्वारा पहाड़ी ढलानों पर की जाने वाली खेती को ' चिमाता ' कहते हैं। यह एक प्रकार की झुमिंग कृषि है, जिसमें ये पहाडों पर वनों को काटकर या जलाकर भूमि साफ कर कृषि करते हैं।
  • मैदानी भाग में की जाने वाली खेती को 'वालरा या दजिया ' कहते हैं।
  • भील स्त्रियाँ व बच्चे जंगल से जड़ी-बूटी, गोन्द, कंदमूल, फल, बैर, शहद, लकड़ी आदि कई वनोत्पाद एकत्रित कर बेचते हैं तथा अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ खरीदते हैं। महूआ वृक्ष का भीलों के लिए विशेष महत्व है।
  • ये गाय, बैल, बकरी आदि पशु भी पालते हैं।

7 टिप्पणियाँ:

  1. bahut hi sargarbhit jankari k liye dhnyavad

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  2. बहुत ही अच्छी जानकारी दी गई है।
    आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।
    पिरिया के बारे में कुछ और बात बता सके तो क्या कहना।

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  3. आदिवासी भील इतिहास की महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

    ReplyDelete
  4. आदिवासी के अधिकारों ओर हकों की जानकारी मिल सकती है

    ReplyDelete

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